भगवान् श्री महावीर
भगवान् ऋषभ तीसरे आरे (काल विभाग) के अन्त में हुये थे। और भगवान् महावीर ने चौथे आरे के अन्त में जन्म लिया था। इस अवसर्पिणी काल के वे अंतिम तीर्थङ्कर थे। आज का जैन-दर्शन उनकी वाणी का ही फलित है। भगवान् महावीर इतिहासकारों की दृष्टि में महान् क्रांतिकारी, परम अहिंसा-वादी तथा उत्कृष्ट साधक थे। उन्होंने पशु-बलि का विरोध किया, जातिवाद का विरोध किया और दास प्रथा को हिंसा जनक बतलाया। धर्म के ठेकेदारों ने तब धर्म को अपने-अपने कटघरों में बन्द कर रखा था। उस समय में जन साधारण तक धर्म का श्रोत प्रवाहित करने का कठिनतम कार्य भगवान् महाबीर ने ही किया। स्वयं राजमहल में जन्म लेकर भी दलित वर्ग को गले लगाया। उसे धर्म का अधिकार प्रदान किया। सचमुच भगवान् महावीर अपने युग के मसीहा थे।
पूर्व-भव
भगवान् महावीर को अपने पूर्व-जन्मों में विशेष साधना करने का अवसर मिला था। बहुत पहले भगवान् ऋषभदेव के पास में वे संयमी बने थे। किन्तु मुनिचर्या की जानकारी नहीं होने के कारण वे एक संन्यासी बन गये थे किन्तु रहते वे ऋषभ के साथ ही। एक दिन सम्राट भरत ने भगवान् ऋषभ से पूछा-इस अवसर्पिणी काल में होने वाले तीर्थंकरों में से कोई यहां समवशरण में मौजूद है? प्रभु ने कहा समवशरण में तो नहीं है. किन्तु बाहर तुम्हारा पुत्र मरीचि बैठा है, यह इस अवसरिणी काल में अंतिम तीर्थकर होगा। इससे पहले वह प्रथम वासुदेव त्रिपुष्ट नाम से तथा महाविदेह क्षेत्र में चक्रवतीं भी बनेगा। त्रिपृष्ट वासुदेव के भव में उन्होंने एक सिंह को हाथों से चीर कर मार दिया था, तया प्रतिवासुदेव को मारकर त्रिखण्डाधिपति वासुदेव बने थे। वे एक क्रूर शासक थे।
एक बार रात्रि में संगीत हो रहा था। चक्रवर्ती स्वयं शय्यापालक से यह कह कर सो गए कि मुझे नींद आने पर संगीत बन्द करवा देना। कुछ समय में उन्हें नींद आ गई, किन्तु संगीत-रसिक शय्यापालक ने संगीत बंद नहीं करवाया। त्रिपृष्ट जब वापिस जागे, वे एकदम क्रुद्ध हो उठे। पूछने पर शय्यापालक ने निवेदन किया-मेरा अपराध क्षमा करें, संगीत मधुर चल रहा था. अतः बन्द नहीं किया गया। वासुदेव त्रिपुष्ट ने क्रोधित होकर सीसा गर्म करवाया और शय्या पालक के कानों में डलवा दिया। इस प्रकार उस जन्म में उन्होंने अनेक हिंसक काम किये। वहां से मरकर वे सातवी नरक में गये। जैन-दर्शन की स्पष्ट मान्यता है कि भले
ही तीर्थङ्कर बनने वाले भी जीव क्यों न हों, कर्म अगर असत् किये है तो अधम गति में जाना ही होगा। महाबीर के सत्ताईस पूर्व जन्मों से यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है। चारों गतियों में आचरणानुसार उनके जीव को जाना पड़ा था।
तीर्थङ्कर गोत्र का बन्ध
सत्ताइस भवों में से पचीसवें भव में महावीर का जीव अहिश्छत्रा नगरी में महाराज जितशत्रु के प्रथम पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए थे। माता-पिता ने उनका नाम नन्दनकुमार रखा । राजकुमार नन्दन क्रमशः बड़ा हुआ। एक बार उसे पोट्टिलाचार्य का उपदेश सुनने का अवसर मिला। उसी समय में संसार से विरक्त होकर राजसी-वैभव का त्याग किया, और संयमी बना ।
संयम लेने के बाद नन्दन मुनि घोर तपस्या करने लगे। एक लाख वर्ष तक उन्होंने संयम पाला और निरंतर मास-मास-खमण को तपस्या करते रहे। इस अवधि में नन्दन मुनि के ग्यारह लाख साठ हजार मासखमण हुए। शेष तीन हजार तीन सौ तेतीस वर्ष तीन मास उन्तीस दिनों में उन्होंने पारणे के रूप में भोजन किया था। विशेष तपस्या व सेवा से विशेष कर्म-निर्जरा होकर आपके तीर्थंकर गोत्र का बन्ध हुआ। वहां से समाधि पूर्वक पंडित मरण पा करके आप प्राणत कल्प में महर्धिक देव बने ।
जन्म
देवायु भोगकर आप भरत क्षेत्र के ब्राह्मणकुण्ड ग्राम के प्रमुख ऋषभदत्त ब्राह्मण की पत्नी देवानन्दा की कुक्षि में अव-तरित हुए। माता देवानन्दा ने चौदह महास्वप्न देखे । स्वप्न पाठकों ने एक मत से निर्णय दिया अन्तिम तीर्थंकर आपके घर में अवतरित हुए है। स्वप्न फल सुनकर सभी प्रसन्न हुए। देवानन्दा विशेष जागरूकता के साथ गर्भ का पालन करने लगी।
