Sachhitra Shrawak Pratikraman

  

सचित्र श्रावक प्रतिक्रमण 
 प्रस्तुत संस्करण संशोधित व परिवर्धित है। नये सिरे से सीखने वाले श्रावक-श्राविकाएं प्रस्तुत संस्करण को काम में लें। जिन्होंने पहले से सीख रखा है उनके लिए इस नये संस्करण की भाषा को सीखना जरूरी नहीं है।
आचार्य महाश्रमण
प्रतिक्रमण संबंधी ध्यातव्य बिन्दु
दैवसिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक, सांवत्सरिक प्रतिक्रमण का कालमान सूर्यास्त से ४८ मिनट तक एवं रात्रिक प्रतिक्रमण का कालमान सूर्योदय से ठीक पूर्ववर्ती ४८ मिनट का समय है। प्रथम आवश्यक से छट्टे आवश्यक तक का भाग इस समय सीमा में ही पूर्ण करणीय है। चउवीसत्थव पहले तथा नमोत्थुणं एवं पंचपद-वंदना बाद में भी किये जा सकते हैं।
दैवसिक, रात्रिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक, सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में क्रमशः ४,४,१२,२०,४० लोगस्स का ध्यान करणीय है। वह यदि ४८ मिनट के भीतर ही कर लिया जाए तो अति उत्तम होगा। यदि ४८ मिनट में नहीं कर सकें तो पांचवें आवश्यक के कायोत्सर्ग में ४ लोगस्स का ध्यान अवश्य करें। प्रतिक्रमण के पश्चात् अर्थात् परमेष्ठी वंदना के पश्चात् पुनः १२,२०,४० लोगस्स का ध्यान करणीय है।
प्रतिक्रमण कराने वाले दूसरों को ध्यान कराने के लिए अतिचार अथवा लोगस्स पाठ का उच्चारण कर ध्यान पूरा करा कर स्वयं ध्यान करें। तभी उनका प्रतिक्रमण पूर्णता को प्राप्त होगा।
प्रस्तुत कृति में  रात्रिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक एवं सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में फुटनोट में दिए गए शब्दों का यथास्थान उच्चारण करें।
नमस्कार-सूत्र
णमो अरहंताण, णमो सिद्धाणं ,णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाण ,णमो लोए सव्वसाहूणं।
एसो पंच णमोक्कारो,सव्वपावपणासणो।
मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं ।।
वंदन-विधि
(चित्र नं. १ की तरह बैठकर व झुककर प्रदक्षिणा देते हुए) तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेमि वंदामि नमंसामि सक्कारेमि सम्माणेमि कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासामि मत्थएण वंदामि।
चित्र नं. १
वंदना तथा प्रदक्षिणा देने की विधि
(चित्र नं. २ की तरह खड़े होकर) ‘मत्थएण वंदामि’ चउवीसत्थव की आज्ञा।
ईर्यापथिक सूत्र
इच्छामि पडिक्कमिउं इरियावहियाए विराहणाए गमणागमणे पाणक्कमणे बीयक्कमणे  हरियक्कमणे ओसा-उत्तिंग-पणग-दगमट्टी-मक्कड़ा संताणा संकमणे जेमे जीवा विराहिया एगिंदिया बेइंदिया तेइंदिया चउरिंदिया पंचिदिया अभिहया वत्तिया लेसिया संघाझ्या संघट्टिया परियाविया किलामिया उद्दविया, ठाणाओ ठाणं संकामिया, जीवियाओ ववरोविया, तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।
चित्र नं. २
प्रतिक्रमण में खड़े रहने की विधि
कायोत्सर्ग-प्रतिज्ञा
तस्स उत्तरीकरणेणं पायच्छित्तकरणेणं विसोहीकरणेणं विसल्लीकरणेणं पावाणं कम्माणं निग्धायण‌ट्ठाए ठामि काठस्सग्गं अन्नत्थ ऊससिएणं नीससिएणं खासिएर्ण छीएणं जंभाइएणं उड्‌डुएणं वायनिसग्गेणं भमलीए पित्तमुच्छाए सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं सुहुमेहिं खेलसंचालेहिं सुहुमेहिं दिद्विसंचालेहिं एवमाइएहिं आगारेहिं अभग्गो अविराहिओ होज्ज में काउस्सग्गो जाव अरहंताणं भगवंताणं नमोक्कारेणं न पारेमि ताव कायं * ध्यान प्रारंभ (चित्र नं. ३ की तरह)
ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि।

ध्यान में स्थित रहने की विधि-
चतुरविंशतिस्तव
१् लोगस्स उज्जोयगरे, धम्मतित्थ यरे जिणे। अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसंपि केवली 
. २उसभमजियं च वंदे, संभवमभिनंदणं च सुमइं च। प उमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ।।
३. सुविहिं च पुफ्फ्दंतं, सीअल-सिज्जंस वासुपुज्जं च। विमलमणंतं च जिणं, धम्मं सतिं च वंदामि ।।
४. कुंथुं अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च ।। वंदामि रिट्ठनेमिं, पासं तह वद्धमाणं च ।।
५. एवं मए अभिथुआ, विहुय-रयमला पहीण-जरमरणा। चउवीसॅपि जिणवरा, तित्थवरा मे पसीयंतु ।।
 ६. कित्तिय वंदिय-मए, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा।
आरोग्ग-बोहिलाभं, समाहिवरमुत्तमं दिंतु ।। 
७.चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा। सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ।।
नमस्कार-सूत्र
णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवञ्झावाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।
(ध्यान समाप्त)
१् लोगस्स उज्जोयगरे, धम्मतित्थयरे जिणे। अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसंपि केवली 
२. उसभमजियं च वदे. संभवमभिनंदणं च सुमई च। पहुमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्हंपहं  वंदे ।। 
३. सुविहिं व पुफ्फदंतं, सीअल-सिज्जस-वासुपुजं च।
विमलमणतं च जिणं, धम्मं संतिं च बंदामि।। 
४. कुंधुं अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुब्वयं नमिजिणं च।।
५. बंदामि रिद्वनेमिं, पासं तह वद्धमाणं च।।
 एवं मए अभिथुआ, विहुय-रयमला पहीण-जरमरणा। चउवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा में पसीयंतु ।।
कित्तिय-वंदिय-मए, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। 
आरोग्ग-बोहिलाभं, समाहिवरमुत्तमं दिंतु ।। ६.
७. चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा। सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ।। 
शक्र-स्तुति (चित्र नं. ४. पू. १३ की तरह बैठकर)
नमोत्थुणं  अरहंताणं भगवंताणं आइगराणं तित्थयराणं सहसंबुद्धाणं पुरिसोत्तमाणं पुरिससीहाणं  पुरिसवरपुंडरीयाणं पुरिसवरगंधहत्थीणं लोगुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगहियाणं लोगपईवाणं लोगपज्ज्जोयगराणं अभयदयाणं चक्खुदयाणं मग्गदयाणं सरणदयाणं जीवदयाणं बोहिदयाणं धम्मदयाणं धम्मदेसयाणं धम्मनायगाणं धम्मसारहीणं धम्मवरचाउरंत-चक्वट्टीणं दीवो ताणं सरणं गई पइ‌ट्ठा अपडिहय वरनाणदंसणधराणं विअट्टछउमाणं जिणाणं जावयाणं तिन्नाणं तारयाणं बुद्धाणं बोहयाणं मुत्ताणं मोयगाणं सव्वण्णूणं सव्वदरिसीणं सिवमयलमरुयमणंतमक्खयमव्वाबाह- मपुणरावत्तयं सिद्धिगइनामधेयं ठाणं संपत्ताणं नमो जिणाणं जियभयाण
चित्र नं. ४

 शक्र-स्तुति करने की विधि (दांया पैर (Right) जमीन पर लगा हुआ एवं बाया पैर (Left) जमीन से चार अंगुल ऊपर उठा हुआ।हाथ बाएं पैर पर रहेंगे)
प्रतिक्रमण-प्रारंभ
‘मत्थएण वंदामि’ चउवीसत्थव समाप्त,
 पहले ‘सामायिक’ आवश्यक की आजा।
(चित्र नं. २. पू. ९ की तरह खड़े होकर)
प्रतिक्रमण-प्रतिज्ञा
आवस्सई इच्छाकारेण संदिसह भयवं! देवसिय 
पडिक्कमणं ठाएमि, देवसिय नाण-दंसण-चरित्ताचरित्त-तव-अइयार-चिंतवणटठं करेमि काउस्सग्गं।
(दैवसिक प्रतिक्रमण में देवसिय, रात्रिक प्रतिक्रमण में राइये, पाक्षिक प्रतिक्रमण में देवसियं पक्खियं, चतुर्मासिक प्रतिक्रमण में देवसियं चाउमासियं पक्खियं,
सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में देवसियं संवच्छरियं। 
२. देवसिय, राइम, देवसिय पक्खिय, देवसिय बाउमासिय पक्खिय, देवसिय संवच्छरियं।) बोले जहां जहां बोलना हो
नमस्कार-सूत्र
णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।
मंगल-सूत्र
चत्तारि मंगलं – अरहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं,
केवलि-पण्णत्तो धम्मो मंगलं। 
चत्तारि लोगुत्तमा – अरहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोगुत्तमा, केवलि-पण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो।
चत्तारि सरणं पवज्जामि – अरहंते सरणं पवज्जामि, सिद्धे सरणं पवज्जामि, साहू सरणं पवज्जामि, केवलि-पण्णत्तं धम्मं सरणं पवज्जामि।
सामायिक-प्रतिज्ञा
करेमि भंते ! सामाइयं सावज्जं जोगं पच्चक्खामि जाव नियमं मुहुत्तं (एगं) पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा, तस्स भंते ! पडिक्क्मामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि।
प्रायश्चित्त-सूत्र
इच्छामि ठाइउं काउस्सग्गं जो मे देवसिओ अइयारो कओ काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकरणिजो दुज्झाओ दुव्विचिंतिओ अणायारो अणिच्छि अव्वो असावगपाउग्गो नाणे तह दंसणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए तिण्हं गुत्तीणं चउण्हें कसायाणं पंचण्हं अणुव्वयाणं तिण्हं गुणव्वयाणं चउण्हं सिक्खावयाणं बारसविहस्स सावगधम्मस्स जं खंडियं जं विराहियं जो मे देवसिओ अइयारो  कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।
