पर्युषण गीत
सान्निध्य-समणी निर्देशिका डॉ निर्वाणप्रज्ञा
आत्मा की पोथी पढ़ने का यह सुंदर अवसर आया है । सोपान यही है चढने का मस्तिष्क मनुज का पाया है। संवत्सर का संदेश सुने निर्मल मन निर्मल काया है।
1. जीवन की पोथी के पहले, पन्ने में मैत्री मंत्र लिखो सिर दर्द समूल मिटाने का यह सुंदर अवसर आया है..
2. भूलों-भूलों उसको भूलों जो कटुता का व्यवहार हुआ जीवन को सरस बनाने का, यह
3. खोलों अब वैर विरोधों की, गांठे जो घुलती आई है। तन मन को स्वस्थ बनाने का, यह..
4. क्यों खोज शांति की बाहर में, यह अपने मन की छाया है। उपशम की शक्ति बढाने का, यह.
5. सहना सीखो कहना सीखो, रहना सीखो दिनचर्या में मृदुता की ज्योति जलाने का, यह..
6. हो वार्षिक आत्मनिरीक्षण भी, क्या खोया है क्या पाया है। आत्मा की शक्ति जगाने का, यह..
7. जो अंतरदर्शन पाएगा, वह महाप्रज्ञ कहलाएगा अपनी आत्मा को पाने का, यह….