गर्भ-साहरण
शक्रेन्द्र महाराज ने एक बार अवधि-दर्शन से ऋषभदत के घर देवानन्दा की कुक्षि में प्रभु के अविकसित शरीर को विकसित होते देखा और चिंतन किया तीर्थंकर सदैव प्रभाव-शाली घर में जन्म लेते हैं। वर्तमान में क्षत्रिय वर्ग का प्रभाव अधिक है। सत्ता भी उनके हाथ में है, अतः प्रभु के शरीर का साहरण करके क्षत्रिय कुल में अवस्थित करना चाहिये।
शक्रेन्द्र ने इसी विचार से हरिणगमेशी देव की बुलाकर निर्देश दिया-अन्तिम तीर्थंकर देवानन्दा की कुक्षि में हैं, उन्हें क्षत्रियकुण्ड नगर के राजा सिद्धार्थ की रानी त्रिशला की कुक्षि में स्थापित करो तथा महारानी त्रिशला के जो गर्भ है उसे देवानन्दा की कुक्षि में स्थानान्तरित करके मुझे सूचित करो।
इन्द्र की आज्ञा पाकर हरिणगमेशी देव चला, देवानन्दा गहरी नींद में सो रही थी। गर्भकाल की वह तयासींवी रात्रि थी। देव ने भगवान् को नमस्कार कर गर्म-साहरण की अनुज्ञा मांगी और भगवान् के अर्ध-विकसित डिम्ब का सजगता से साहरण किया तथा महारानी त्रिशला की कुक्षि में स्थापित कर गर्भ की अदला-बदली की प्रक्रिया पूर्ण की। साहरण काल में दोनों माताओं को अवस्वापिनी निद्रा दी हुई थी। उसी रात्रि में देवानन्दा और त्रिशला दोनों ने चोदह महास्वप्न देखें। किन्तु, देवानन्दा को स्वप्न जाते हुए नजर आये और महारानी त्रिशला को स्वप्न आते हुए प्रतीत हुए।
त्रिशला की कुक्षि में भगवान् के अवस्थित होने के बाद सिद्धार्थ राजा के जनपद व भण्डार धन-धान्य से सम्पन्न हो गया। देव-सहयोग से राज-भण्डार में अप्रत्याशित रूप से अर्थ की वृद्धि हुई। राजा सिद्धार्थ का मान-सम्मान आसपास के जनपदों में सहसा बढ़ता चला गया ।
गर्म में प्रतिज्ञा
भगवान् को गर्भ में आये सात महीने पूरे हो गये, तब एक बार वे यह सोचकर निश्चल हो गये कि मेरे हलन-चलन से माताजी को वेदना होती होगी। गर्भ का स्पन्दन बन्द होते ही माता त्रिशला चौंक उठी। गर्भ के अनिष्ट-भय से हतप्रभहो गई। कुछ ही क्षणों में रोने-बिलखने लगी। सभो चिन्तित हो उठे। कुछ समय पश्चात् प्रभु ने अवधि दर्शन से पुनः देखा तो उन्हें सारा ही दृश्य हृदयविदारक नजर आया। तत्काल उन्होंने स्पन्दन प्रारम्भ कर दिया। तब कहीं जाकर सबको शांति मिली। भगवान् ने अपने पर माता-पिता का इतना स्नेह देखकर यह प्रतिज्ञा कर ली कि माता-पिता के स्वर्गवास के बाद ही दीक्षा लूंगा, इससे पूर्व नहीं ।
जन्म
और गर्भकाल पूर्ण होने पर चैत्र शुक्ला त्रयोदशी की मध्यरात्रि में अन्तिम देवाधिदेव का मंगल अवतरण हुआ। प्रभु के जन्म से सारा विश्व पुलकित हो उठा। सभी एक अज्ञात खुशी से हर्ष विभोर थे। राजा सिद्धार्थ ने मुक्त हृदय से जन्मोत्सव मनाया। सारे राज्य में राजकीय उत्सव प्रारम्भ किया। कर (टेक्स) माफ कर दिये गये, जेलें खाली कर दी गई। क्षत्रियकुंड नगर इन्द्रपुरी जैसा दिखाई देने लगा।
नाम के दिन बृहद्-प्रीतिभोज रखा गया। समस्त पारि-बारिक लोगों में नवजात शिशु को देखकर आशीर्वाद दिया । नाम की परिचर्चा में राजा सिद्धार्थ ने कहा-इसके गर्भकाल में धन-धान्य की अप्रत्याशित वृद्धि हुई थी। अतः बालक का नाम वर्धमान रखा जाये। सभी ने बालक को इसी नाम से पुकारा। बाद में प्रभु के अन्य नाम महावीर, श्रमण, ज्ञातपुत्र आदि भी प्रचलित हुए ।
पाठशाला में
