(लय-नैतिकताकी सुर सरिता में )
भिक्षु भिक्षु घट घट में-२ बाबो छिप्यो हुयो है मन की, पावनता रे पट में, भिक्षु भिक्षु घट घट में-२
मुख में भिक्षु, मन में भिक्षु, भिक्षु है आंख्यां में।
गण रे हर अंकुर पल्लव में, भिक्षु है पांख्यां में।
कठै नहीं है बाबो बोलो, घर-घर में मरघट में।
जल में भिक्षु स्थल में भिक्षु, भिक्षु राजभवन में।
भक्त बुलालै जठै कठै भी, उज्जड़ में उपवन में।
नाना रूप बनाकर आवै निर्जल में पनघट में।
यदि संकल्प अटूट और श्रद्धा में यदि निश्चलता।
बण निष्काम ध्यान ध्यावै जो रख कर मन निर्मलता। रूकै नहीं बाबो क्षण भर भी, पहुंचे झट संकट में।
भक्त अभक्त अमीर-गरीब, पुकारै जो भी मन स्यूं। तेरापथ सांवरियो स्वयं बचावै निज रक्षण स्यूं।
करै न देरी फिर आवण में काम बणै झटपट में।।