भगवान् श्री सुमतिनाथ
तीर्थंकर गोत्र का बंध
तीर्थकर सुमतिनाथ का जीव पूर्व-जन्म में पूर्वमहाविदेह श्री पुष्कलावती विजय में सम्राट् विजयसेन के महल में चिर अभिलाषित पुत्र के रूप में पैदा हुआ था। इनसे पहले सम्राट् के घर कोई संतान नहीं होने में महारानी सुदर्शना अत्यधिक चिंतित रहती थी। एक बार वह उपवन में घूमने गई। वहां उसने एक श्रेष्ठि-पत्नी के साथ आठ पुत्रवधुओं को देखा। उसे अपनी रिक्तता खलने लगी, दिल विषाद में डूब गया। वह महल में आकर सिसकियां भरने लगी। राजा के पूछने पर उसने सारा प्रकरण कह सुनाया। राजा ने कहा- तुम रोओ मत, मैं तेले की तपस्या करके कुलदेवी से पूछलेता हूं, ताकि तुम्हारी जिज्ञासा शांत हो जाए। राजा ने पौषधशाला में अष्टम(तेला) तप सम्पन्न किया।
कुलदेवी उपस्थित हुई। राजा ने संतान प्राप्तिके विषय में जिज्ञासा की। देवी ने कहा तुम्हारे एक पुत्र स्वर्ग से च्य वन कर उत्पन्न होगा। राजा ने यह सुसंवाद रानी को सुनाया कि हमारे पुत्रहोगा, चिंता मत करो। अब रानी पुत्र-प्राप्तिकी प्रतीक्षा में दिन बिताने लगी ।
क्रमशः रानी के गर्भ रहा रहा का राजा ने बालक का तथा गर्भकाल पूरा होने परएक तेजस्वी एवं अत्यधिक रूपवान बालक को उसने जन्म दिया राजा ने नाम पुरुषसिंह रखा। । बड़े लाड-प्यार से लालन-पालन हुआ
एक दिन कुंवर पुरुष सिंह उद्यान में भ्रमण हेतु गया। वहां उसे विनय-नंदन आचार्य के दर्शन हुए। आचार्य देव से तात्त्विक विवेचन सुना, कुछ क्षणों के सानिध्य ने कुंवर के अन्तर-नेत्र खोल दिये। अपने हिताहित का भान उसे हो गया। भौतिक उपलब्धियां से कुंवर को विरक्ति आ
गई।
उभरती युवावस्था में तीव्र विरक्ति से गुरु-चरणों में कुंवर दीक्षित हो गया। पुरुष सिंह मुनि अणगार बनने के बाद उत्कृष्ट तप और ध्यान में लगे। कर्म-निर्जरा के बीस स्थानकों की उन्होंने विशेष साधना की, उत्कृष्ट कर्म-निर्जरा की तथा तीर्थंकर पद की कर्म-प्रकृति का बंध किया। आराधनापूर्वक आयुष्य पूर्ण कर वे अनुत्तर स्वर्ग में विजयंत नामक विमान में देव रूप में पैदा हुए।
जन्म
वैजयंत विमानकी भव-स्थिति पूर्ण कर भगवान् सुमति-नाथकी आत्मा ने अयोध्या सम्राट् मेषकी महारानी मंगलावती की कुक्षि में अवतरण किया। मंगलावती ने चौदह महास्वप्न देखे । स्वप्न पाठकों ने स्वप्नों के अनुसार घोषित किया कि महारानी की कुक्षि से तीर्थकर देव जन्म लेंगे। महारानी मंगलावती स्वप्नफल सुनकर धन्य हो गई। राजा मेष भी महारानी को अधिक सम्मान देने लगे ।