बाल-क्रीड़ा के बाद प्रभु जब आठ वर्ष के हुए तो महाराज सिद्धार्थ बालक वर्द्धमान को पाठशाला में ले गये। शक्रेन्द्र को अत्यन्त आश्चर्य हुआ कि राजा जी त्रिज्ञानज्ञ प्रभु को पढ़ाने के लिए पाठशाला ले जा रहे है। कलाचार्य इनको क्या पढ़ायेगा? किन्तु, लोगों को पता नहीं है। शक्रेन्द्र स्वयं आये, पाठशाला के उपाध्याय एक पट्ट पर आसन लगाकर बैठे थे। वर्धमान कुमार को नीचे बिठाया गया था। अध्ययन प्रारम्भ होने हो बाला था कि इन्द्र एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप बनाकर उपाध्याय के पास पहुंचे और व्याकरण सम्बन्धी जिज्ञासाएं प्रस्तुत की। उपाध्यायजी प्रश्न सुनकर चकरा गये। हतप्रभ हो आकाश की ओर देखने लगे। तब वृद्ध-विप्र ने बालक वर्धमान से भी वे ही सवाल पूछे, वर्धमान ने सहज भाव से सारे प्रश्नों के उत्तर दे दिये। उत्तर सुनकर कलाचार्य जी विस्मित हो उठे। सोचने लगे इसे मैं क्या पढ़ाऊंगा ? यह तो स्वयं दक्ष है। उन्होंने तत्काल अपना आसन छोड़ा और नीचे आ बैठे। इन्द्र ने अपना रूप बदलकर वर्धमान का परिचय दिया। सभी प्रसन्न होकर वर्धमान को पुनः राजमहल में ले आए।
विवाह
भगवान् वर्धमान के तारुण्य में प्रवेश करते ही सिद्धार्थ उनके विवाह की तैयारी करने लगे। वर्धमान को विवाह के लिए तैयार करने का काम उनके युवा मित्रों को सौंपा गया । एक दिन उनकी मित्रों से लम्बी बहस चल पड़ी। विवाह के पक्ष और विपक्ष में दलीलें दी जाने लगीं। इसी बीच माता त्रिशला ने वर्धमान से आकर कहा- विवाह करने की तेरी इच्छा नहीं है, किन्तु मेरी है। ऐसा मानकर तुझे विवाह करना ही पड़ेगा। तुमने कभी मेरे मन को नहीं दुखाया, मुझे विश्वास है, अब भी नहीं दुखाएगा।
वर्धमानकुमार अपने भोगावली कर्मों की स्थिति देखकर माताजी की मनुहार पर मौन बने रहे। माताजी ने तुरन्त घोषणा कर दी कि वर्धमान का विवाह होगा।
महाराज सिद्धार्य ने बसन्तपुर नगर के राजा की पुत्री यशोदा के साथ परम हर्षोल्लास के साथ उनका विवाह कर दिया। अनासक्त भाव से भोग भोगते हुए वे समय बिताने लगे। यशोदा के एक पुत्री भो उत्पन्न हुई।
(दिगम्बर परम्परा में वर्धमान के विवाह की बात नहीं है। वे भगवान् को बाल ब्रह्मचारी मानते है।)
दीक्षा
माता-पिता का स्वर्गवास भगवान् के अट्ठाईसवें वर्ष में हुआ। भगवान् के बड़े भाई कुमार नन्दीवर्धन के आग्रह पर वे दो वर्ष गृहस्थ में और रहे, किन्तु बेले-बेले का तप करते रहे, संचित्त के प्रत्याख्यान पूर्वक ब्रह्मचर्य का पालन करते रहे।
लौकान्तिक देवों के निवेदन पर उन्होंने वर्षीदान दिया । सुदूर-प्रदेशों के लोग वर्धमान के हाथ से दान लेने के लिए उमड़ पड़े। वर्धमान कुमार के अद्भुत सौंदर्य व चढ़ते यौवन में उनकी विरक्ति को देखकर सभी स्तंभित थे।
निर्धारित तिथि पर भगवान् को सुसज्जित सुखपालिका में बिठाकर अनगिनत मनुष्य और देवों ने बाहर उद्यान में लाये। वहीं आभूषण आदि उतार कर भगवान् ने पंचमुष्टि लोच किया, और जीवन भर के लिए सर्व सावद्य-योगों का त्याग किया। दीक्षा के दिन प्रभु के बेले का तप था। अगले दिन उन्होंने कोल्लाग सन्निवेश में बहुल ब्राह्मण के यहां परमान्न से पारणा किया। देवों ने पात्र दान का विशेष उत्सव किया।
देहि-व्युत्सर्गं
दीक्षा लेने के बाद भगवान् ने यह अभिग्रह किया कि जब तक केवल-ज्ञान प्राप्त न हो तब तक सर्वथा विदेह रहूँगा-शरीर को सार-सम्भाल नहीं करूंगा। इस अवधि तक देव, मनुष्य तथा पशु-जन्य उपसर्गों को माध्यस्थ भाव से सहन करूंगा। इस प्रकार प्रभु ने देहि-व्युत्सर्ग का संकल्प किया ।
उपसर्ग
भगवान् महावीर की छद्यस्थ काल की साधना विशेष घटनाप्रधान व उपसर्ग-प्रधान रही। वैसे प्राचीन आचार्यों के अभिमत में तेईस तीर्थंकरों के कर्म-दलिक एक तरफ और भगवान् महावीर के कर्म-दलिक एक तरफ दोनों की तुलना में महावीर के कर्म-दलिक अधिक थे। अतः तपस्या भी भगवान् महावीर ने विशेष की, और उपसर्ग भी आपको अधिक हुए।
दीक्षा के प्रथम दिन ही कुर्मारग्राम के बाह्र जंगल में प्रभु अडौल ध्यान-मुद्रा में अवस्थित थे। वहीं कुछ ग्वालों ने उनसे आकर पूछा-बाबा, मेरे बैल यहीं चर रहे थे किधर गये ? प्रभु मौन थे। सारी रात खोजने पर भी ग्वालों को बैल नहीं मिले। संयोगवश वे बैल चरकर रात्रि को प्रभु के पास आकर बैठ गये थे। ग्वाले रातभर भटकते हुए प्रातःकाल पुनः उधर से निकले तो उन्होंने बैलों को वहीं पर बैठे देखा। वे रात भर के झुंझलाये हुए तो थे ही, क्रुद्ध हो उठे। बकने लगे बाबा क्या है, धूर्त है ! बैल यहीं थे इसने बताये नहीं? यों कहकर वे प्रभु पर कोड़े बरसाने लगे। तभी इन्द्र ने अवधि-दर्शन से देखा तथा वहां आकर मूर्ख ग्वालों को समझाया ।