कायोत्सर्ग-प्रतिज्ञा
तस्स उत्तरीकरणेणं पायच्छित्तकरणेणं विसोहीकरणेणं विसल्लीकरणेणं पावाणं कम्माणं निग्घायण‌ट्ठाए ठामि काउस्सग्गं अन्नत्थ ऊससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइएणं उड्‌डुएणं वायनिसग्गेणं भमलीए पित्तमुच्छाए सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं सुहुमेहिं खेलसंचालेहिं सुहुमेहिं दिट्ठिसंचालेहिं एवमाइएहिं आगारेहिं अभग्गो अविराहिओ होज्ज मे काउस्सग्गो जाव अरहंताणं भगवंताणं नमोक्कारेणं न पारेमि ताव कायं । *
* ध्यान प्रारम्भ ९९ अतिचारों का (चित्र नं. ३ पृ. १० की तरह)
ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि
ज्ञान के १४ अतिचार
अमल अन्तःकरण से अतिचार की आलोचना। 
कर रहा हूं सरलता से हृदय ग्रन्थि विमोचना ।।
सूत्र पढ़ते समय आगे और पीछे कर दिया,
 अन्य आगम पाठ का उसमें अगर मिश्रण किया। 
कम अधिक अक्षर कहे पदहीन पाठ पढ़े कहीं, 
मध्य विराम लिया नहीं, अरु घोष भी समुचित नहीं” ।। योग-विरहित पाठ में संबंध यदि जोड़ा नहीं, 
अर्थ समझे बिना ही पद बीच में तोड़ा कहीं। 
ज्ञान अच्छे ढंग से ना कभी ग्राहक को दिया,
 संग्रहण संबोध का विपरीत मति से जो किया ।।
अकाले स्वाध्याय कर की ज्ञान की आशातना’
 काल में आलस किया पर हुआ पश्चात्ताप ना।
 कर लिया स्वाध्याय कादाचित्क अस्वाध्यायिके,
 अरु कभी स्वाध्याय कर पाया नहीं स्वाध्यायिके ।।
(जो मे देवसिओ अइयारो  कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
दर्शन के ५ अतिचार
लक्ष्य के प्रति चित्त में सन्देह या भय छा गया”, 
जो नहीं है लक्ष्य उसके प्रति हृदय ललचा गया। 
धर्म-फल की प्राप्ति में मैंने अगर संशय किया”,
 लक्ष्य-प्रतिगामी प्रशंसा की तथा परिचय किया ।।
( जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स मिच्छामि दुक्कडं) चारित्र के अतिचार)
१.अहिंसा अणुव्रत के ५ अतिचार
क्रोधवश पशु या मनुज को बन्धनों से बांधकर, 
पीटकर या निष्करुण हो अंग का विच्छेद कर। 
लादकर अतिभार पशुओं पर स्वयं निर्दय बना, 
जीविका विच्छिन्न कर’ यह हृदय पापों से सना ।।
( जो मे देवसिओ अड्यारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
२.सत्य अणुव्रत के ५ अतिचार
बिना पुष्ट प्रमाण सहसा दोष यों ही मढ़ दिया, 
रहसि चिन्तन निरत पर आरोप कोई गढ़ दिया।
 मन्त्रभेद स्वदार’ का अरु, गलत पथदर्शन किया,
 लेख झूठा लिख किसी का अहित सम्पादन किया।।
(जो मे देवसिओ अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं)
३.अचौर्य अणुव्रत के ५ अतिचार
ली चुराई वस्तु’ या सहयोग चोरों को दिया’, 
जा विरोधी राज्य में लंघन व्यवस्था का किया।
 तोल अथवा माप में की हो कमी-बेसी अगर,
 लोभवश पकड़ी कभी बेमेल मिश्रण की डगर ।।( जो मे देवसिओ अइयारो रो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
.स्वदारसंतोष अणुव्रत के ५ अतिचार
 कुछ समय आश्रित बना आलाप यदि मैंने किया,
 बिना पाणिग्रहण ही संलाप कर प्रश्रय दिया। 
कामक्रीड़ा पर विवाह प्रसंग में सक्रिय रहा’,
 तीव्र भोगासक्ति का यदि स्त्रोत जीवन में बहा ।।
(जो मे देवसिओ अइयारो  कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं)
५इच्छा परिमाण अणुव्रत के ५ अतिचार
खेत, घर, सोना, रजत परिमाण का लंघन किया 
और सीमा से अधिक धन-धान्य मैंने रख लिया। 
द्विपद-दासी दास पशु-संख्या अगर ऊपर चढ़ी’,
कुष्य-शेष अशेष सामग्री सदन की जो बढ़ी ।। 
(जो मे देवसिओ अइयारो  कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’)
 ६दिग्व्रत के ५ अतिचार
कर अतिक्रम ऊर्ध्वदिक् परिमाण अगर बढ़ा दिया, 
अधो दिक् तिर्यग् दिशा में गमन सीमाधिक किया। घटाकर सीमा कहीं परक्षेत्र में अभिवृद्धि की, विस्मरणवश बढ़ा सीमा निज प्रयोजन सिद्धि की ।।
(जो मे देवसिओ अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं)
७.उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत के २० अतिचार
 (भोजन संबंधी ५ अतिचार)
कर सचित्ताहार-वर्जन भूल से भक्षण किया’, 
हरा सूखा फल कभी गुठली सहित मुख में लिया। 
बिन पके या अधपके धान्यादि खाने में लिए,
फेंकना जिनमें अधिक वे फ्रूट्स खाने में लिए। 
(कर्मादान (व्यापार) संबंधी १५ अतिचार) 
बना अंगारे किया आरंभ तेजस्काय का,
काटकर जंगल किया विस्तार निज व्यवसाय का
 शकट भाटक’ स्फोटकर्मक’ और हाथी दांत का,
लाख ,रस ,विष, केश का वाणिज्य   जो बहूभांत का
यंत्र पीलन कर्म निरलांछनकरण’ में लिप्तता,
 लगा दावानल वनों में की अगर मैंने खता। 
कभी खेती हेतु सर दह आदि का शोषण किया, 
जीविका खातिर असंयति जीव का पोषण किया ।।
(जो मे देवसिओ अइयारो रो कओ ‘तस्स मिच्छामि दुक्कडं’ )
अनर्थदंड व्रत के ५ अतिचार
काम उद्दीपक क्रियाएं भांड-चेष्टा हो गई,
 चेतना सुविवेक की यदि मुखरता में खो गई। 
अस्त्र-शस्त्रों का किया संयोग निर्हतुक कभी’, 
हुआ उप-परिभोग का अतिरेक ये दुष्कृत सभी ।।
(जो मे देवसिओ अइयारो रो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं)
९सामायिक व्रत के ५ अतिचार
साम्य के अभ्यास में मन-मलिनता यदि आ गई,
 वचन काया पर कलुषता की घटा जो छा गई। 
किया जो संकल्प उसका विस्मरण यदि हो गया।
 काल सीमा आकलन में चित्त स्थिरता खो गया ।।( जो ने देवसिओ अइयारो रो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
१०.देशावकाशिक व्रत के ५ अतिचार
दूर से चीजें मंगाई क्षेत्र सीमा लांघकर’,
 तथा भेजी अनुचरों के साथ सीमा पारकर”। 
शब्द से संकेत कर या रूप दिखलाकर कभी, 
काम करवाया किसी से फेंक तृण कंकर कभी” ।।( जो मे देवसिओ अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
११.पौषधोपवास व्रत अतिचार
अगर शय्या और संस्तारक न प्रतिलेखित किए,
 गलत विधि प्रतिलेखना कर काम में उनको लिए। 
बिन प्रमार्जन अगर उनका कर लिया उपयोग जो, 
तथा करके दुष्प्रमार्जन किया सहज प्रयोग जो।।१ प्रस्त्रवण उच्चार भूमि की न की प्रतिलेखना,
 की अगर उसमें रही हो सजगता की रेख ना
 बिना पूंजी अविधि से पूंजी अगर भूमी रही, 
पूर्ण पौषध की अगर अनुपालना न हुई सही।
( जो मे देवसिओ अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं)
१२.यथासंविभाग व्रत के ५ अतिचार
देय वस्तु सचित्त ऊपर रखी’ या उससे ढकी,
 कर अतिक्रम काल का की प्रार्थना आहार की।
 वस्तु अपनी किन्तु पर की बताकर यदि छल किया
दान शोभा ख्याति मत्सर भाव से मुनि को दिया ।।
( जो मे देवसिओ अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
संलेखना के ५ अतिचार
ऐहलौकिक वस्तु में यदि आन्तरिक प्रियता रही,
पारलौकिक वस्तु में अनुरक्ति की धारा बही। 
अगर जीवन मरण की आसक्ति में मन खो गया, कामभोगों के लिए चैतन्य मेरा सो गया।।”
(जो मे देवसिओ अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं)
पांच अणुव्रत सात शिक्षाव्रत यही जीवन-निधि
सतत संयम-साधना से पूर्ण हो श्रावक-विधि। 
साधना में अति-व्यतिक्रम अति-अनाचरणं कृतं, 
विफल हों सब पाप स्वीकृत करूं मिध्या दुष्कृतं ।।
( जो मे देवसिओ अइयारो  कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
अठारह पाप
१. प्राणातिपात २. मृषावाद ३. अदत्तादान ४. मैथुन ५. परिग्रह ६. क्रोध ७. मान ८. माया ९. लोभ १०. राग ११. द्वेष १२. कलह १३. अभ्याख्यान’ १४. पैशुन्य १५. परपरिवाद १६. अरति रति १७. मायामृषा १८. मिध्यादर्शनशल्य ।
इन अठारह पापस्थानों का आचरण किया हो तो जो मे देवसिओ अइयारो रो कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।
प्रायश्चित-सूत्र
इच्छामि आलोइउं जो मे देवसिओ अइयारो  कओ काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकरणिजो दुज्झाओ दुव्विचिंतिओ अणायारो अणिच्छिअवो असावगपाउग्गो नाणे तह दंसणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए तिण्हं गुत्तीणं चउण्हं कसायाणं पंचण्हं अणुव्वयाणं तिण्हं गुणव्वयाणं चउण्हं सिक्खावयाणं बारसविहस्स सावगधम्मस्स जं खंडियं जं विराहियं (जो मे देवसिओ अइयारो  कओ तस्स मिच्छा मि दुकडं ।)
नमस्कार-सूत्र
णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।
(ध्यान समाप्त)
‘मत्थएण वंदामि’ पहला आवश्यक समाप्त, दूसरे ‘चतुर्विशति-स्तव’ आवश्यक की आज्ञा।
