निर्वाण का मार्ग
(तर्ज कितना बदल गया इन्सान)
सम्यग ज्ञानी, सम्यग दर्शी, सम्यग् संयमवान,
उसी को मिलता है निर्वाण।
शास्त्र शास्त्र में, स्थान स्थान पर बोल गए भगवान, उसी को मिलता है निर्वाण । टेर।।
जीव तत्व हूं, जड़ से निराला, पुण्य शुभ है पाप है काला। संवर बाध है, आश्रव नाला, बंध बंध निर्जरा उजाला। मोक्ष मुक्ति है यों जो हो, इन नव तत्वों का ज्ञान ।।१।।
देव वहीं जो अरि-हंत हो, गुरु वही जो निर-ग्रंथ हो।
धर्म वही जो अटल अमर हो, शास्त्र वही जो जिन भाषित हो। जिस प्राणी की नस नस में यों, अचल भरी श्रद्धान।।२।।
पंच महाव्रत को स्वीकारे, या अणुव्रत ही अंगीकारे।
जैसी शक्ति वैसा धारे, पर प्रमाद को दूर निवारे।
सिद्ध साक्षी से निरतिचार जो, पालै प्रत्याख्यान ।।३।।
केवल कहते ‘पारस’ सुन रे, सच्ची सीख हृदय में घर-रे। ज्ञाता दृष्टा व्रत धर बन रे, जिससे तेरा नर भव सुधरे।
पूर्व पुण्य से तुझे मिला यह, मानव जन्म महान ।।४।।