शक्रेन्द्र ने भगवान् से प्रार्थना की- प्रभो! आपके कर्म
बहुत है, अतः उपसर्ग काफी होंगे। मुझे आज्ञा दें, मैं सेवा में रहे। भगवान् ने मुस्कराकर कहा- देवेन्द्र । अरिहन्त कभी दूसरों के बल पर साधना नहीं करते। अपने सामर्थ्य से ही वे कर्मों का क्षय करते हैं, अतः मुझे किसी की सहायता नहीं चाहिये ।
इसके बाद भगवान् ने वहां से विहार किया। स्थान-स्थान पर दुस्सह उपसगों का उन्हें सामना करना पड़ा। प्रभु की स्थितप्रज्ञता भी विचित्र थी। भगवान् को हुए प्रमुख उपसर्गों का वर्णन इस प्रकार है-
१. शूलपाणी यक्ष का तीव्र उपद्रव । स्थान अस्थि ग्राम । २. चंडकौशिक सर्प का तीव्र डंक प्रहार। स्थान- कनखल आश्रम के पास ।
३. अनार्य लोगों द्वारा जघन्यतम उपद्रव । स्थान -लाट देश।
४. कटपूतना व्यंतरी का भयंकर शीत उपद्रव । स्थान -शालीशीर्ष ।
५. शालार्ये व्यंतरी द्वारा उपसर्ग। स्थान -बहुशाल वन । ६.राजकीय लोगों द्वारा गुप्तचर समझकर पकड़ना फिर उत्पल देवज्ञ द्वारा पहिचान कर लोगों को भगवान् का परिचय देना। स्थान-लोहार्गला नगरी ।
७. उपद्रवी बालकों का उपसर्ग। स्थान- विशाला नगरी। ८. संगम देव द्वारा अनेक उपसर्ग। स्थान- दृढ भूमि के आसपास ।
६. ग्वालों द्वारा कानों में कील ठोंकना। स्थान-छमाणि
ग्राम।
१०. ग्वालों द्वारा पैरों पर खीर पकाना। स्थान-नन्दीग्राम, मेड़ीग्राम ।
११. नौका चढ़ने के बाद उत्तरने पर नाविक द्वारा धूप में कष्ट देना ।
वे सभी उपसर्ग प्राणघातक थे। इनके अतिरिक्त छोटे-मोटे अनेक उपसर्ग भगवान् को होते ही रहते थे। भगवान् इन उपसगों में पूर्णतः समाधिस्थ रहे। कहीं पर भी विचलित नहीं हुए।
तेरह बोलों का अभिग्रह
भगवान् की छद्मस्थ कालीन तपस्या में तेरह बोलों के अभिग्रह का तप महत्वपूर्ण माना जाता है। वे अभिग्रह इस प्रकार थे-
१. एक राजकन्या, २. बाजार में बेची हुई ३.शिर मुण्डित ४.शिर में गद के घाव ५.हाथों में हथकड़ी ६. पैरों में बेड़ी ७. तीन दिन की भूखी ८. भोंहरे में हो १. आधा दिन बीतने के बाद १०.एक पैर देहली में और एक उसके बाहर ११.सूप के कोने में १२. उड़द के बाकले १३. आंखों में आंसू हो ।
इन अभिग्रहों के धारण किये भगवान् को पांच महीने और पच्चीस दिन बीत जाने पर भी योग नहीं मिला। मिले भी कैसे, अभिग्रह ही ऐसा था। घूमते हुए भगवान् कौशांबी पधारे। वहां भगवान् को काफी दिन हो गये थे। लोगों में चर्चा होने लगी थी वर्धमान मुनि क्या हमारे यहां से भिक्षा लेना नहीं, चाहते ? हमारी नगरी में क्या कमी है? वे आते हैं, किन्तु बिना कुछ लिये चले जाते हैं। हमें इसका कारण खोजना चाहिए।
इसी बीच भगवान् महावीर धन्ना सेठ’ के यहां भिक्षा के लिए पधारे। सेठ बाजार में किसी स्वर्णकार को बुलाने के
लिए गया हुआ था। पीछे घर में चन्दनबाला अकेली दहलीज के बीच खड़ी थी। हाथ में छाज लिये हुए थी, छाज में उड़द के बाकुले थे। खाने की तैयारी कर रही थी इतने में भगवान् पधार गये। चन्दनवाला ने विशेष प्रमुदित होकर दान के लिए प्रार्थना की। भगवान् ने अवधि ज्ञान से देखा अभिग्रह के बारह बोल मिल गये थे, चन्दनबाला राजा की कन्या थी, युद्ध में पिता के हार जाने पर रथिक के हाथ लगी थी, जिसने उसे बाजार में बेच दिया था। सेठ की पत्नी मूला द्वारा ईष्र्यावश उसका सिर मुंडकर हथकड़ियां तथा बेड़ियों डालने का कार्य किया गया था। तेरहवां बोल नहीं मिला, आंखों में आंसू नहीं थे। भगवान् महावीर वापिस मुड़ गये। जब चन्दनबाला ने भगवान् को मुड़ते हुये देखा तो मारे दुःख के आंखों से अश्रु धार वह चली। विलखती हुई बोली-प्रभु मैं भी कैसी अभागिन हूं सभी ने किनारा किया जहां गई वहां से निकाली गई, और इस विपन्नावस्था में आप भी छोड़कर जा रहे हैं? फिर मेरा कौन सहारा है ?