चतुर्विंशति-स्तव
१लोगस्स उज्जोयगरे,धम्मतित्थयरेजिणे।
 अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसंपि केवली ।। 
२. उसभमजियं च वंदे, संभवमभिनंदणं च सुमई च।
पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ।।
३. सुविहिं च पुप्फदंतं, सीअल-सिज्जंस-वासुपुज्जं च । विमलमणंतं च जिणं, धम्मं संतिं च वंदामि ।।
४. कुंथं अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च ।। वंदामि रिट्ठनेमिं, पासं तह वद्धमाणं च ।।
५. एवं मए अभिथुआ, विहुय-रयमला पहीण-जरमरणा। चउवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ।।
६. कित्तिय-बंदिय-मए, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। आरोग्ग-बोहिलाभं, समाहिवरमुत्तमं दिंतु ।।
७. चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा। सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ।। 
‘मत्थएण बंदामि’ दूसरा आवश्यक समाप्त, 
तीसरे ‘वंदना’आवश्यक की आज्ञा
वंदना सूत्र
इच्छामि खमासमणो ! बंदिउं, जावणिज्जाए निसीहियाए । अणुजाणह मे मिउम्गहं । निसीहि’ अहोकायं कायसंफासं। खमणिज्जो थे किलामो। अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइकंतो ?** जत्ता थे ?* जवणिज्जं च भे ?* खामेमि खमासमणो! देवसियं वइक्कम आवस्सियाए पडिक्कमामि खमासमणाणं देवसियाए आसायणाए तित्तीसन्नयराए, जं किंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालियाए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइकमणाए आसायणाए जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स खमासमणो ! पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।
वंदना सूत्र
इच्छामि खमासमणो ! वंदिउं, जावणिज्जाए निसीहियाए । अणुजाणह मे मिउग्गहं। निसीहि अहोकायं कायसंफासं । खमणिज्जो भे किलामो। अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइकंतो* ?* जत्ता थे ?* जवणिज्जं च भे ?* खामेमि खमासमणो ! देवसियं वइक्कम * आवस्सियाए पडिक्तमामि खमासमणाणं देवसियाए आसायणाए’ तित्तीसन्नयराए, जं किंचि १.मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सब्वकालियाए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइक्मणाए आसायणाए जो मे देवसिओ’ अइयारो कओ तस्स खमासमणो! पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि।
वंदना आवश्यक में खड़े रहकर व बैठकर वंदना करने की विधि
 ‘मत्थएण वंदामि’ तीसरा आवश्यक समाप्त, 
चौथे’प्रतिक्रमण’ आवश्यक की आज्ञा
आलोचना सूत्र (चित्र नं. ७ की तरह बैठकर)
तस्स सव्वस्स देवसियस्स अइयारस्स दुच्चिंतिय-दुभासिय
दुच्चिट्ठियस्स आलोयंतो पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि।

प्रायश्चित-सूत्र
इच्छामि पडिक्कमिउं जो मे देवसिओ अइयारो कओ काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकरणिज्जो दुज्झाओ दुव्विचिंतिओ अणायारो अणिच्छिअव्वो असावग-पाउग्गो नाणे तह दंसणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए तिण्हं गुत्तंणं चउण्हं कसायाणं पंचण्हं अणुव्वयाणं तिण्हं गुण्व्वयाणं चउण्हं सिक्खावयाणं बारसविहस्स सावग-धमस्स जं खंडियं जं विराहियं जो मे देवसिओ अइयारो रो कओ
तस मिच्छा मि दुक्कडं ।
ईर्यापथिक-सूत्र
इच्छामि पडिक्कमिउं इरियावहियाए विराहणाए गमणागमणे पाणक्कमणे बीयक्कमणे  हरियक्कमणे ओसा-उत्तिंग-पणग-दगमड्डी-मक्कड़ासंताणासंकमणे जेमे जीवा विराहिया एगिंदिया बे‌इदिंया तेइंदिया चउरिंदिया पंचिदिया अभिहया वत्तिया लेसिया संधाइया संघट्टिया परियाविया किलामिया उद्दविया, ठाणाओ ठाणं संकामिया, जीवियाओ ववरोविया,
( जो मे देवसिओ अड्यारो कओ तस्स मिच्छ मि दुक्कडं) 
रत्नत्रय
साधना रत्न-त्रयी की विनयनत हो मैं करूं।
 एक लय हो एक रस हो भाव-तन्मयता वरूं ।।
 ज्ञान, दर्शन, चरण की पावन त्रिवेणी में नहा। 
देव ! मैं निर्मल बनूं यह स्वप्न मानस में रहा।।
 प्राप्त सम्यग् ज्ञान मुझको और दर्शन भी मिला। 
आचरण का सुमन सुन्दर हृदय-वनिका में खिला ।।
ज्ञान
आगमे तिविहे पण्णत्ते तं जहा सुत्तागमे, अत्थागमे, तदुभयागमे ।
अर्हतों के अनुभवों का आगमों में सार है। 
वह हमारी साधना का प्राणमय आधार है।।
 सूत्र आगम, अर्थ आगम, तदुभयागम रम्य है। 
विविध नय की दृष्टियों से सहज सरल सुगम्य है।। 
ज्ञान के १४ अतिचार
अमल अन्तःकरण से अतिचार की आलोचना। 
कर रहा हूं सरलता से हृदय ग्रन्थि विमोचना ।। 
सूत्र पढ़ते समय आगे और पीछे कर दिया, 
अन्य आगम पाठ का उसमें अगर मिश्रण किया। 
कम अधिक अक्षर कहे पदहीन पाठ पढ़े कहीं, 
मध्य विराम लिया नहीं, अरु घोष भी समुचित नहीं ।। योग-विरहित पाठ में संबंध यदि जोड़ा नहीं, 
अर्थ समझे बिना ही पद बीच में तोड़ा कहीं। 
ज्ञान अच्छे ढंग से ना कभी ग्राहक को दिया,
 संग्रहण संबोध का विपरीत मति से जो किया ।। 
अकाले स्वाध्याय कर की ज्ञान की आशातना, 
काल में आलस किया पर हुआ पश्चात्ताप ना। 
कर लिया स्वाध्याय कादाचित्क अस्वाध्यायिके,
अरु कभी स्वाध्याय कर पाया नहीं स्वाध्यायिके ।। 
(जो में देवसिओ अइयारो रो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
दर्शन-सम्यक्त्व
अरंहतो महदेवो, जावज्जीवं सुसाहुणो गुरुणो । जिणपण्णत्तं तत्तं, इय सम्मत्तं मए गहियं ।।
देव मेरे दिव्य अर्हन्, श्रेष्ठ सारे लोक में।
साधना-धन साधु मेरे सुगुरु पथ-आलोक में।।
धर्म वह जो साधना-पथ केवली उपदिष्ट है।
आत्म-निष्ठामय अमल सम्यक्त्व मुझको इष्ट है।।
सम्यक्त्व के लक्षण’ :
शांत हैं आवेग सारे, शांति मन में व्याप्त है।
मुक्त होने की हृदय में प्रेरणा पर्याप्त है ।।
वृत्ति में वैराग्य, अन्तर्भाव में करुणा विमल।
अटल आस्था ये सभी सम्यक्त्व के लक्षण सबल ।।
सम्यक्त्व के भूषण :
्लक्ष्य में स्थिरता निरन्तर भक्ति-भावित भावना।
धर्म शासन की करूं निःस्वार्थ सतत प्रभावना।
जैन तत्त्वज्ञान में हो सहज जिज्ञासा प्रबल।
संघ-सेवा ये सभी सम्यक्त्व के भूषण अमल ।।
दर्शन के ५ अतिचार
लक्ष्य के प्रति चित्त में सन्देह या भय छा गया,
 जो नहीं है लक्ष्य उसके प्रति हृदय ललचा गया। 
धर्म-फल की प्राप्ति में मैंने अगर संशय किया,
 लक्ष्य-प्रतिगामी प्रशंसा की तथा परिचय किया।।
( जो मे देवसिओ अइयारो  कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कड़’)
बारह व्रत और अतिचार
श्रावक के अणुव्रत
धन्य हैं मुनिवर महाव्रत पालते सद्भाव से, 
 त्याग पथ पर हो समर्पित जी रहे समभाव से।
 है महाव्रत साध्य मेरा किन्तु वह दुःसाध्य है,
 पर अणुव्रत मार्ग मध्यम सरल और सुसाध्य है।।
. अहिंसा अणुव्रत
पढमं अणुव्वयं थूलाओ पाणाइवायाओ वेरमणं 
स्थूल हिंसा-विरति श्रावक का अणुव्रत है प्रथम, 
 जैन श्रमणोपासकों की अर्हता है न्यूनतम
द्वीन्द्रियादिक जगत के गतिशील त्रस प्राणी सभी, लक्ष्यपूर्वक निरपराधी का न वध करना कभी। 
आत्मरक्षा देशरक्षा आदि कुछ अपवाद है, 
दो करण त्रय योग से संकल्प यह अविवाद है।
 देहधारी हूं अतः आरंभ भी अनिवार्य है, 
किन्तु यह संकल्पजा हिंसा सदा परिहार्य है।।
अहिंसा अणुव्रत के ५ अतिचार 
क्रोधवश पशु या मनुज को बन्धनों से बांधकर, 
पीटकर या निष्करुण हो अंग का विच्छेद कर। 
लादकर अतिभार पशुओं पर स्वयं निर्दय बना,
 जीविका विच्छिन्न कर यह हृदय पापों से सना ।।
( जो मे देवसिओ अइयारो रो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
२. सत्य अणुव्रत
बीयं अणुव्वयं थूलाओ मुसावायाओ वेरमणं
 स्थूल मिथ्या वचन-विरमण है अणुव्रत दूसरा, 
यथासंभव झूठ से बचकर वचन बोलूं खरा। 
त्याग कन्यालीक का त्यों गाय विषय अलीक का,
 भूमि क्रय-विक्रय प्रसंगे क्यों अतिक्रम लीक’ का।
ना धरोहर को नकारूंगा स्वयं की मानकर,
 मैं नहीं दूंगा कभी झूठी गवाही जानकर। 
दो करण अरु तीन योगों से हमेशा त्याग है,
 सत्य व्रत संकल्प से मुझको विपुल अनुराग है।। 
सत्य अणुव्रत के ५ अतिचार
बिना पुष्ट प्रमाण सहसा दोष यों ही मढ़ दिया,
 रहसि चिन्तन निरत पर आरोप कोई गढ़ दिया।
 मंत्र भेद स्वदार का अरू, गलत पथदर्शन किया, 
लेख झूठा लिख किसी का अहित सम्पादन किया ।। 
(जो मे देवसिओ अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
३. अस्तेय अणुव्रत
तइयं अणुव्वयं थूलाओ अदिण्णादाणाओ वेरमणं 
व्रत अदत्तादान-विरमण तीसरा विख्यात है, 
स्थूल चोरी त्याग से इसकी सहज शुरुआत है।
 खात’ खनकर तोड़कर दीवार चोरी ना करूं, 
ग्रन्थि भेदन कर पराया धनकभी क्यों मैं हरू ? 
