छोडो क्यूं कोनी। (तर्ज : मन्दिर में कोई ढूंढ़ती फिरै…)
छोड़ो क्यूं कोनी क्रोध रो नशो ? थांरी आंख्यां में लोही रो ऊफाण । छोड़ो क्यूं कोनी क्रोध से नशो ?
थांरी अक-बक बकणै री पड़गी बाण ।
दूजां नै कालै नाग ज्यूं डसो ।।
क्रोध बड़ो दुर्गुण दुनिया में, घट-घट में बसनारो ।
जिण घट में नहिं क्रोध निवासी, बो नर जगत-सितारो ।।
पंचेन्द्रिय प्राणी री यद्यपि, करै न कतल विचारो ।
तदपि कषायी नाम कुपित रो, आगम-वचन निहारो ।।२।।
प्रेम परस्पर दर पीढ़यां रो, शिष्टाचार सदा रो ।
खिण भर में तिणखै ज्यूं तोड़ै बोल वचन मुख खारो ।।३।।
गाली सुण्यां न हुवै गूमड़ा, छिदै न अवयव थांरो ।
थे जो सहस्यो समभावां स्यूं, (तो) बो पिछतावणहारो ।।४।।
गालीवान कठै स्यूं ल्यासी, मांग मधुर वच प्यारो ।
थे तो मृदुल मनोहरभाषी, अपणो विरुद विचारो ।।५।।
जठै क्रोध है, अहंकार री नियमा तजै न लारो ।
सुण दृष्टान्त ‘सन्त धोबी रो’ मन री रीस उतारो ।।६।।
विफल कियो कुल-पुत्र रोष ज्यू, झट बारह वर्षा रो ।
त्यूं प्रशांत उपशांत भाव स्यूं ‘तुलसी’ सफल जमारो ।।७।।
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