भगवान् ने मुड़कर देखा चन्दनबाला की आंखों से टपक-टपक पानी गिर रहा था। प्रभु वापिस पधारे और चंदनबाला के हाथ से उड़द के बाकुले ग्रहण किये। भगवान् की तपस्या का पारणा हुआ। पारणा होते ही देवों ने पंच-द्रव्य प्रगट किये। हाथों की हथकड़ियां व पैरों की बेड़ियां आभूषण बन गई। चारों ओर दान की महिमा होने लगी। चन्दबाला का संकट समाप्त हो गया। भगवान् के सर्वज्ञ बनने के बाद चन्दनवाला ने ही भगवान् के पास दीक्षित होकर प्रवर्तनी का पद प्राप्त किया था ।
तपस्या
भगवान महावीर द्वारा साढ़े बारह वर्ष के छद्मस्थ काल में की गई तपस्या का विवरण इस प्रकार है-
छः मासी तप १
पांच दिन कम छः मासी तप १
्चातुर्मासिक तप २
त्रैमासिक तप २
अढाईमासी तप २१
द्वी-मासी तपः ६
डेढ मासी तप २
मास खमण तप १२
पाक्षिक तप ७२
भद्रप्रतिमा १
महा-भद्र प्रतिमा १
सर्वतो भद्र प्रतिमा १
छट्ठ-भक्त तप २२२
अष्टम भक्त (तेला) १२
पारणे के दिन-तीन सौ उनपचास ।
आचारांग सूत्र के अनुसार दसम भक्त (चोला) आदि की तपस्याएं भी प्रभु ने की थीं, किन्तु उनका ब्यौरा नहीं मिल
रहा है। वैसे, बारह वर्ष और तेरह पक्ष की अवधि उपरोक्त तपस्या से पूर्ण हो जाती है। महावीर सचमुब ही उम्र तपस्वी थे। विकट तपस्या एवं ध्यान के द्वारा ही उन्होंने संचित कर्मों का क्षय किया था।
केवल ज्ञान
साढ़े बारह वर्ष तक विभिन्न प्रदेशों में अनेक भीषण कष्टों को सहते हुए वैशाली गणराज्य की ऋजुबालुका नदी के तट-वर्ती प्रदेश में पधारे। वहीं जंभिय ग्राम के बाहर शामाक कृषिकार के खेत में शाल वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए आपने क्षपकश्रेणी ली तथा घातिक कर्म-प्रकृतियों का क्षय करके सर्वज्ञता प्राप्त की। चौसठ इन्द्रों ने मिलकर आपका केवल महोत्सव किया । भगवान् ने प्रथम देशना दी। किन्तु, देशना सुनने वाले सब देव ही थे। जंगल होने के कारण उस समय वहां कोई मनुष्य नहीं था। अतः भगवान् की प्रथम देशना खाली (निष्फल) गई। दिगम्बर परम्परा के अनुसार सर्वज्ञता के बाद बासठवें दिन भगवान् के मुखारविन्द से ध्वनि प्रस्फुटित हुई।
भगवान् वहां से विहार करके मध्यम पावा पधारे। देवों ने वहां समवशरण की रचना की।
गणधरों को दीक्षा
मध्य-पावा में सोमिल धनाड्य द्वारा बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया गया था। उसमें मूल प्रतिष्ठा के रूप में ग्यारह महा-पण्डितों को शिष्यों सहित निमन्त्रित किया गया था। गगन मार्ग से देवों को अवतरित होते देखकर वे पंडित खुश हुए। उन्होंने घोषणा की-देवगण हमारे यज्ञ में आहुति लेने आरहे हैं। किन्तु, देवगण जब ऊपर से ही निकल गये, तब
सभी आचार्य शंकित हो गये। उन्होंने तत्काल पता लगाया, ये देव कहां जा रहे हैं? जानकारी प्राप्त होने पर प्रथम आचार्य इन्द्रभूति जी, अपने शिष्य समुदाय सहित यह कहते हुए चले कि महावीर इन्द्रजालिक पाखण्डी हैं, चर्चा में मेरे सामने नहीं टिक पायेगा। इस प्रकार कहते हुए वे समवशरण में पहुंचे। समवशरण में भगवान् को देखते ही सहसा विस्मित हो गये। निकट आते ही भगवान् ने ‘गौतम’ कहकर उन्हें सम्बोधित किया, और उनके मन का सन्देह (जिसे आज तक उन्होंने किसी के सामने नहीं कहा था) को प्रकट करते हुए फरमाया-
गौतम ! तुम्हारे मन में आत्मा के अस्तित्व के बारे में शंका है। इन्द्रभूति जी चौंके। आज तक मेरे मन की अप्रकाशित बात को ये कैसे जान गये? सचमुच ही ये सर्वज्ञ है। प्रभु ने विस्तार से आत्मा के अस्तित्व को सिद्ध किया। इन्द्रभूति निशंक बने तथा अपने पांच सौ शिष्यों सहित प्रभु के चरणों में समर्पित हो गये। उन्होंने महावीर का शिष्यत्व ग्रहण कर किया।
(दिगम्बर परम्परा में इन्द्रभूति के भगवान् के पास आने का क्रम भिन्न है। )उसके अनुसार सर्वज्ञ बनने के बाद प्रभु देव निर्मित समवशरण में बिजन में, सम्मुख देवगण बद्धांजली होकर बैठ गये; किन्तु प्रभु से दिव्य-ध्वनि प्रस्फुटित नहीं हुई। लम्बी प्रतीक्षा के बाद भी जब ध्वनि प्रसारित नहीं हुई तो देवेन्द्र ने अवधि-ज्ञान से कारण जानना चाहा। ज्ञान से पता लगा गणधर के अभाव में ध्वनि नहीं निकल रही है। इन्द्र ने अपने दिव्य-ज्ञान से योग्य भव्यात्मा की खोज की और विद्यार्थी का रूप बनाकर उसने इन्द्रभूति के पास जाकर कहा-मेरे गुरू ने मुझे गाथा सिखलाई थी, अब वे मौन है, अतः आप