तोड़ ताला पतित विस्मृत नहीं कोई चीज लूं, 
क्यों किसी धनवान का धन लूटकर उसको छलूं।
 दो करण अरु तीन योगों से करूं व्रत पालना, 
चाहता मैं इस सुरक्षा कवच को संभालना ।।
 अचौर्य अणुव्रत के ५ अतिचार
ली चुराई वस्तु या सहयोग चोरों को दिया, 
जा विरोधी राज्य में लंघन व्यवस्था का किया। 
तोल अथवा माप में की हो कमी-बेसी अगर, 
लोभवश पकड़ी कभी बेमेल मिश्रण की डगर ।।
(जो मे देवसिओ अइयारो 
  कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’ )
. स्वदारसंतोष अणुव्रत (ब्रह्मचर्य अणुव्रत)
चउत्थं अणुव्वयं थूलाओ मेहुणाओ वेरमणं 
अणुव्रत चौथा निरूपित स्थूल मैथुन-विरति है,
 जिन्दगी भर पालने से सहज होती सुगति है। 
दिव्य भोगों को न भोगूं दो करण त्रय योग से,
 विरत मैथुन से रहूं मैं आत्मबल सहयोग से।
 मनुज या तिर्यंच विषयक कामभोग अनल्प हैं, 
ना करूं मैं कभी सेवन काय से संकल्प है।।
ब्रह्मचर्य अणुव्रत के ५ अतिचार
कुछ समय आश्रित बना आलाप यदि मैंने किया, 
बिना पाणिग्रहण ही संलाप कर प्रश्रय दिया।
 कामक्रीड़ा परविवाह प्रसंग में सक्रिय रहा, 
तीव्र भोगासक्ति का यदि स्त्रोत जीवन में बहा ।। 
(जो मे देवसिओ अईयारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
५. इच्छापरिमाणव्रत (अपरिग्रह अणुव्रत) 
पंचमं अणुव्वयं थूलाओ परिग्गहाओ वेरमणं
 पांचवां व्रत उपासक का परिग्रह-परिमाण है,
 कामनाओं पर नियंत्रण स्वयं का कल्याण है। 
खेत और मकान का सीमाकरण अब मान्य है, 
स्वेच्छ्या सीमित रजत-सोना तथा धन-धान्य है। 
द्विपद चाहे हों चतुष्पद सभी का परिमाण है, 
कुप्य सीमाधिक परिग्रह ग्रहण प्रत्याख्यान है।
 करण एक त्रियोग से स्वीकृत नियम की साधना,
 स्थूल अपरिग्रह अणुव्रत की करूं आराधना ।।
अपरिग्रह अणुव्रत के ५ अतिचार
खेत, घर, सोना, रजत परिमाण का लंघन किया
 और सीमा से अधिक धन-धान्य मैंने रख लिया।
 द्विपद-दासी दास पशु-संख्या अगर ऊपर चढ़ी,
 कुप्य-शेष अशेष सामग्री सदन की जो बढ़ी ।। 
(जो मे देवसिओ अड्यारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
. दिग्व्रत
छटं दिसि परिमाण व्वयं
दिशाव्रत छट्टा दिशाओं का करूं परिमाण मैं, 
ऊर्ध्व तिर्यग् दिक् अधो दिक् का रखूंगा ध्यान मैं।
 किया सीमांकन उसी का कर अतिक्रम काय से, 
पांच आश्रव निषेवन का त्याग अपनी राय से। 
इक करण अरु तीन योगों का स्मरण प्रतिदिन रहे, जिन्दगी भर दिशाव्रत परिमाण की धारा बहे।।
दिग्व्रत के ५ अतिचार
कर अतिक्रम ऊर्ध्वदिक् परिमाण अगर बढ़ा दिया, 
अधो दिक् तिर्यग् दिशा में गमन सीमाधिक किया। घटाकर सीमा कहीं पर क्षेत्र में अभिवृद्धि की, विस्मरणवश बढ़ा सीमा निज प्रयोजन सिद्धि की।। 
(जो मे देवसिओ अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
. उपभोग परिभोग परिमाण व्रत 
सत्तमं उवभोगपरिभोग-परिमाणव्वयं
भोग के साधन विपुल हैं अतुल मन की लालसा, 
लालसा की पूर्ति में आरम्भ है भूचाल-सा। 
खाद्य संयम वस्त्र संयम वस्तु का संयम बढ़े,
 भोग या उपभोग का संयम सफलता से सथे ।। 
प्रथम उल्लणिया – अंगोछों का सविधि परिमाण हो, दंतवण- सीमित दतौनों का सहज संज्ञान हो। 
फलों की विधि तैलमर्दन और उबटन’ स्नान जो, 
वस्त्र की विधि’ विलेपन’ पुष्याभरण१० पहचान हो। अगरु – धूपन पेय बहुविध भक्ष्य घेवर आदि हैं, 
तथा ओदन सूपविधि अरु विगयविधि निरुपाधि है। 
शाक मधुरिम फल सरस भोजन उदक विधि ज्ञेय है, 
और विधि मुखवास वाहन शयन की आदेय है।। 
पादुका व सचित्त” विधि द्रव्यादि का सीमाकरण, अधिकतम उपभोग अरु परिभोग का हो परिहरण। 
त्याग मुझको जिन्दगी भर इक करण त्रय योग से, 
मिला मौका साधना का किसी शुभ संयोग से।।
अपरिमित उपभोग से रहता मनुज संतप्त है, 
द्विधा भोजन, कर्म से व्रत सातवां प्रज्ञप्त है। 
टालने अतिचार भोजन के यथा अनिवार्य हैं, 
तथा कर्मादान पन्द्रह कर्मतः परिहार्य हैं।।
उपभोगपरिभोग परिमाण व्रत के २० अतिचार
 (भोजन संबंधी ५ अतिचार)
कर सचित्ताहार-वर्जन भूल से भक्षण किया, हरा सूखा फल कभी गुठली सहित मुख में लिया।
 बिन पके या अधपके धान्यादि खाने में लिए, 
फेंकना जिनमें अधिक वे फ्रूट्स खाने में लिए।।
(कर्मादान (व्यापार) संबंधी १५ अतिचार) 
बना अंगारे किया आरंभ तेजस्काय का, 
काटकर जंगल किया विस्तार निज व्यवसाय का।
 शकट भाटक स्फोट कर्मक और हाथी दांत का, 
लाख रस विष केश का वाणिज्य जो बहुभांत का।।
 यंत्र पीलन कर्म निरलाछंनकरण में लिप्तता, 
लगा दावानल वनों में की अगर मैंने खताः। 
कभी खेती हेतु सर दह आदि का शोषण किया, 
जीविका खातिर असंयति जीव का पोषण किया।। 
(जो में देवसिओ अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं)
(देवसिओ संवच्छरिओ।देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ,)तथा समय बोले 
अनर्थक दंड 
आठवां व्रत है अनर्थक दंड से विरमण सदा, 
चतुर्विध प्रज्ञप्त उसका हो न आसेवन कदा। 
बंधकारक अशुभ चिन्तन अपध्यानाचरित है, 
मत्त होकर क्रिया करना स्वप्रमादाचरित है। 
हिंस्त्र शस्त्र प्रदान करना पथ न श्रावक धर्म का, 
अन्य को उपदेश देना पापकारी कर्म का। 
इस अनर्थकदण्ड का मैं त्याग आजीवन करूं,
 दो करण त्रय योग से हो सजग आगे पग धरूं ।। अनर्थदंड विरमण व्रत के ५ अतिचार
काम उद्दीपक क्रियाएं भांड-चेष्टा हो गई,
 चेतना सुविवेक की यदि मुखरता में खो गईं। 
अस्त्र-शस्त्रों का किया संयोग निर्हेतुक कभी, 
हुआ उप-परिभोग का अतिरेक ये दुष्कृत सभी ।। 
(जो मे देवसिओ अड्यारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
९. सामायिक व्रत
नवमं सामाइयव्वयं
नवम व्रत सावद्य योगों से विरति समतामयी, 
दो करण त्रय योग से मैं करूं सामायिक सही।
 नियत कालावधि सुनिश्चित शान्त मन से साधना,
 एक लय से एक रस से आत्म-हित आराधना ।। 
धर्म है समता विषमता पाप का आधार है, 
जैन शासन के निरूपण का यही बस सार है। 
त्याग कर सावद्य चर्या सुखद सामायिक करूं,
 लीन अपने आप में हो मैं भवोदधि को तरूं।
सामायिक व्रत के ५ अतिचार
साम्य के अभ्यास में मन-मलिनता यदि आ गई,
 वचन काया पर कलुषता की घटा जो छा गई।
 किया जो संकल्प उसका विस्मरण यदि हो गया,
 काल सीमा आकलन में चित्त स्थिरता खो गया।।
(जो मे देवसिओ अड्यारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
१०. देशावकाशिक व्रत 
दसमं देसावगासियव्वयं
त्याग हिंसा आदि का सामान्य आजीवन किया। 
और यातायात-सीमा हेतु दिग्व्रत भी लिया ।। 
एक निश्चित समय तक उनको नियन्त्रित मैं करूं। स्वल्पकालिक त्यागमय देशावकाशिक व्रत वरूं ।। 
पांच आश्रव द्वार सेवन का अहोनिशि त्याग है,
 दो करण त्रय योग से जीवन सदा बेदाग है। 
पूर्व स्वीकृत व्रतों में भी जो किया सीमाकरण, 
ना करूं मन वचन काया से असीमित आचरण ।।
देशावकाशिक व्रत के ५ अतिचार
