भगवान् श्री मल्लिनाथ
तीर्थकर गोत्र का बंध
उन्नीसवें तीर्थंकर मल्लिनाथ प्रभु स्वयं में एक आश्चर्य ये। शेष तीर्थंकरों ने पुरुष शरीर धारण किया था। किन्तु तीर्थंकर मल्लिनाथ ने स्त्री शरीर में जन्म लिया था। स्त्री-शरीर में इतना आत्म-विकास तथा इतना पुरुषार्थ स्वयं में एक आश्चर्य था ।
भगवान् मल्लि-प्रभु ने अपने पिछले जन्म में इन प्रकृतियों का बंध किया था। विदेह क्षेत्र की सलिलावती विजय में वीतशोका नगरी थी। वहां के राजा का नाम बल था। महा-रानी धारणी से एक पुत्र रत्न उत्पन्न हुआ। नाम रखा गया महाबल । महाबल जब तरुण हुआ तो माता-पिता ने पांच सौ राज-कन्याओं के साथ महाबल का विवाह कर दिया। अनेक वर्षों के बाद महाबल की कमलश्री नाम की पत्नी से प्रथम पुत्र उत्पन्न हुआ । उसका नाम बलभद्र रखा गया ।
सम्राट बल ने भव-प्रपंच से विरक्त होकर महाबल का राज्याभिषेक किया और धर्म-घोष आचार्य के पास दीक्षित होकर साधनारत बन गये। महाबल राजा बनकर राज्य का व्यवस्थित रूप से संचालन करने लगे। महाबल के छः अभिन्न मित्र थे-१. अचल, २. धरण, ३. पुरण, ४. वसु, २. वेश्रवण तथा ६. अभिचंद्र। एक बार वीतशोका नगरी में आचार्य धर्मघोष पुनः पधारे। महाबल राजा विरक्त होकर साधु बनने को तैयार हो गये। उनके साथ छहों मित्र भी तैयार हो गये। सातों ने धर्मघोष मुनि के पास दीक्षा ग्रहण कर ली।
दीक्षित होने के बाद सातों ने यह निश्चय किया कि तपस्या, अभिग्रह आदि सब साथ-साथ ही करेंगे, जिससे आगे भी हमारा साथ कायम रहे। यह निश्चय करने के बाद सभी साथ-साथ तप आदि करने लगे ।
एक बार महाबल मुनि के मन में विचार आया-अभी सातों में मेरा स्थान विशेष है, किन्तु समान तपस्या, अभिग्रह आदि से भविष्य में यह विशेषता नहीं रहेगी।
अहं के आवेश में उन्होंने गलत निर्णय ले लिया कि विशिष्ट बनने के लिए मुझे अपने साथियों से कुछ विशेष तप करना चाहिए। इसी कल्पना में वे पारणे के दिन जब सहवर्ती मित्र संत उनके लिए पारणा ले आते तब कहते कि तुम पारणा करो, मैंने तो आज आहार का त्याग कर दिया है। इस प्रकार छद्मपूर्वक तप एवं अहं और माया को प्रगाढ़ भावना से उनके स्त्री-गोत्र का बंध हो गया । किन्तु विशेष तपस्या एवं निर्जरा के कारण तीर्थंकर गोत्र का बंध भी हुआ ।
वहां से समाधिमरण पाकर अनुत्तर लोक के वैजयंत विमान में सभी मुनि देव-रूप में पैदा हुए ।
जन्म
देवायु भोगकर महाबल मुनिका जीव मिथिला नगरी के राजा कुम्भ के राजमहल में महाराणी प्रभावती की कुक्षि में अवतरित हुआ। माता के चौदह महास्वप्न आये ।
गर्भकाल पूर्ण होने के बाद सबकी आशा के विपरीत एक पुत्री का प्रसव हुआ। उस समय राजघरानों में पुत्र का ही उत्सब होता था, किन्तु देवेन्द्रों ने नवजात बालिका का उत्सव किया। तब राजा कुम्भ भी अपने सहज समुत्पन्न उल्लास को रोक नहीं सके। उन्होंने परम्परा को तोड़कर पुत्री का जन्मो-त्सव पुत्र के जन्मोत्सव की भांति मनाया
नामकरण
