आई मलय बयार है
(लय-खड़ी नीम के नीचे …)
मन मधुवन में आई मलय बयार है ।
फूल-फूल, पत्ते-पत्ते में सौरभ आज अपार है ।। आं ।।
तेरा-पथ के निर्मल नभ में नये दिवाकर महाश्रमण । पूर्वाचार्यों की प्रभुता-विभुता के ठाकर महाश्रमण ।
धरती से अंबर तक जय-जयकार है ।।१।।
नई उमंगें नई तरंगें नये रंग हर आंख में ।
महाप्रज्ञ के पटधर भर दो नव ऊर्जा हर पांख में ।
इंतजार में खड़ा सकल संसार है ।।२।।
मोह नहीं तब मोहन-मुदित मुदित हर मौसम में रहे ।
श्रम के सतत उपासक को गुरु श्री मुख से महाश्रमण कहे ।
महातपस्वी वरो नित्य विस्तार है ।।३।।
सहनशीलता विनम्रता निर्मलता के आगार की
ऋजुता मृदुता कोमलता वत्सलता के भंडार की ।।
कैसे गाऊं महिमा अपरंपार है ४।।
युग-युग तपो धरा पर गुरुवर जन-मन का अंधेर हरो । बोधि लाभ आरोग्य समाधि से जीवन का कलश भरो । ‘सोमलता’ गुरु परमेश्वर साकार है ।।५।