दूर से चीजें मंगाई क्षेत्र सीमा लांघकर, 
तथा भेजी अनुचरों के साथ सीमा पारकर। 
शब्द से संकेत कर या रूप दिखलाकर कभी,
 काम करवाया किसी से फेंक तृण कंकर कभी ।। 
(जो मे देवसिओ अड्यारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
११. पौषधोपवास व्रत 
एगारसमं पोसहोववासव्वयं
रात दिन उपवास-युत पौषध नियम स्वीकार है, 
अशन, पानक, खाद्य एवं स्वाद्य का परिहार है।
 त्याग अब्रह्माचरण उन्मुक्त मणि स्वर्णादि का, 
और माला रंग चन्दन लेप आदि उपाधि का। 
शस्त्र मूसल आदि जितने पापकारी कार्य हैं, 
दो करण अरु योग त्रय से छोड़ने अनिवार्य हैं।।
पौषधोपवास व्रत के ५ अतिचार
अगर शय्या और संस्तारक न प्रतिलेखित किए, 
गलत विधि प्रतिलेखना कर काम में उनको लिए। 
बिन प्रमार्जन अगर उनका कर लिया उपयोग जो,
 तथा करके दुष्प्रमार्जन किया सहज प्रयोग जो ।। प्रस्त्रवण उच्चार भूमि की न की प्रतिलेखना, 
की अगर उसमें रही हो सजगता की रेख ना।
 बिना पूंजी अविधि से पूंजी अगर भूमी रही, 
पूर्ण पौषध की अगर अनुपालना न हुई सही।
(जो मे देवसिओ अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
१२. यथासंविभाग व्रत बारसमं अहासंविभागव्वयं
यथाशक्ति विभाग देना वर श्रमण निर्ग्रन्थ को 
साधना में अपेक्षित सहयोग श्रेयस पन्थ जो। 
पूर्ण प्रासुक एषणा के योग्य विविध पदार्थ ये, 
चतुर्दशविध दान मुनि को दूं सदा निस्वार्थ मैं।। 
चतुर्विध अशनादि भक्षण योग्य चीजें ज्ञेय हैं, 
वस्त्र-भाजन और कंबल-पादप्रौंछन देय हैं। 
प्रातिहारिक फलक पीडा बिछौना संस्तारकं, 
तथा औषध और भेषज विविध रोग निवारकं । 
साधु-सतियों को समय पर सहज प्रतिलाभित करूं, भावना की नाव से संसार सागर को तरूं ।।
यथासंविभाग व्रत के ५ अतिचार
देय वस्तु सचित्त ऊपर रखी या उससे ढकी,
 कर अतिक्रम काल का की प्रार्थना आहार की। 
वस्तु अपनी किन्तु पर की बताकर यदि छल किया
 दान शोभा ख्याति मत्सर भाव से मुनि को दिया ।।
 (जो मे देवसिओ अइयारो रो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
संलेखना
मारणांतिय संलेहणा :
देह की संलेखनामय मृत्यु पावन पर्व है।
दीर्घकालिक साधना का सफल सात्त्विक गर्व है।।
मृत्यु की सन्निकटता या देह-शक्ति क्षीण हो।
प्रवर तप के आचरण में भावना संलीन हो ।।
संलेखना के ५ अतिचार :
ऐहलौकिक वस्तु में यदि आन्तरिक प्रियता रही, पारलौकिक वस्तु में अनुरक्ति की धारा बही। 
अगर जीवन मरण की आसक्ति में मन खो गया, कामभोगों के लिए चैतन्य मेरा सो गया।। 
(जो मे देवसिओ अइयारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
 पांच अणुव्रत सात शिक्षाव्रत यही जीवन निधि।
 सतत संयम-साधना से पूर्ण हो श्रावक विधि ।। 
साधना में अति-व्यतिक्रम, अति अनाचरणं कृतं।
विफल हों सब पाप, स्वीकृत करूं मिथ्या दुष्कृतं ।।
( जो मे देवसिओ अड्यारो कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं’)
अभ्युत्थान-सूत्र
तस्स धम्मस्स केवलिपण्णत्तस्स अब्भुट्ठीओमि’ आराहणाए विरओमि विराहणाए सव्वं तिविहेणं पडिक्कंतो वंदामि जिणे चउवीस।
वंदना सूत्र
इच्छामि खमासमणो! वंदिउं, जावणिज्जाए निसीहियाए। अणुजाणह मे मिउग्गहं । निसीहि अहोकायं कायसंफासं  खमणिज्जो थे किलामो। अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइक्कं तो ?** जत्ता भे ?* जवणिज्जं च भे ?* खामेमि खमासमणो! देवसियं वइक्कम आवस्सियाए पडिक्कमामि खमासमणाणं देवसिवाए आसायणाए’ तित्तीसन्नयराए, जं किंचि मिच्छाए मणदुक्लडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालियाए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइक्कमणाए आसायणाए जो मे देवसिओ अइयारो कओ तस्स खमासमणो ! पडिक्क्रमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।(*चिह्नांकित स्थानों पर खड़े होने पर चित्र नं. ५ (पृ. ३०) की तरह और बैठने पर
चित्र नं. ६ (पृ. ३०) की तरह वंदना करें।
(१. चित्र नं. २ (पृ. ९) की तरह खड़े होकर।
२. चित्र नं. ६ (पृ. ३०) की तरह बैठकर।
३. दिवसो वइक्कंतो, राई वइक्कंता, दिवसो पक्खो वइक्कंतो, दिवसो चाउमासो
पक्खो वइक्कंतो, दिवसो संवच्छरो वइक्कंतो।
४. देवसियं वइक्कम, राइयं वइक्कर्म, देवसियं पक्खियं वइक्कर्म, देवसियं
चाउमासियं पक्खियं वइक्कमं, देवसियं संवच्छरियं वइक्कमं ।
५. चित्र नं. ५ (पृ. ३०) की तरह खड़े रहकर। नोट: दूसरे वंदना सूत्र में यहां खड़ा नहीं होना।)
वंदना सूत्र
इच्छामि खमासमणो ! वंदिउं, जावणिज्जाए निसीहियाए । अणुजाणह मे मिउग्गहं। निसीहि अहोकायं कायसंफासं। खमणिज्जो भे किलामो। अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइकंतों ?* जत्ता थे ?* जवणिजं च थे ? खामेमि खमासमणो ! देवसियं वइक्कम आवस्सियाए पडिक्क्रमामि खमासमणाणं देवसियाए आसायणाए’ तित्तीसन्नयराए, जं किंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालियाए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माड़क्रमणाए आसायणाए जो मे देवसिओ अड्यारो कओ तस्स खमासमणो ! पडिक्क्रमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि।
*चिह्नांकित स्थानों पर खड़े होने पर चित्र नं. ५ (पृ. ३०) की तरह और बैठने पर
(चित्र नं. ६ (पृ. ३०) की तरह वंदना करें। १. देवसियाए आसायणाए, राइयाए आसायणाए, देवसियाए पक्खियाए आसायणाए, देवसियाए चाउमासियाए पक्खियाए आसायणाए, देवसियाए संवच्छरिवाए
आसायणाए। २. देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ।
३. चित्र नं. ६ (पृ. ३०) की तरह बैठकर।
४. दिवसो वइक्कंतो, राई वइक्कंता, दिवसो पक्खो वइवकंतो, दिवसो चाउमासो
पक्खो वइक्कंतो, दिवसो संवच्छरो वइक्कंतो।
५. देवसियं वइक्कर्म, राइयं वइक्कमं, देवसियं पक्खियं वइक्कम, देवसियं चाउमासियं पक्खियं वइक्कम, देवसियं संवच्छरियं वइक्कमं।)
क्षमा-याचना-सूत्र
खामेमि सव्वजीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे।
मेत्ती मे सव्वभूएसु, वेरं मज्झ न केणई ।।
पूज्य-पूजा का व्यतिक्रम जान या अनजान में,
की अवज्ञा लघुजनों की मग्न हो अभिमान में।
दे रहा मैं क्षमा सबको दें क्षमा मुझको सभी,
मित्र सब हैं शत्रुता का भाव लाऊं ना कभी ।।
जीव-योनि
सात लाख पृथ्वीकाय, सात लाख अप्काय, सात लाख तेजस्काय, सात लाख वायुकाय, दस लाख प्रत्येक वनस्पतिकाय, चौदह लाख साधारण वनस्पतिकाय, दो लाखद्वीन्द्रिय, दो लाख त्रीन्द्रिय, दो लाख चतुरिन्द्रिय, चार लाख नारक, चार लाख देवता, चार लाख तिर्यंच पंचेन्द्रिय, चौदह लाख मनुष्य जाति – चार गति, चौरासी लाख जीव-योनि पर राग-द्वेष आया हो तो जो मे देवसिओ अइयारो कओ ‘तस्समिच्छा मि दुक्कडं’। ‘मत्थएण वंदामि’ चौथा आवश्यक समाप्त, पांचवें
‘कायोत्सर्ग’ आवश्यक की आज़ा।
कायोत्सर्ग संकल्प सूत्र
देवसिय अइयार-विसोहणटठ करेमि काउस्सग्गं।
