भगवान् श्री श्रेयांसनाथ
तीर्थङ्कर गोत्र का बंध
अर्ध-पुष्कर द्वीप में राजा नलिनगुल्म राज्य वैभव को पाकर भी बेचैन रहते थे। सब कुछ पाकर भी उन्हें रिक्तता महसूस होती थी। आज हैं, कल क्या होगा ? यह चिन्ता उन्हें सदैव सताती रहती थी। जीवन में स्थायी शांति मिले, इसलिये उन्होंने राज्य त्यागा, वज्रदंत मुनि के पास दीक्षित हुए, तीव्र तप तपा, और परम अध्यात्मभाव से कर्मों की उत्कृष्ट निर्जरा कर तीर्थकर गोत्र का बंध किया। वहां से पंडितमरण पा कर आप महाशक्र स्वर्ग में नलिनीगुल्म विमान में देव बने ।
देवायु का पूर्ण भोग कर आर्य जनपद की समृद्ध नगरी सिंहपुरी के नरेश विष्णुदेव की महारानी विष्णुदेवी की कुक्षि में अवतरित हुए, महारानी को आये-चौदह महास्वप्नों से सबको विदित हो गया, हमारे यहां भुवनभास्कर का उदय होगा, ये स्वप्न असाधारण हैं, इन्हें देखने वाली माता तीर्थङ्कर या चक्रवर्ती को जन्म देती है।
गर्भकाल पूरा होने पर सुखपूर्वक फाल्गुन कृष्णा बारस को प्रभु का प्रसव हुआ। राजा विष्णुदेव ने देवैन्द्रों के उत्सव के बाद अदम्य उत्साह से जन्मोत्सव किया। याचकों को जन्म भर के लिये अयाचक बना दिया। राज्य के जेलखाने खाली कर दिये गये। घर-घर में उमंगका वातावरण छा गया।
नाम के दिन राजा विष्णुदेव ने उपस्थित जनसमूह को बताया, पिछले नौ महीनों में राज्य में हर प्रकार से श्रेयस्कर कार्य हुए है। राजवंश के लिये भी ये महीने श्रेयस्कर बीते हैं। जनपद के लिये भी चारों और श्रेयस्कर मंगलमय वातावरण रहा है, अतः बालक का नाम ‘श्रेयांस’ रखा जाये। सभी लोगों ने श्रेयांस कुमार कहकर बालक की पुकारा। आपके शरीर को अवगाहना अस्सी धनुष्य की थी तथा आयुष्य चौरासी लाख वर्ष का था।
राजा विष्णुदेव ने श्रेयांस कुमार के क्रमशः युवावस्था में आने पर अनेक सुयोग्य राजकन्याओं के साथ पाणिग्रहण कर-वाया, तथा आग्रहपूर्वक राज्याभिषेक किया। श्रेयांस कुमार ने राजा बनने के बाद राज्य का संचालन सुचारुप से किया। आपके राज्य-काल में लोग अनैतिक कार्यों से सदैव बचते रहे थे। व्यवस्था भी ऐसी कर दी गई थी कि अनैतिक बनने का प्रसंग ही नहीं रहे।
दीक्षा
चारित्र मोहनीय कर्म का प्रबल क्षयोपशम निकट समझ कर प्रभु ने अपने उत्तराधिकारी को राज्य सौंप कर वर्षीदान दिया। आपके प्रति आस्था रखने वाले अनेकों व्यक्ति आपकी विरक्ति को देखकर विरक्त हो गये थे, और भ० श्रेयांस नाथ के साथ दीक्षा लेने को तत्पर हो उठे। निश्चित तिथि, फाल्गुन कृष्णा एकादशी को प्रभु सुखपालिका पर बैठकर जन समूह
के साथ उद्यान में आये, पंचमुष्ठि लोच किया, तथा अशोक वृक्ष के नीचे एक हजार दीक्षार्थी व्यक्तियों के साथ सामायिक चारित्र ग्रहण किया।
दूसरे दिन सिद्धार्थपुर नगर में राजानंद के यहा (क्षीर) परमान्न से पारणा किया।
दो मास तक प्रभु छद्मस्थ अवस्था में विचरते रहे, तथा परीषहों को सहन करते हुए आपने ध्यान और स्वाध्याय से कर्मों की महान् निर्जरा की। माघ कृष्णा अमावस्या के दिन शुक्ल ध्यान से क्षपक श्रेणी ली, घाती-कर्मों को क्षय करके कैवल्य को प्राप्त किया। प्रथम प्रवचन में ही तीर्थ की स्थापना हो गई थी, बड़ी संख्या में लोगों ने साधु-धावक के व्रतों को ग्रहण किये थे।
आर्य जनपद में प्रभाव
भगवान् श्रेयांस कर धार्मिक प्रभाव जनपद में अप्रतिहत था। जनपद के अमीर और गरीब लोगों में आप समान आस्था के केन्द्र थे। तत्कालीन राजाओं पर भी आपका अमिट प्रभाव था ।
एक बार भगवान् श्रेयांसनाय विचरते-विचरते पोतनपुर पधारे। उद्यान में ठहरे। राजपुरूष ने अर्धचक्री प्रथम वासुदेव श्री त्रिपृष्ठ को प्रभु के आगमन की सूचना दी। सूचना पाकर बासुदेव त्रिपृष्ठ इतने हर्ष विभोर हुये कि सूचना देने वाले हो उन्होंने साढ़े बारह करोड़ मुद्रा का दान देकर अपना हर्ष प्रकट किया तथा तत्काल आकर प्रभु के दर्शन किये।
सत्तासीन व्यक्तियों से लेकर सेवाधीन व्यक्तियों तक आपके चरणों में परम उल्लास के साथ आते रहते थे।
प्रभु का परिवार
गणधर-बहत्तर (कच्छपमुनि आदि)
केवलज्ञानी -छ हजार पांच सौ
मनःपर्यवज्ञानी-छह हजार
अवधिज्ञानी-छह हजार
चतुर्दशपूर्वी-तेरह सौ
वैक्रियलब्धि धारी-ग्यारह हजार
चर्चावादी-पांच हजार
साधु-चौरासी हजार
साध्वियां-एक लाख तीन हजार (प्रवर्तिनी धारणी)
श्रावक-दो लाख उन्यासी हजार
श्राविकाएं-दो लाख अड़तालीस हजार
निर्वाण
भगवान् ने अपना निर्वाण काल निकट समझकर एक हजार मुनियों के साथ आजीवन अनशन ग्रहण किया। एक मास के अनशन में श्रावण कृष्णा तीज को सम्मेद शिखर पर भवोपग्राही कर्मों के क्षय होने से आपने सिद्धत्व प्राप्त किया ।
पांच कल्यानक तिथियां-
१. च्यवन -ज्येष्ठ कृष्णा ६
२. जन्म -फाल्गुन कृष्णा १२
३. दीक्षा -फाल्गुन कृष्णा १३
४. कैवल्य-प्राप्ति माघ कृष्णा १५
५. निर्वाण-श्रावण कृष्णा ३
६कैवल्य वृक्ष -ईबोनी
७प्रतीक-राइनोसेरस
