पौषध परिभाषा
धर्म को पुष्ट करने वाले व्रत-विशेष का नाम पौषध है। एक दिन एक रात के लिए चारों प्रकार के (अशन, पानी, मेवा तथा तांबूल) आहार का त्याग करना अथवा पानी के सिवाय तीन आहार का त्याग करना उपवास है। उपवास करके पौषध के नियम का पालन करना पौषधोपवास व्रत कहलाता है।
पौषध पाठ (हिन्दी)
ग्यारहवां पौषध व्रत।
१. अशन-पान-खादिम-स्वादिम का प्रत्याख्यान
२. अब्रह्मचर्य का प्रत्याख्यान।
३. मणि, सुवर्ण आदि का प्रत्याख्यान
४. माला, रंग-विलेपन का प्रत्याख्यान
५. शस्त्र, मूसल आदि सावद्य व्यापार का प्रत्याख्यान।
दिन रात पर्यन्त इस पौषधव्रत का मै पालन करूंगा। दो करण तीन योग से सावद्म योग न करूंगा, न कराऊंगा। मन से, वचन से और काया से।
नोट :- पानी पीकर पौषध व्रत लेते समय “दसवां पौषध” व्रत बोलें। शेष विधि पूर्ववत् है।
पौषध पाठ (प्राकृत)
पौषध साधना
एक्कारसमं पोसहोववासव्वयं, असण-पाण-खाइम-साइम पच्चक्खाणं, अबंभ-पच्चक्खाणं, उम्मुक्क मणि सुवण्णाइ पच्चक्खाणं, माला वण्णग विले वणाइ पच्चक्खाणं, सत्थमूसलाइ-सावज्ज जोग-पच्चक्खाणं, जाव अहोरत्तं पज्जुवासामि, दुविहं तिविहेणं , न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा,कायसा तस्स भंते। पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि।
पौषध-आलोचना पाठ
ग्यारहवें पौषध-व्रत में जो कोई अतिचार (दोष) लगा हो तो मैं उसकी आलोचना करता हूं।
१.शय्या, संथारे (सोने-बैठने के स्थान और बिस्तर) का विधिवत् प्रतिलेखन नहीं किया हो।
२.शय्या, संधारे का विधिवत् प्रमार्जन नहीं किया हो।
३. उच्चार, प्रस्त्रवण भूमि (मल, मूत्र, खंखार परिष्ठापन करने के स्थान) का विधिवत् प्रतिलेखन नहीं किया हो।
४. उच्चार, प्रस्रवण भूमि का विधिवत् प्रमार्जन नहीं किया हो।
५. पौषध-व्रत के नियमों का विधिवत् पालन नहीं किया हो।
तस्स मिच्छामि दुक्कडं इनसे लगे मेरे पाप मिथ्या हो, निष्फल हों।