प्रायश्चित्त-सूत्र
इच्छामि ठाइउं काउस्सग्गं जो मे देवसिओ अइयारो  कओ काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो उम्मग्गो अकप्पो अकरणिज्जो दुज्झाओ दुव्विचिंतिओ अणायारो अणिच्छि अव्वो असावगपाउग्गो नाणे तह दंसणे चरित्ताचरित्ते सुए सामाइए तिण्हं गुत्तीणं चउण्हं कसायाणं पंचण्हं अणुव्वयाणं तिण्हं गुणव्ययाणं चउण्हं सिक्खावयाणं बारसविहस्स सावगधम्मस्स जं खंडियं जं विराहियं( जो मे देवसिओ अइयारो  कओ तस्स मिच्छा मि दुक्कडं) । 
कायोत्सर्ग-प्रतिज्ञा
तस्स उत्तरीकरणेणं पायच्छित्तकरणेणं विसोहीकरणेणं विसल्लीकरणेणं पावाणं कम्माणं निग्घायणद्वाए ठामि काउस्सग्गं अन्नत्थ ऊससिएणं नीससिएणं खासिएणं छीएणं जंभाइएणं उड्डु एणं वायनिसग्गेणं भमलीए पित्तमुच्छाए सुहुमेहिं अंगसंचालेहिं सुहुमेहिं खेलसंचालेहिं सुहुमेहिं दिट्ठिसंचालेहिं एवमाइएहिं आगारेहिं अभग्गो अविराहिओ होज्ज में काउस्सग्गो जाव अरहंताणं भगवंताणं नम्मोक्कारेणं न पारेमि ताव कायं
ध्यान प्रारम्भ (चित्र नं. ३ (पृ. १०) की तरह) ठाणेणं मोणेणं झाणेणं अप्पाणं वोसिरामि।
चतुर्विंशति-स्तव
। १. लोगस्स उज्जोयगरे, धम्मतित्थयरेजिणे
 अरिहंते  कित्तइस्सं, चउवीसंपि केवली ।। 
२. उसभमजियं च वंदे, संभवमभिनंदणं च सुमइं च।
पउमप्पहं सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे ।। 
३. सुविहिं च पुण्फदंतं, सीअल-सिज्जंस-वासुपुज्जं च।
विमलमणंतं च जिणं, धम्मं संतिं च वंदामि ।।
४. कुंधुं अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च ।। 
वं दामि रिद्वनेमिं, पासं तह वद्धमाणं च ।।
५.एवं मए अभिथुआ, विहुय-रयमला पहीण-जरमरणा। चउवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ।।
६. कित्तिय-बंदिय-मए, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा।
आरोग्ग-बोहिलाभं, समाहिवरमुत्तमं दिंतु ।।
 ७. चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पवासयरा। सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ।
१. दैवसिक और रात्रिक प्रतिक्रमण में ४, पाक्षिक में १२, चातुर्मासिक में २० और सावंत्सरिक में ४० लोगस्स का ध्यान करें।
नमस्कार-सूत्र
णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।
(ध्यान समाप्त)
चतुर्विंशति-स्तव
१. लोगस्स उज्जोयगरे, धम्मतित्थयरे जिणे। अरिहंते कित्तइस्सं, चउवीसंपि केवली ।।
२. उसभमजियं च वंदे, संभवमभिनंदणं च सुमई च।
पउमप्पहं  सुपासं, जिणं च चंदप्पहं वंदे।।
३. सुविहिं च पुप्फदंतं, सीअल-सिज्जंस वासुपुज्जं च। विमलमणंतं च जिणं, धम्मं संतिं च वंदामि ।।
४. कुंथुं अरं च मल्लिं, वंदे मुणिसुव्वयं नमिजिणं च ।। वंदामि रिट्ठनेमिं, पासं तह वद्धमाणं च ।।
५. एवं मए अभिथुआ, विहुय-रयमला यहीण-जरमरणा। चउवीसंपि जिणवरा, तित्थयरा मे पसीयंतु ।।
६. कित्तिय-बंदिय-मए, जे ए लोगस्स उत्तमा सिद्धा। आरोग्ग-बोहिलाभ, समाहिवरमुत्तमं दिंतु ।।
७. चंदेसु निम्मलयरा, आइच्चेसु अहियं पयासयरा । सागरवरगंभीरा, सिद्धा सिद्धिं मम दिसंतु ।।
वंदना सूत्र
इच्छामि खमासमणो ! बंदिउं, जावणिजाए निसीहियाए । अणुजाणह मे मिउग्गहं । निसीहि’ अहोकायं कायसंफासं 
खमणिज्जो थे किलामो। अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइक्कंतो ?? * जत्ता थे ?* जवणिज्जं च थे ?* खामेमि खमासमणो ! देवसियं वइक्कम आवस्सियाए पडिक्कमामि खमासमणाणं देवसियाए आसायणाए’ तित्तीसन्नयराए, जं किंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालियाए सव्वमिच्छो वयाराए सव्वधम्माइक्कमणाए आसायणाए जो मे देवसिओ’ अड़यारो कओ तस्स खमासमणो! पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।
वंदना सूत्र
इच्छामि खमासमणो ! वंदिठं, जावणिज्जाए निसीहियाए। अणुजाणह मे मिउग्गहं। निसीहि अहोकायं कायसंफासं। खमणिज्जो भे किलामो । अप्पकिलंताणं बहुसुभेण भे दिवसो वइक्कंतो* ?* जत्ता भे ?* जवणिज्जं च थे ?* खामेमि खमासमणो ! देवसियं वइक्कम आवस्सियाए पडिक्कमामि खमासमणाणं देवसियाए आसायणाए’ तित्तीसन्नयराए, जं किंचि मिच्छाए मणदुक्कडाए वयदुक्कडाए कायदुक्कडाए कोहाए माणाए मायाए लोभाए सव्वकालियाए सव्वमिच्छोवयाराए सव्वधम्माइक्कमणाए आसायणाए जो में देवसिओ अड़यारो कओ तस्स खमासमणो ! पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्याणं वोसिरामि ।
*चिह्नांकित स्थानों पर खड़े होने पर चित्र नं. ५ (पृ. ३०) की तरह और बैठने पर चित्र नं. ६ (पृ. ३०) की तरह वंदना करें।
(चित्र नं. ४ (पृ. १३) की तरह बैठकर) ‘मत्थएण वंदामि’ पांचवां आवश्यक समाप्त, छट्टे ‘प्रत्याख्यान’ आवश्यक की आज्ञा।
अतीत का प्रतिक्रमण, वर्तमान काल की सामायिक तथा भविष्यत् काल का प्रत्याख्यान ।
सामायिक, चतुर्विंशति-स्तव, वंदना, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग, प्रत्याख्यान-
इन छहों आवश्यकों में जाने-अनजाने जो कोई अतिचार-दोष लगा हो तथा पाठ का उच्चारण करते समय मात्रा, अनुस्वार, अक्षर हीन, अधिक, ऊंचा, नीचा, आगे पीछे कहा हो तो जो मे देवसिओ अइयारो  कओ ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ।’
१. देवसिओ, राइओ, देवसिओ पक्खिओ, देवसिओ चाउमासिओ पक्खिओ, देवसिओ संवच्छरिओ।
२.दैवसिक तथा रात्रिक प्रतिक्रमण में कम से कम एक दिन के लिए त्याग करें। जैसे पापड़ खाने का त्याग, नवकारसी का त्याग आदि। इसी प्रकार
पाक्षिक में एक पक्ष के लिए, चातुर्मासिक में चार मास के लिए, सांवत्सरिक में एक वर्ष के लिए कोई प्रत्याख्यान करें।
 शक्र स्तुति
नमोत्थु णं अरहंताणं भगवंताणं आइगराणं तित्थयराणं सहसंबुद्धाणं पुरिसोत्तमाणं पुरिससीहाणं पुरिसवरपुंडरीयाणं पुरिसवरगंधहत्थीणं लोगुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगहियाणं लोगपईवाणं लोगपज्जोयगराणं अभयदयाणं चक्खुदयाणं मग्गदयाणं सरणदयाणं जीवदयाणं बोहिदयाणं धम्मदयाणं धम्मदेसयाणं धम्मनायगाणं धम्मसारहीणं धम्मवरचाउरंत-चक्कवट्टीणं दीवो ताणं सरणं गई पइट्ठा अप्पडिहय-वरनाणदंसणधराणं विअट्टछउमाणं जिणाणं जावयाणं तिन्नाणं तारयाणं बुद्धाणं बोहयाणं मुत्ताणं मोयगाणं सव्वण्णूणं सिवमयलमरुयमणंतमक्खयमव्वाबाह-सव्वदरिसीणं मपुणरावत्तयं सिद्धिगइनामधेयं ठाणं संपत्ताणं नमो जिणाणं जियभयाणं।
शक्र-स्तुति
नमोत्थु णं अरहंताणं भगवंताणं आइगराणं तित्थयराणं सहसंबुद्धाणं पुरिसोत्तमाणं पुरिससीहाणं पुरिसवरपुंडरीयाणं पुरिसवरगंधहत्थीणं लोगुत्तमाणं लोगनाहाणं लोगहियाणं लोगपईवाणं लोगपज्जोयगराणं अभयदयाणं चक्खुदयाणं मग्गदयाणं सरणदयाणं जीवदयाणं बोहिदयाणं धम्मदयाणं धम्मदेसयाणं धम्मनायगाणं धम्मसारहीणं धम्मवरचाउरंत-चक्कवट्टीणं दीवो ताणं सरणं गई पइट्ठा अप्पडिहय-वरनाणदंसणधराणं विअट्टछउमाणं जिणाणं जावयाणं तिन्नाणं तारयाणं बुद्धाणं बोहयाणं मुत्ताणं मोयगाणं सव्वष्णूणं सव्वदरिसीणं सिवमयलमरुयमणंतमक्खयमव्वाबाह-मपुणरावत्तयं सिद्धिगइनामधेयं ठाणं संपाविउकामाणं नमो जिणाणं जियभयाणं।