नामकरण महोत्सव भी विशाल रूप में आयोजित हुआ । राजा कुम्भ ने सबको बताया- इसके गर्भकाल में रानी को पुष्प-शैय्या पर सोने का दोहद (इच्छा) उत्पन्न हुआ था। जिसे देवों ने पूरा किया था, अतः बालिका का नाम मल्लि कुमारी रखा जाये। उनके शरीर की ऊंचाई पचीस धनुष्य की थी।
मित्रों को प्रतिबोध
मल्लिकुमारी के क्रमशः तारुण्य में प्रवेश करते ही उनके सौंदर्य में अद्भुत निखार आ गया था। आपके रूप की महिमा दूर-दूर तक फैल चुकी थी। इधर मल्लिकुमारी ने अवधि-ज्ञान से अपने पूर्व-भव के छः मित्रों को जब निकटवर्ती जनपदों में राजा बने देखा, तो उनको प्रतिबोध देने के लिए अपने उद्यान में एक मोहनघर का निर्माण करवाया। उस भवन के मध्य भाग में ठीक अपनी जैसी रूप वाली एक स्वर्ण-पुतली स्थापितकी।
मूर्ति के चारों ओर पुतली बनवावे। कक्षों के भीतर के द्वार इस रुप में खुलते थे अन्दर खड़े व्यक्तियों को सिर्फ मूर्ति ही दिखाई दे और कुछ भी नजर न आये। वह पुतली भीतर से पोली थी तथा गले के पास से खुलती थी। प्रति दिन मल्लिकुमारी अपने भोजन का एक कौर उस पुतली के गले में डाल देती थी।
उधर अलग-अलग सूत्रों से वहीं मित्र-राजाओ के पास मल्लिकुमारी के रूप की ख्याति पहुंची। अनुरक्तमना छ
ओ राजाओं ने दूत भेजकर कुम्भ राजा से मल्लिकुमारी के लिए याचना की। राजा कुम्भ के मना कर देने पर यहाँ राजा सेनाएं लेकर मिथिला की ओर चल पड़े।
महाराज कुम्भ छहों राजाओ को ससैन्य मिथिला के समीप आया सुनकर चिन्तित हो उठे। एक साथ छहों से युद्ध करने में वे स्वयं को असमर्थ पा रहे थे। तभी राजकुमारी मल्लि चरण वन्दन के लिए पिता के पास उपस्थित हुयी। उसने चिन्तित पिता से निवेदन किया-बेकार युद्ध को क्यों सोच रहे हैं ? मैं इस समस्या को हल कर लूंगी, आप निश्चित रहें।
राजा से आज्ञा पाकर राजकुमारी मल्लि ने छहों राजाओं के पास अलग-अलग दूत भेजे और अशोक-वाटिका में मिलने का प्रस्ताव रखा। सभी राजाओं ने मिलना स्वीकार कर लिया । सब यही जानते थे कि मुझे ही बुलाया गया है। निश्चित समय पर छहों राजाओं ने अलग-अलग द्वारों से अलग-अलग प्रकोष्ठों में प्रवेश किया। प्रवेश करने वाले छह राजाओं के नाम थे-
१. साकेतपुरी के राजा प्रतियुद्ध
२. चम्पा के राजा। चन्द्रछाग
३. कुणाला के राजा रुक्मी
४. वाराणसी के राजा शंख
५. हस्तिनापुर के राजा। अदीनशत्रु
६. कपिलपुर के राजा। जितशत्रु
मित्र राजा अशोक वाटिका के मोहनघर में पहुंचे तो वहां सुसज्जित पुतली को मल्लिकुमारी समझकर निहारने लगे। रूप में उन्मत्त होकर वे उसे देख ही रहे थे कि मल्लि कुमारी ने वहां आकर पुतली के ऊपर का ढक्कन उतार दिया । ढक्कन के अलग होते ही भीतर से सड़े हुए अन्न की दुर्गन्ध चारों ओर फैल गयी। दुर्गन्ध के फैलते ही राजा लोग
नाक-भी सिकोड़ते हुए इधर-उधर झांकने लगे।