उसका अर्थ बताइये। इन्द्रभूति जी एक शर्त के साथ अर्थ बताने को तैयार हुए-अगर मैं बता देता हूं तो मेरा शिष्यत्व स्वीकार करना पड़ेगा। इन्द्र ने हां भरली ओर गाथा प्रस्तुत की। वह गाथा थी।
पंचेव अत्थिकाया छज्जिवणी काया महव्वया पंचं ।
अट्ठयपवयण माया सहेउवो बंधमोखो यः ॥
(षटखण्डागम)
यह सुनते ही इन्द्रभूति जी चकित हो गये। उनकी अंतरंग शंका तीव्रता से उभर गई। उन्होंने कहा-चल, तेरे गुरू के पास ही गाथा का अर्थ बताऊंगा। दोनों भगवान् के पास आये। आते ही दिव्य-ध्वनि हो गई। गौतम स्वामी भगवान् के पास बासठवें दिन आये थे। इतने दिन भगवान् का प्रवचन नहीं हो सका था।
इन्द्रभूति की दीक्षा के साथ ही तीर्थ स्थापित हो गया था। क्रमशः, दशों अवशिष्ट पण्डित भी आगये, और अपनी शंकाओं का समाधान पाकर उन्होंने प्रभु के पास शिष्यत्व स्वीकार किया। ग्यारह गणधर तथा चार हजार चार सौ शिष्य एक ही दिन में भगवान् के पास दीक्षित हुए।
ऋषभदत्त तथा देवानन्दा को प्रतिबोध
सर्वज्ञता के दूसरे वर्ष में विचरते-विचरते भगवान् महावोर ब्राह्मणकुण्ड नगर में पधारे। कुसाल उद्यान में विराजमान हुए। वहां ऋषभदल देवानन्दा को साथ लेकर भगवान् के दर्शनार्थ आये। भगवान् को देखते ही देवानन्दा हर्ष-विभोर हो उठी। उनका पुत्र-स्नेह उमड़ पड़ा, और दोनों स्तनों से दूध की द्वारा बह चली। गौतम स्वामी ने इस अद्भुत दृश्य को देखकर
भगवान् से पूछा-प्रभो। इसका क्या कारण है? भगवान् ने कहा-गौतम । यह मेरी मां हैं। मैं इनका अंगजात है। पुत्र-स्नेह के कारण दूध की धारा फूट पड़ी है। साहरण आदि का सारा वृत्तान्त सुनकर भगवान् ने सबकी जिज्ञासायें शांत कीं।
बाद में भगवान् का प्रवचन हुआ। प्रवचन से प्रतिबोधित होकर दोनों ने साधुत्व स्वीकार किया। अध्यात्म पथ के पथिक बने ।
महावीर का विहार क्षेत्र
भगवान् महावीर का विहार क्षेत्र वैसे तो सीमित रहा। ज्यादातर वे अंग, मगध, काशी, कौशल, सावत्थी, कौशाम्बी और कयंगला आदि जनपदों के आसपास ही विचरते रहे थे। भगवान् का सबसे लंबा बिहार सिंधु प्रदेश का हुआ था। इस बिहार में अनेक साधु शुद्ध आहार के अभाव में स्वर्गवासी हो गये। वैसे भगवान् के शिष्य दूर-दूर तक विचरते रहे थे। केवल पर्याय के तीस वर्षों में चौदह चातुर्मास तो भगवान् ने राजगृह में ही किये थे। शेष चातुर्मास चम्पा, सावत्थी, पावा, नालन्दा नादि क्षेत्रों में किये थे।
अप्रतिहत प्रभाव
भगवान् महावीर के समय अनेक धर्म-प्रवर्तक विद्यमान थे। साधना, ज्ञान तथा लब्धियों के माध्यम से वे अपना-अपना प्रभाव जमाये हुए थे। भगवान् महावीर के अतिरिक्त छः आचार्य और भी तीर्थंकर कहलाते थे। वे स्वयं को सर्वज्ञ बतलाते थे। फिर भी भगवान् महावीर का अप्रतिहत प्रभाव था। वैशाली राज्य के गणपति चेटक, मगध सम्राट् श्रेणिक, बंग सम्राट् कोणिक, सिंधु नरेश उदाई, उज्जयनी नरेश चन्द्रप्रद्मोतन, आदि अनेक गणनायक लिच्छवी व वज्जि गणराज्यों के प्रमुख भगवान् के चरणसेवी उपासक थे। आनंद, कामदेव, शकडाल और महाशतक जैसे प्रमल धनाड्य, समाज-सेवी, धनजी जैसे चतुर व्यापारी तथा शालिभद्र जैसे महान् धनाड्य व विलासी व्यक्ति भी आगार अणगार धर्मो के अभ्यासी बने थे। आर्य जनपद में भगवान् का सर्वांगींण प्रभाव वा।
प्रभु का परिवार
गणधर- ग्यारह (इन्द्रभूति जादि)
केवल ज्ञानी -सात सौ
मनः पर्यव ज्ञानी- पांच सो
तेरह सौ -अवधि ज्ञानी
चतुर्दश पूर्वी -तीन सौ
वैक्रिय लब्धिधारी -सात सौ
चर्चावादी- चार सौ
साधु – चौदह हजार
साध्वियां -छत्तीस हजार (प्रवर्तिनी चन्दनबाला )
श्रावक -एक लाख उनसठ हजार
श्राविकाएं – तीन लाख अठारह हजार
महावीर के प्रमुख सिद्धांत
भगवान् महावीर ने सर्वज्ञ होते ही तत्कालीन रूढ धार-णाओं पर प्रबल प्रहार किया। उन्होंने प्रचलित मिथ्या मान्यताओं का आमूलचूल निरसन किया। उनके प्रमुख सिद्धांत निम्नांकित हैं-
जातिवाद का विरोध स्वयं अभिजात कुल के होते हुए
भी उन्होंने जातिवाद को अतात्विक पोषित किया। उनका स्पष्ट उद्घोष था मनुष्य जन्म से ऊंचा-नीचा नहीं होता। केवल कर्म ही व्यक्ति के ऊंच या नीच के मापदण्ड है। उन्होंने अपने तीर्थ में शूद्रों को भी सम्मिलित किया। लोगों को यह अटपटा जरूर लगा, किन्तु भगवान् ने स्पष्ट कहा- किसी को जन्मना नीच मानना हिंसा है। भगवान् की इस क्रांतिकारी घोषणा से लाखों-लाखों पीड़ित, दलित शूद्र लोगों में आशा का संचार हुआ। भगवान् के समवशरण में सभी लोग बिना किसी भेद-भाव के सम्मिलित होकर प्रवचन सुनते थे ।.