पहला नमोत्थु णं सिद्ध भगवान के प्रति, दूसरा नमोत्थु णं अरिहंत भगवान के प्रति। तीसरा नमोत्थु णं मम धम्मायरियस्स धम्मोवदेसगस्स थवत्थुई मंगलं श्री श्री श्री १००८ आचार्यश्री महाश्रमणजी के प्रति ।
(‘नमस्कार सूत्र’ का पांच बार पाठ करें) णमो अरहंताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरियाणं, णमो
उवज्झायाणं, णमो लोए सव्वसाहूणं।
पंचपद वदना (चित्र नं. १ (पृ. ८) की तरह)
णमो अरहंताणं- परम अर्हता सम्पन्न, चार घनघाती कर्म का क्षय कर, अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन, अनंत चारित्र, अनंत शक्ति और आठ प्रातिहार्य- इन बारह गुणों से सुशोभित, चौंतीस अतिशय, पैंतीस वचनातिशय से युक्त, धर्मतीर्थ के प्रवर्तक, वर्तमान तीर्थंकर सीमंधर आदि अर्हतों को विनम्र भाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक भावभीनी वंदना (तिक्खुत्तो आयाहिणं पयाहिणं करेमि) वंदामि नमंसामि सक्कारेमि सम्माणेमि १. “तिक्खुत्तो…. करेमि” यह बोलना नहीं है। कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासामि मत्थएण वंदामि ।
णमो सिद्धाणं- 
परम सिद्धि संप्राप्त, अष्टकर्म क्षय कर केवलज्ञान, केवलदर्शन, असंवेदन, आत्मरमण, अटल अवगाहन, अमूर्ति, अगुरुलघु और निरंतराय – इन आठ गुणों से सम्पन्न, परमात्मा, परमेश्वर, जन्म-मरण-जरा-रोग-शोक-दुःख-दारिद्र्य रहित अनंत सिद्धों को विनम्र भाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक भावभीनी वंदना- वंदामि नमंसामि सक्कारेमि सम्माणेमि कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासामि मत्थएण वंदामि।
णमो आयरियाणं-
परम आचार-कुशल, धर्मोपदेशक, धर्मधुरंधर, बहुश्रुत, मेधावी, सत्यनिष्ठ, श्रद्धा-धृति-शक्ति-शांति सम्पन्न, अष्ट गणि-सम्पदा से सुशोभित, दव्य, क्षेत्र, काल और भाव के ज्ञाता, चतुर्विध धर्मसंघ के शास्ता, तीर्थकर के प्रतिनिधि एवं छत्तीस गुणों के धारक वर्तमान आचार्यश्री महाश्रमण आदि धर्माचार्यों को विनम्र भाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक भावभीनी वंदना- वंदामि नमंसामि सक्कारेमि सम्माणेमि कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासामि मत्थएण वंदामि।
णमो उवज्झायाणं- 
परमश्रुत स्वाध्यायी, धर्मसंघ में आचार्य द्वारा नियुक्त, ग्यारह अंग तथा बारह उपांग के धारक, अध्ययन और अध्यापन में कुशल-इन पच्चीस गुणों से
सुशोभित उपाध्यायों को विनम्र भाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक भावभीनी वंदना-बंदामि नमंसामि सक्कारेमि सम्माणेमि कल्लाणं मंगलं देवयं चेयं पज्जुवासामि मत्थएण वंदामि।
णमो लोए सव्वसाहूणं- अध्यात्म-साधना में संलग्न, पांच महाव्रत, पंचेन्द्रिय निग्रह, चार कषाय-विवेक, भाव सत्य, करण सत्य, योग सत्य, क्षमा, वैराग्य, मन-वचन-काय समाहरणता, ज्ञान, दर्शन, चारित्र सम्पन्नता, वेदना और मृत्यु के प्रति सहिष्णुता – इन सत्ताईस गुणों से सुशोभित, परीषहजयी, प्रासुक एषणीय भोजी, अर्हत् और आचार्य की आज्ञा के आराधक, तपोधन साधु-साध्वियों को विनम्र भाव से पंचांग प्रणतिपूर्वक भावभीनी वंदना- वंदामि नमंसामि सक्कारेमि वंदामि। सम्माणेमि कल्लाणं मंगलं देवयं चेइयं पज्जुवासामि मत्थएण वंदामि 
नमस्कार-सूत्र
अर्हतों को मेरा नमस्कार हो, सिद्धों को मेरा नमस्कार हो, आचार्यों को मेरा नमस्कार हो, उपाध्यायों को मेरा नमस्कार हो, लोक के सर्व साधुओं को मेरा नमस्कार हो।
यह पंच नमस्कार महामन्त्र सब पापों का विनाशक है और सब मंगलों में उत्कृष्ट मंगल है।
वंदन-विधि
मैं दाई ओर से आरंभ कर, तीन बार प्रदक्षिणा देते हुए वंदना करता हूं, नमस्कार करता हूं, सत्कार करता हूं, सम्मान करता हूं। आप कल्याणकारी हैं, मंगल हैं, धर्मदेव हैं, ज्ञानवान् हैं (चित्त को प्रसन्न करने वाले हैं), मैं आपकी पर्युपासना करता हूं, मस्तक झुकाकर वंदना करता हूं।
मंगल-सूत्र
चार मंगल हैं- अर्हत्, सिद्ध, साधु और केवलि-प्रज्ञप्त धर्म। लोक में चार उत्तम हैं- अर्हत, सिद्ध, साधु और केवलि-प्रज्ञप्त धर्म।
चार की शरण में जाता हूं- अर्हतों की, सिद्धों की, साधुओं की और केवलि-प्रज्ञप्त धर्म की।
सामायिक-प्रतिज्ञा
भगवन्! मैं सामायिक-व्रत (समत्व की साधना) ग्रहण करता हूं। सावद्य योग का (पाप सहित प्रवृत्ति) एक मुहूर्त (४८ मिनट) तक मैं दो करण, तीन योग से (न करूं, न कराऊं, मन से, वचन से, काया से) त्याग करता हूं। अतीत के सावद्य योग का प्रतिक्रमण करता हूं, उसकी निन्दा करता हूं, गर्हा करता हूं और अपने आपको उससे व्युत्सर्ग करता हूं।
ईर्यापथिक-सूत्र
मैं ईर्यापथ सम्बन्धी विराधना के लिए प्रतिक्रमण करना चाहता हूं-जाने-आने में, प्राणों (द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय) को लांघते समय, बीजों को लांघते समय, हरितकाय को लांघते समय तथा ओस, कीटिका-नगर (चींटियों के बिलों), फफूंदी, कीचड़ और मकड़ी के जालों के संक्रमण करते समय जो ये जीव विराधित हुए हों, एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय। सामने आते हुए जीवों को हत किया हो, उनकी दिशा बदली हो, उन्हें चोट पहुंचाई हो, उन्हें इकट्ठा किया हो, उन्हें हिलाया-डुलाया हो, उन्हें परितप्त किया हो, उन्हें क्लान्त किया हो, उन्हें उत्त्रासित किया हो, उन्हें मेरा दुष्कृत निष्फल हो। स्थानान्तरित किया हो, उन्हें जीवन से रहित किया हो, उससे संबंधित
कायोत्सर्ग -प्रतिज्ञा
मैं अविधिकृत आचरण के परिष्कार द्वारा, प्रायश्चित्त द्वारा, विशोधन द्वारा और शल्य (अपराध) विमोचन द्वारा पाप कर्मों को नष्ट करने के लिए कायोत्सर्ग में स्थित होता हूं। उच्छ्वास, निःश्वास, खांसी, छींक, जम्हाई, डकार, अधोवायु, चक्कर, पित्तजनित मूच्छा, शरीर के अंगों के सूक्ष्म संचार, श्लेष्म के सूक्ष्म संचार और दृष्टि के सूक्ष्म संचार-ये प्रवृत्तियां कायोत्सर्ग में बाधक नहीं बनेंगी। इसी प्रकार के अन्य (स्वाभाविक और विकारजनित) अपवादों के द्वारा भग्न और विराधित नहीं हो मेरा कायोत्सर्ग। जब तक मैं अर्हत् भगवान् को नमस्कार कर उसे सम्पन्न न करूं, तब तक मैं काया को स्थान-स्थिर मुद्रा, मौन और शुभ ध्यान के द्वारा अपनी आत्मा (शरीर) का व्युत्सर्ग करता हूं।
चतुर्विंशति-स्तव
१. लोक में प्रकाश करने वाले, धर्मतीर्थ के प्रवर्तक, जिन, अर्हत्, चौबीस ही केवलियों का मैं कीर्तन करूंगा।
२. मैं ऋषभ और अजित को वंदन करता हूं। संभव, अभिनन्दन, सुमति को वन्दन करता हूं। पद्मप्रभ, सुपार्श्व और चन्द्रप्रभ जिनेश्वर को वन्दन करता हूं।
३. मैं पुष्पदन्त यानी सुविधि, शीतल, श्रेयांस, वासुपूज्य, विमल, अनन्त, धर्म और शान्ति जिनेश्वर को वन्दन करता हूं।
