मन ने साफ राखीजै
(तर्ज : माता वदनाजी रो लाडली……….)
-साध्वी श्रीराजीमतीजी
रे चेतन! जीणो है दिन च्यार, मन नै साफ राखीजै। रे मनवा! पापां रो ओ भार, सिर पर मतना बांधीजै ।।
1. मन नै साफ राखणियां तो कोई-कोई है।
मैली वृत्त्यां पर नियंत्रण, पूरी-पूरो राखीजै।
2. मन है चंदन-बाग, मन है काटां री झाड़ी।
मन है कल्प-वृक्ष री छाया, बैठ मौज मनाई जै।
3. मन रै लारै-लारै चाल्यां, संकट भारी है।
इणरी चलगत नै पीछाणै, बांरी संगत राखीजै ।।
4. अपण पग री शूल काढ़लै, मंजिल मिल ज्यासी। निर्मल मन ही सुख रो कारण, थोड़ी चेतो राखीजै ।।
5. छुप-छुप करके पाप कर्योड़ा कद तक छुपसी रे।
मन री शुद्धि रो उपाय, पल-पल समता राखीजै ।।
6. मन रै भीतर जातां जातां, मन खो ज्यावै है।
रे पंछी! एक डाल पर बैठ, स्थिरता योग साधीजै ।।