आत्म-रक्षा कवच
आत्म-रक्षा कवच द्वारा स्वयं को आरक्षित करने पर बाहरी आघात, यात्रा में आकस्मिक दुर्घटना, शत्रु का प्रहार आदि से स्वयं को सुरक्षित रखा जा सकता है। प्राचीन जैन मंत्र शास्त्र के अनुसार आत्म-रक्षा-कवच बनाने की विधि इस प्रकार है-
प्रातः शय्या से उठते ही सर्वप्रथम अपनी दोनों हथेलियों के बीच ॐ ह्रीं की आकृति बनाएं। फिर पूर्व की तरफ मुँह करके दोनों हाथ जोड़कर दाहिने हाथ के अंगूठे सहित हथेली से बायां हाथ दबाते हुए निम्न मंत्र बोलकर अपने अंगों पर न्यास करते जाएं।
ॐ ह्रीं श्रीं अर्हं णमो अरिहंताणं ह्रां शिरं रक्ष रक्ष स्वाहा।
(सिर पर हाथ फिराते हुए ७ बार बोलें)
ॐ ह्रीं श्रीं अर्हं णमो सिद्धाणं ह्रीं मुखं रक्ष रक्ष स्वाहा।
(मुख व गर्दन पर हाथ फिराते हुए ७ बार बोलें)
ॐ ह्रीं श्रीं अर्हं णमो आयरियाणं हूं हृदयं रक्ष रक्ष स्वाहा।
(हृदय पर हाथ फिराते हुए ७ बार बोलें)
ॐ ह्रीं श्रीं अर्हं णमो उवज्झायाणं हूँ नाभिं रक्ष रक्ष स्वाहा।
(पेट व नाभि पर हाथ फिराते हुए ७ बार बोलें)
ॐ ह्रीं श्रीं अर्हं णमो लोए सव्वसाहूणं ह्रः पादौ रक्ष रक्ष स्वाहा।
(पांवों पर हाथ फिराते हुए ७ बार बोलें)
नोटः फिर ७ बार निम्न गाथा बोलकर सिर से पांवों तक हाथ फिराकर आत्म-रक्षा पूर्ण करें।
ॐ पणपन्नाय दसेव य।
पन्नट्ठी तह य चेव चालीसा।
रक्खंतु मे सरीरं,
देवाऽसुर पणमिया सिद्धा ॥
(देव-असुर द्वारा वन्दित १७० तीर्थकर सदा मेरी रक्षा करें)