धम्मो सुद्धस्स चिट्टई – भगवान् से पूछा गया आप द्वारा
प्रतिपादित धर्म को कौन ग्रहण कर सकता है? उत्तर में प्रभु ने कहा- मेरे द्वारा निरूपित शाश्वत धर्म को हर व्यक्ति स्वीकार कर सकता है। कोई बन्धन नहीं है। जाति वर्ग या चिह्न धर्म को अमान्य हैं। शाश्वत धर्म को स्वयं में टिकाने के लिए हृदय की शुद्धता जरूरी है। अशुद्ध हृदय में धर्म नहीं टिकता । धर्म के स्थायित्व के लिए पवित्रता अनिवार्य है।
पशु-बलि का विरोध-यज्ञ के नाम पर होने वाले बड़े-बड़े हिंसा कांडों के विरुद्ध भी महावीर ने आवाज उठाई। निरीह मूक पशुओं को बलि देकर धर्म कमाने की प्रचलित मान्यता को मिथ्यात्व कहा। उन्होंने स्पष्ट कहा- हिंसा पाप है। उससे धर्म करने की बात खून से सने वस्त्र को खून से ही साफ करने का उपक्रम है। हिंसा से बचकर हो धर्म कमाया जा सकता है।
स्त्री का समान अधिकार– भगवान् महावीर ने मातृ-जातिको आत्म-विकास के सारे सूत्र प्रदान किये। उनकी दृष्टि में स्त्री पुरुष केवल शरीर के चिन्हों से है, आत्मा केवल आत्मा है।
स्त्री या पुरुष के मात्र लिंग से कोई फर्क नहीं पड़ता। आत्म-विकास का जहां तक सवाल है, स्त्री पुरुषों के समकक्ष है। मातु-शक्ति को धर्म से वंचित करना बहुत बड़ा अपराध है। धार्मिक अंतराय है।
जन-भाषा में प्रतिबोध भगवान् महावीर ने अपना प्रवचन सदैव जन-भाषा में दिया। मगध और उसके आस-पास के लोग अर्थ मागधी भाषा का प्रयोग करते थे। भगवान् ने भी अपना प्रवचन अर्थ-मागधी में ही दिया। जन साधारण की भाषा बोलकर वे जनता के बन गये। जैनों के मूल आगम आज भी अर्ध-मागधी भाषा में उपलब्ध हैं।
दास प्रथा का विरोध भगवान् महावीर ने व्यक्ति को
स्वतंत्रता पर विशेष बल दिया था। उन्होंने दास-प्रथा को धर्म-विरुद्ध घोषित किया। किसी व्यक्ति को दास के रूप में खरीदना, अपना गुलाम बनाकर रखना हिंसा है। हर व्यक्ति की स्वतंत्रता स्वस्थ समाज का लक्षण है। किसी को दबाकर रखना उसके साथ अन्याय है। उन्होंने स्पष्ट कहा- मेरे संघ में सब समान होंगे। कोई किसी का दास नहीं है, एक दूसरे का कार्य, एक दूसरे की परिचर्या, निर्जरा भाव से की जायेगी, दबाव से नहीं। दास-प्रथा सामूहिक जीवन का कलंक है।
अपरिग्रह-अपरिग्रह का उपदेश महावीर की महान् देन है। उन्होंने अर्थ के संग्रह को अनर्थ का मूल घोषित किया। धार्मिक प्रगति में अर्थ को बाधक बताते हुए मुनिचर्या में उसका सर्वथा त्याग अनिवार्य बतलाया। श्रावक धर्म में उस पर नियंत्रण करना आवश्यक बतलाया ।
भगवान् महावीर के जितने श्रावक हुए उनके पास उस
समय में जितना परिग्रह था उससे अधिक परिग्रह का उन्होंने त्याग कर दिया था। वर्तमान परिग्रह से अधिक परिग्रह का संग्रह किसी श्रावक ने नहीं रखा। प्रतिवर्ष उतना ही कमाते थे जितना खर्च होता था। शेष का विसर्जन कर वर्ष के अन्त में परिग्रह का परिमाण बराबर कर लेते थे। उनका उपदेश था कि संग्रह समस्याओं को पैदा करता है, धार्मिक व्यक्ति जितना परिग्रह से हल्का रहता है, उत्तना ही अधिक अध्यात्म में प्रगति कर सकता है।
अनेकान्त-अहिंसा के विषय में भगवान् महावीर के सूक्ष्म-तम दृष्टिकोण का लोहा सारा विश्व मानता है। उनकी दृष्टि से शारीरिक हिंसा के अतिरिक्त वाचिक तथा मानसिक कटुता भी हिंसा थी। सूक्ष्मतम अहिंसा के दृष्टिकोण को साधना का विषय बनाना अन्य दार्शनिकों के लिए आश्चर्य का विषय था ।
वैचारिक अहिंसा को विकसित करने के लिए उन्होंने स्याद्वाद (अनेकान्त) का प्रतिपादन किया। उनका मानना था कि हर वस्तु को एकांगी पकड़ना ही आग्रह है, सत्य का विपर्यास है, अनन्त धर्मा वस्तु के एक धर्म को मान्यता देकर शेष धर्मों को नकारना स्वयं में अपूर्णता है। हर वस्तु का अपेक्षा से विवेचन करना ही यथार्थ को पाना है। जैसे घड़े को घड़े के रूप में कहना उसके अस्तित्व का बोध है। घड़े को पट के रूप में नकारना नास्तित्व का बोध है। एक ही घड़े के अस्तित्व और नास्तित्त्व, दो विरोधी धर्मों का समावेश करने का नाम ही स्याद्वाद है। इस प्रकार हर वस्तु अपनी-अपनी स्थिति में अस्तित्व-नास्तित्व आदि अनेक धर्मों वाली होती है। स्याद्वाद को मान लेने के बाद एकान्तिक आग्रह स्वतः
समाप्त हो जाता है। वैचारिक विग्रह का फिर कहीं अवकाश नहीं रहता ।
निर्वाण
तीस वर्षों की केवली पर्याय में गंधहस्ति की भांति आर्य जनपद में भगवान् विचरते रहे थे। लाखों-लाखों लोगों को अध्यात्म का मार्ग-दर्शन प्रभु से मिला था। महावीर का जीवन घटना प्रधान था। उन्होंने समस्त आये जनपद में एक हलचल पैदा कर दी थी। अन्य दर्शनों पर भी आप द्वारा निरूपित तत्त्व की छाप पड़ी। पशुबलि तथा दासप्रथा क्रमशः कम होती गई। किसी ने प्रेम के नाम से, किसी ने करुणा के नाम से, किसी ने रहम के नाम से धर्म में अहिंसा को स्थान देना शुरू कर दिया। सचमुच महावीर का जीवन आलोकपुञ्ज याः उसके आलोक में अनेक प्राणियों ने तत्त्व ज्ञान प्राप्त किया था।