अवसर देखकर राजकुमारी मल्लि ने कहा- राजाओं । प्रतिदिन एक कौर अन्न डालने से ही पुतली में इतनी सड़ांध पैदा हो गई है, तो यह शरीर तो मात्र अन्न का ही पुतला है। हाड़-मांस व मल-मूत्र के अतिरिक्त इसमें है ही क्या ? फिर इस पर आसक्ति कैसी? आप लोग आसक्ति छोड़िये और पवित्र मैत्री सम्बन्धों को याद कीजिये। आज से तीसरे जन्म में हम अभिन्न मित्र थे। मेरा नाम महाबल था। आप लोगों के नाम अमुक-अमुक थे। आइए, इस बार प्रबल साधना करके हम सातों शाश्वत स्थान को प्राप्त करें, जहां से हमारा अलगाव कभी हो ही नहीं।
मल्लिकुमारी के इस प्रेरक उद्वबोधन पिछले जन्म की बातों से राजाओं को जाति-स्मरण ज्ञान हो गया। उन्होंने अपने पिछले सम्बन्धों को स्वयं देख लिया। तत्काल सभी विरक्त होकर बोले-भगवती! क्षमा करें, हमसे अनजाने में गल्ती हुई है। अब हम विरक्त हैं, आज्ञा दीजिये, आपके साथ साधना करके बन्धन-मात्र को क्षय कर डालें ।
राजकुमारी मल्लि की स्वीकृति पाकर वहाँ राजा अपनी-अपनी राजधानी में आकर चारित्र लेने की तैयारी में जुट गये। उधर राजकुमारी मल्लि ने भी दीक्षा लेने की घोषणा की। वर्षीदान देने के बाद निर्धारित तिथि पौष शुक्ला इग्यारस के दिन तीन सौ स्त्रियों तथा तीन सौ पुरुषों के साथ मल्लि भगवती ने दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के दिन अट्ठम भक्त (तेला) था। दूसरे दिन मिथिला के राजा विश्वसेन के यहां पारणा किया था।
दीक्षा लेते ही आप मन पयर्वज्ञानी बन गई थी। भगवती मल्लि कायोत्सर्ग युक्त ध्यान में तन्मय बनी तथा उसी दिन के तीसरे प्रहर में क्षपक श्रेणी लेकर सर्वज्ञता प्राप्त की। इस अवसर्पिणी में सबसे कम छद्मस्थ चारित्र की पर्याय पालने वाली तीर्थंकर आप ही थीं। दीक्षा के दिन सर्वज्ञता सिर्फ आप को ही प्राप्त हुयी थी ।
देवेन्द्रों ने उत्सव के बाद समवशरण की रचना की। भगवती मल्लि ने प्रथम प्रवचन दिया। प्रवचन के अनंतर ही तीर्थ की स्थापना हो गई। अनेक व्यक्तियों ने निकेत व अनि-केत धर्म साधनाएं स्वीकार की।
प्रभु का परिवार
गणधर -अट्ठाईस (अधीक्षक आदि)
केवलज्ञानी, -तीन हजार दो सौ
मनःपर्यव ज्ञानी -आठ सौ
अवधिज्ञानी- दो हजार
चतुर्दश पूर्वी – छ सौ चवदह
वैक्रिय लब्धिधारी -तीन हजार पांच सौ
चर्चावादी – एक हजार चार सौ
साधु चालीस हजार
साध्वियां -पचपन हजार (प्रवरतिनी श्री बंधुमती)
श्रावक- एक लाख चौरासी हजार
श्राविकाएं- क्तीन लाख पैंसठ हजार
निर्वाण
सुदीर्घ काल तक धर्म-संघ की प्रभावना कर में अंत में पांच सौ आर्यिकाओं तथा पांच मुनियो के साथ,एक मास के आजोवन अनशन में अवशिष्ट कर्म की प्रकृतियो को क्षयकर आपने सिद्धत्व को प्राप्त किया।
दिगम्बर मान्यता में मल्लिनाथ को पुरुष माना गया है, क्योंकि उनकी मान्यता के अनुसार स्त्री, को मोक्ष प्राप्ति नहीं हैं।
भगवान् मल्लिनाथ का सर्वायुष्य पचपन हजार वर्ष कर
था।
पांच कल्यानक तिथियां –
१. च्यवन- फाल्गुन शुक्ला ४
२. जन्म-मृगशर शुक्ला ११
३. दीक्षा-पौष शुक्ला ११
४. कैवल्य-प्राप्ति-मूगशर शुक्ला ११
५. निर्वाण चैत्र शुक्ला ४
६.कैवल्य वृक्ष -अशोक
७.प्रतीक -कलश