४. मैं कुन्थु, अर, मल्लि, मुनिसुव्रत और नमि जिनेश्वर को वन्दन करता हूं। मैं अरिष्टनेमि, पार्श्व तथा वर्द्धमान को वन्दन करता हूं।
५. इस प्रकार जिनकी मैंने स्तुति की है, जिन्होंने कर्म-रज मल को धुन डाला है, जो जरा और मरण से मुक्त हैं, वे चौबीस ही जिनवर तीर्थंकर मुझ पर प्रसन्न हों।
६. मैंने जिनका कीर्तन और वन्दन किया है, जो ये लोक में उत्तम सिद्ध हैं (वे) आरोग्य, बोधिलाभ और उत्तम समाधिवर दें।
७. चन्द्रों से निर्मलतर, सूर्यों से अधिक प्रकाश करने वाले और समुद्र से अधिक गंभीर सिद्ध भगवान मुझे सिद्धि प्रदान करें।
शक्र-स्तुति
मेरा नमस्कार हो अर्हत्, भगवान्, धर्म के आदिकर्ता, तीर्थंकर, स्वयं संबुद्ध, पुरुषोत्तम, पुरुषसिंह, पुरुषों में प्रवर पुंडरीक, पुरुषों में प्रवर गंधहस्ती, लोकोत्तम, लोकनाथ, लोकहितकारी, लोकप्रदीप, लोक में उद्योत करने वाले, अभयदाता, चक्षुर्दाता, मार्गदाता, शरणदाता, जीवनदाता, बोधिदाता, धर्मदाता, धर्मोपदेष्टा, धर्मनायक, धर्म सारथि, धर्म के प्रवर चतुर्दिजयी चक्रवर्ती को। जो द्वीप हैं, त्राण हैं, शरण, गति और प्रतिष्ठा हैं। अबाधित प्रवरज्ञान-दर्शन के धारक, आवरण रहित, ज्ञाता और ज्ञान देने वाले को, तीर्ण और तारक को, बुद्ध और बोधिदाता को, मुक्त और मुक्तिदाता को, सर्वज्ञ और सर्वदर्शी को,
कल्याणकारी, अचल, अरुज, अनन्त, अक्षय, अव्याबाध, पुनरावृत्ति से रहित, सिद्धि गति नामक स्थान को सम्प्राप्त (संप्राप्त करने वाले) उन जिनेश्वरों भयविजेताओं को नमस्कार हो।
प्रतिक्रमण प्रतिज्ञा
भगवन् ! अपनी इच्छा से मुझे आप ‘आवश्यक’ की स्वीकृति दें। मैं दैनिक अतिचारों से निवृत्त होने के लिए प्रतिक्रमण में स्थित होता हूं। मैंने दिन में जो ज्ञान, दर्शन और देश चारित्र व तप आराधना की, उसमें कोई अतिचार (दोष) लगा हो तो उसके चिंतन के लिए मैं कायोत्सर्ग करता हूं।
प्रायश्चित्त-सूत्र
मैं अपने द्वारा किए हुए दैवसिक अतिचार के प्रतिक्रमण की इच्छा करता हूं। मैंने कायिक, वाचिक, मानसिक अतिचार किया हो, उत्सूत्र की प्ररूपणा की हो, उन्मार्ग-मोक्ष मार्ग के प्रतिकूल मार्ग का प्रतिपादन किया हो, अकल्प्य विधि के विरुद्ध आचरण किया हो, अकरणीय कार्य किया हो, अशुभ ध्यान- आर्त्त-रौद्र ध्यान किया हो, असद् चिन्तन किया हो, अनाचार और अवांछनीय का आचरण किया हो, श्रावक के लिए अयोग्य कार्य का आचरण किया हो, ज्ञान तथा दर्शन, देश-चारित्र, श्रुत और सामायिक के विषय में तथा तीन गुप्ति, चार कषाय, पांच अणुव्रत, तीन गुणव्रत, चार शिक्षाव्रत आदि द्वादशविध श्रावक धर्म को जो खण्डित किया हो, जो विराधित किया
हो। उससे संबंधित मेरा दुष्कृत निष्फल हो।
वंदना-सूत्र
हे क्षमाश्रमण ! मैं संयत निषद्या से बैठकर वन्दना करना चाहता
हूं। मुझे अनुज्ञा दें मितावग्रह में प्रवेश करने की, बैठकर आपके चरणों का शरीर से (हाथों से) स्पर्श करने की। (इस स्पर्श से) आपको कष्ट हुआ हो तो मैं क्षम्य हूं।
आप कष्टानुभूति से रहित हैं। आपका दिन बहुत शुभ प्रवृत्ति से
बीता ?
आपकी यात्रा प्रशस्त रही ?
आपका यमनीय प्रशस्त रहा ?
हे क्षमाश्रमण ! दिवस संबंधी व्यतिक्रम के लिए क्षमा चाहता हूं।
अवश्यकरणीय समाचारी के विषय में प्रतिक्रमण करता हूं, क्षमाश्रमणों की दिवस-संबंधी तेतीस में से कोई एक भी आशातना की हो, आपके प्रति यत् किञ्चित् मिथ्याभाव आया हो, आपके प्रति मन का दुष्प्रयोग किया हो, वचन का दुष्प्रयोग किया हो, काया की दुष्प्रवृत्ति की हो, क्रोधवश व्यवहार किया हो, मानवश व्यवहार किया हो, मायावश व्यवहार किया हो, लोभवश व्यवहार किया हो, सर्वकाल में होने वाली, सर्वमिथ्या उपचारों से युक्त, सब धर्मों का अतिक्रमण करने वाली, कोई भी आशातना की हो, उनके विषय में जो मैंने
अतिचार किया हो, हे क्षमाश्रमण! मैं उसका प्रतिक्रमण करता हूं, निन्दा करता हूं, गर्हा करता हूं, आशातना में प्रवृत्त अपने आपको उससे व्युत्सर्ग करता हूं।
आलोचना-सूत्र
उस सर्व दैवसिक अतिचार की- दुश्चिंतन, दुर्भाषित और दुर्चेष्टय की उसकी आलोचना करता हूं, उससे प्रतिक्रान्त होता हूं, उसकी निंदा करता हूं, गर्हा करता है, अपने आपको उससे व्युत्सर्ग करता हूं।
अभ्युत्थान-सूत्र
मैं केवलीप्रज्ञप्त धर्म की आराधना करने के लिए अभ्युत्थान करता हूं। उसकी विराधना से विरत होता हूं। सर्व-त्रिविध योग से प्रतिक्रान्त होकर चौबीस तीर्थंकरों को वन्दना करता हूं।
कायोत्सर्ग संकल्प-सूत्र
दैवसिक अतिचारों के विशोधन के लिए कायोत्सर्ग करता हूं।
सामायिक-प्रतिज्ञा
करेमि भंते ! सामाइयं सावज्जं जोगं पच्चक्खामि जाव नियमं मुहुत्तं एगं पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं न करेमि, न कारवेमि, मणसा, वयसा, कायसा, तस्स भंते ! पडिक्क्रमामि निंदामि गरिहामि
अप्पाणं वोसिरामि ।
सामायिक-आलोचना
नौवें सामायिक व्रत में जो कोई अतिचार-दोष लगा हो तो मैं उसकी आलोचना करता हूं।
१. मन की सावद्य प्रवृत्ति की हो।
२. वचन की सावद्य प्रवृत्ति की हो।
३. शरीर की सावद्य प्रवृत्ति की हो।
४. सामायिक के नियमों का पूरा पालन न किया हो।
५. अवधि से पहले सामायिक को पूरा किया हो। ‘तस्स मिच्छा मि दुक्कडं इनसे लगे मेरे पाप मिथ्या हो, निष्फल हो।
पौषध-प्रतिज्ञा
एक्कारसमं पोसहोववासव्वयं असण-पाण-खाइम-साइम-पच्चक्खाणं अबंभ-पच्चक्खाणं उम्मुक्क्रमणि-सुवण्णाइ-पच्छाक्खाणं माला-वण्णग-विलेवणाइ-पच्चक्खाणं सत्थमूसलाइ सावज्ज – जोग-पच्चक्खाणं जाव अहोरत्तं पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा वोसिरामि ! कायसा तस्स भंते ! पडिक्तमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं
७१पौषध-आलोचना पाठ (गद्य)
ग्यारहवें पौषध-व्रत में जो कोई अतिचार (दोष) लगा हो तो मैं उसकी आलोचना करता हूं/करती हूं।
१. शय्या संथारे का (सोने-बैठने के स्थान और बिस्तर विधिवत्) का प्रतिलेखन नहीं किया हो।
२. शय्या, संथारे का विधिवत् प्रमार्जन नहीं किया हो।
३. उच्चार, प्रस्त्रवण भूमि (मल, मूत्र, खंखार परिष्ठापन करने के स्थान) का विधिवत् प्रतिलेखना नहीं किया हो।
हो। ४. उच्चार, प्रस्त्रवण भूमि का विधिवत् प्रमार्जन नहीं कियाहो। 
५. पौषध-व्रत के नियमों का विधिवत् पालन नहीं किया
तस्स मिच्छा मि दुक्कडं – इनसे लगे मेरे पाप मिथ्या हो, निष्फल हों।
मौलिकता को सुरक्षित रखते हुए ‘आवश्यक सूत्र’ को नया रूप देने का निर्णय लिया है। चउवीसत्थव आदि मूल सूत्रों को उसी रूप में रखकर श्रावक-व्रत और अतिचारों को पद्म-बद्ध हिन्दी भाषा में रूपान्तरित कर हमने अपने निर्णय को क्रियान्वित कर दिया। इसके साथ एक निश्चित विधि भी निर्धारित कर दी। विधि सहित
आचार्य तुलसी 

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