गर्भकाल पूरा होने पर वैशाल शुक्ला अष्टमी की मध्य-
रात्रि में प्रभु का जन्म हुआ। चौसठ इंद्रों ने मिलकर आपका पवित्र जन्मोत्सव किया। महाराज मेघ नै जन्मोत्सव में याचकों को जी-भर दान दिया। सारे राज्य में पुत्र-जन्म पर राजकीय उत्सव मनाया गया। भगवान् के शरीर की अवगाहता तीन सौ धनुष्य की थी।
नामकरण
नामकरण के अवसर पर भी राजा ने विशाल आयोजन किया। शहर के हर वर्ग के लोग आयोजन में उपस्थित थे। नाम के बारे में चर्चा चलने पर अनेक सुझाव आये।
राजा मेघ ने कहा यह बालक जब गर्भ में था तब महा-रानी को बौद्धिक क्षमता असाधारण रूप से बढ़ गई थी। महारानी समस्याओं का सुलझाव तत्काल एवं अप्रतिहत रूप में किया करती थी। राजकीय मामलों को हल करने में उसमें विशेष दक्षता आ गई थी। इसी क्रम में महाराज मेघ ने एक घटना का उल्लेख करते हुए कहा कुछ महीनों पहले मेरे सामने एक ऐसा विवाद उपस्थित हुआ, जिसका निर्णय करना मेरे लिये कठिन हो गया था। एक साहूकार के दो पत्नियां थीं। एक के एक पुत्र था, दूसरी के कोई संतान नहीं थी। दोनों के परस्पर प्रेम होने के कारण पुत्रका लालन-पालन दोनों समान रूप से किया करती थी। अकस्मात् पति के गुजर जाने से संपत्ति के अधिकार के लिये दोनों झगड़ने लगी। पुत्र पर भी दोनों अपना-अपना अधिकार जताने लगीं। नादान बच्चा दोनों को मां कहकर पुकारता था। उसके लिये यह निर्णय करना कठिन था कि असली मां कौन-सी है? नगर-पंचों के माध्यम से यह विवाद मेरे समक्ष लाया गया। कहीं दूर अंचल में वह बालक उत्पन्न हुआ था, अतः नगर में इस विषय में
किसी को भी प्रामाणिक जानकारी नहीं थी। मैंने बहुत प्रयत्न किया कि असली माता का पता लग जाए, किन्तु में असफल रहा। इसी उलझन से ग्रसित होने से एक दिन मुझे भोजन में देरी हो गई। तत्काल महारानी ने कहलवाया कि महिलाओं का विवाद तो हम निपटायेंगे, आप तो भोजन कीजिये। मैं उलझा हुआ था ही, सुनकर रानी को अधिकार देकर तुरन्त ऊपर चला गया।
रानी ने विवाद की सामान्य पूछताछ करने के बाद उन माताओं से कहा- मेरे मस्तिष्क में एक हल सूझा है। पुत्र की तुम दोनों दावेदार हो। पुत्र एक है, तुम दो हो, इसलिए क्यों नहीं इस बालक के दो टुकड़े करवा दिए जाए, ताकि बाधा-आधा हिस्सा दोनों को मिल जाएगा, तुम्हें यह स्वीकार है ?
