(रचना -साध्वी श्री कनकश्रीजी)
(लय-हमनन्हें मुन्ने हो चाहे पर किसी से कम, आकाश तले जो फूल खिले वो फूल बनेंगे हम)
है प्राणों से भी प्यारा हमको महाश्रमण शासन्
दिल्ली ज्ञानशाला है पुलकित पाकर गुरु दर्शन
गुरुदेव प्रतापी है, कीर्त जग व्यापी है
शिखरों की ऊंचाई
ऊंचाई पौरुष से नापी है
महामहिम श्री महाश्रमण जय जय नेमानंदन
जैनजगत के दिव्य दिवाकर स्वीकारो वंदन ।।
उपकार संघ का है, आधार संघ का है,
निश्चिंत रहे हरदम उपहार संघ का है।
मंदार खिले है कदम कदम पर गण है नंदन वन
आकाश धरा परनहीं मिलेगा ऐसा उदाहरण
आवाज संघ की है आशीष संघ का है.
संकेत मिले संघका तो शीश संघ का है
बलिदानों की स्याही से इतिहास लिखे नूतन
संघ पुरुष के चरणों में है अर्पित यह जीवन
तेरापंथ के महासारथी रहो चिरायु चिरंतन ।