आपने अपना अन्तिम वर्षावास लिच्छवी तथा मल्लि गण-राज्यों के प्रमुखों की विशेष प्रार्थना पर पावा में बिताया। श्रद्धालुओ को पता था कि यह भगवान् का अंतिम वर्षावास है, अतः दर्शन, सेवा तथा प्रवचन का लाभ दूर-दूर के लोगों ने भी उठाया।
वंशकार्तिक कृष्णा त्रयोदशी की रात्रि में भगवान् ने अन्तिम अनशन कर लिया था। सेवा में समागत अनेक श्रद्धाल तथा चतुर्विध संघ को अनेक शिक्षाएं फरमाई । अन्तिम दिन-कार्तिक कृष्णा अमावस्या की संध्या में प्रभु ने अपने प्रधान शिष्य इन्द्रभूति गौतम को वेद-विद्वान् देवशर्मा को समझाने के लिए उनके यहां भेजा। गौतम स्वामी भगवान् की आज्ञा से वहां चले गये तथा उनसे तात्त्विक चर्चा की।
अर्ध रात्रि के समय शिक्षा फरमाते-फरमाते भगवान् ने योग निरोध किया तथा चौदहवें गुणस्थान में पहुंच कर शेष चार-अघाती कर्मों का क्षय कर सिद्धत्व को प्राप्त किया।
पीछे से प्रभु का वह शरीर निस्पंद होकर चेतनाहीन बन गया। उपस्थित शिष्य समुदाय ने भगवान् के विरह को गम्भीर बातावरण में कायोत्सर्ग करके माध्यस्थ भाव से सहन करने का प्रयत्न किया ।
कुछ समय में देववृन्द आकाश से उतरने लगे। चारों तरफ भगवान् के निर्वाण की चर्चा होने लगी। लोग घरों से निकल-निकल कर आने लगे, किन्तु अमावस्या की रात्रि में लोगों को अंधेरी गलियां पार करने में कठिनाई हो रही थी। कहते ॥ हैं-देवों ने मोड़-मोड़ पर रत्नों से प्रकाश किया। प्रभु के
निर्वाण स्थल पर रत्नों की जगमगाहट लग गई। चारो तरफ प्रकाश ही प्रकाश फैल गया। वहां उपस्थित लिच्छवी तथा मल्ली गणराज्य के प्रमुखों ने निर्वाण दिवस प्रति वर्ष मनाने की घोषणा की। रत्नों की जगमगाहट के स्थान पर दीप जला कर प्रकाश करने की व्यवस्था की गई। भगवान ने आज के दिन परम समृद्धि को प्राप्त किया था. अतः कार्तिक अमावस्या को प्रकाश का पर्व समृद्धि का पर्व माना जाने लगा ।
गौतम स्वामी को केवलज्ञान
चर्चा करते हुए गौतम स्वामी को जब प्रभु के निर्वाण का पता लगा तो तत्काल वापिस आ गये। भगवान् के निस्पंद शरीर को देखकर वे मोहाकुल बनकर मुर्च्छित हो गये। सचेत होने पर पहले तो उन्होंने विलापात किया, किन्तु तत्काल भगवान् की वीतरागता पर विचार करने लगे। चिन्तन को गहराई में पहुंच कर स्वयं राग-मुक्त बन गये। क्षपक-श्रेणी लेकर उन्होंने केवलत्व प्राप्त किया। भगवान् का निर्वाण और गौतम स्वामी की सर्वज्ञता, दोनों अमावस्या के दिन ही हुए थे। अतः कार्तिक की अमावस्या का दिन जनों के लिए ऐतिहासिक पर्व बन गया ।
शरोर का संस्कार
देवों, इन्द्रों तथा हजारों-हजारों लोगों ने मिलकर भगवान् के शरीर का अग्नि-संस्कार किया। सुसज्जित सुखपालिका में प्रभु के शरीर को अवस्थित किया। निर्धारित राज-मार्ग से प्रभु के शरीर को ले जाया गया। पावा नरेश हस्तिपाल विशेष व्यवस्था में लगा हुआ था। अपने प्रांगण में भगवान् के निर्माण
से अत्यधिक प्रसन्न भी था तो विरह की व्यथा से गंभीर भी बना हुआ था। बाहर से आये हुए अतिथियों की समुचित व्यवस्था तथा भगवान् के अग्नि-संस्कार की सारी व्यवस्थाओं का केन्द्र राजा हस्तिपाल ही था। देवगण अपनी-अपनी व्यवस्था में लगे हुए थे। अग्नि-संस्कार के बाद लोग भगवान् के उपदेशों को स्मरण करते हुए अपने-अपने घरों को गये ।
भगवान् का निर्वाण हुआ तब चौथे आरे के अन्तिम तीन वर्ष साढ़े आठ महीने वाकी थे ।
तीर्थ के बारे में प्रश्न
गौतम स्वामी ने एक बार भगवान् से पूछा था – भगवन् ! आपका यह तीर्थ कब तक रहेगा ? भगवान् ने उत्तर दिया था – मेरा यह तीर्थ इक्कीस हजार वर्ष तक चलेगा। अनेक-अनेक साधु-साध्वियां तथा श्रावक-श्राविकाएं इसमें विशेष साधना करके आत्म-कल्याण करेंगे। एकाभवतारी बनेंगे ।
ग्रन्थों में आता है, पांचवें आरे के अन्त में दुप्रसह नामक साधु, फल्गुश्री नाम की साध्वी, नागिल नाम का श्रावक तथा सत्यश्री नाम की श्राविका रहेंगे। अन्तिम दिन अनशन कर ये चारों स्वर्गस्थ बनेंगे। वे ही इस अवसर्पिणी के अंतिम एकाभवतारी होंगे ।
पांच कल्यानक तिथियां –
१. च्यवन-आषाढ़ शुक्ला ६
२. जन्म – चैत्र शुक्ला १३
३. दीक्षा-मृगसर कृष्णा १०
४. कैवल्य प्राप्ति – वैशाख शुक्ला १०
५. निर्वाण-कार्तिक कृष्णा १५
६. कैवल्य वृक्ष -शाल
७ प्रतीक- सिंह
(तीर्थंकर चरित्र से साभार)