रानी की कठोर मुद्रा को देखकर प्रपंच रचने वाली महिला ने सोचा- मेरा क्या जाएगा, बालक मेरा तो है नहीं, मर जाएगा तो जैसी मै हूं वैसी यह भी हो जाएगी। ऐसा विचार कर उसने तुरन्त ‘हां’ कह दी।
किन्तु यह बात सुनते हो पुत्र की असली माता का हृदय फटने लगा। उसने सोचा पुत्र मर जाएगा तो बहुत बुरा होगा। इससे तो अच्छा है कि वह विमाता के पास ही रह जाए, मैं दूर से उसे देखकर ही संतोष कर लूंगी। यह सोचकर उसने कांपते हुए स्वरों में कहा- नहीं, नहीं, महारानीजी ! मैं ही झूठी हूं, पुत्र इसका ही है। अतः मरवाइये मत, इसे दे दीजिये । मुझे कोई आपत्ति नहीं है।
सुनने वाले दंग रह गए, सोचने लगे, यही झूठी थी फिर भी व्यर्थ ही विवाद बढ़ा रही थी। सुनते ही रानी ने निर्णय सुनाया
पुत्र उसका नहीं, इसका ही है जो यह कह रही हैकि मैं झूठी है। यही असली माता है। मातृ-हृदय को मैं जानती है। माता अपने अंगजात को कभी मृत देखना नहीं चाहती। वह महिला झूठी है जिसमें बच्चे की मौत की बात सुनकर भी सीहरन तक नहीं छूटी। पर छूटे कैसे? बेटा उसका है ही नहीं। उसने कठोरता से कहा-सच बोल, वर्ना कोड़े बरसेंगे ! इस पर उस महिला में तुरन्त सच-सच बता दिया। पुत्र असली माता को सौंप दिया गया।
जब मुझे महलों में इस न्याय का पता लगा तो मैं महारानी की कुशलता व सूझबूझ पर चकित रह गया। मैंने सोचा- यह गर्भगत बालक का ही प्रभाव है, अतः मेरे चिंतन में बालक का नाम सुमति कुमार रखा जाए। उपस्थित लोगों ने कहा-यही
नाम ठीक है, क्योंकि इस नाम के साथ गर्भकालीन घटनाओं का इतिहास हुआ है।
आवश्यक चुर्णि में वह घटना कुछ भिन्न रूप में मिलती है-महारानी बालक को चीरने की बात न कहकर सिर्फ इतना ही कहती है कि मेरे गर्भ में भावी तीर्थंकर है, उसका जन्म हो तब तक बालक मुझे सौंप दो बाद में निर्णय हो जाएगा। इस बात के लिये नकली मां तुरन्त रजामंद हो जाती है, किन्तु असली मां मना करती है पुत्र बिरह की व्याकुलता प्रकट करती रही, और रानी ने उसकी व्याकुलता देखकर उसके पक्ष में निर्णय दे दिया।
विवाह और राज्य
राजकुमार सुमती ने ज्योंही युवावस्था में प्रवेश किया, महाराज मेघ ने अनेक सुयोग्य समवयस्क कन्याओं से उसका विवाह कर दिया। भोगावली कर्मो के उदय से वे पंचेन्द्रिय सुखों का उपभोग करने लगे। अवसर देखकर सम्राद मेघ ने राजकुमार सुमति का राज्याभिषेक किया और स्वयं निवृत्त हो कर साधना में निरत हो गये।
राजकुमार सुमति राजा बनकर राज्य का समुचित संचा-लन करने लगे। जनता के दिलों में आपके प्रति गहरी आस्था थी। लोग आपको यथा-नाम तथा-गुण मानते थे। आपका जो भी आदेश होता, लोग श्रद्धा से स्वीकार करते थे। राजकीय व्यवस्था बहुत ही सुन्दर रूप में चलती थी। भोगावली कर्मों के क्षीण होने पर आप संयम की ओर प्रवृत्त हुए। लोकांतिक देवों केआगमन के बाद भगवान् ने वर्षीदान दिया।
निर्धारित तिथि, वैशाख शुक्ला नवमी के दिन एक हजार
व्यक्तियों के साथ पंचमुष्ठि लोच करके अपने सावद्य योगों का त्याग कर दिया। दीक्षा के दिन आप भोजन युक्त थे। कुछ ग्रंथों में आपके पष्ट भक्त (बेले) की तपस्या होने का उल्लेख है। दूसरे दिन विजयपुर के राजा पद्म के यहां आपका प्रथम पारणा हुआा ।
भगवान् बीस वर्ष तक छद्मस्थ काल में उत्कृष्ट साधना करते हुए विचरे । धर्मध्यान व शुक्ल-ध्यान से अपूर्व कर्म-निर्जरा करके क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ हुए। मोह-कर्म को क्षय करके आपने यथाख्यात चारित्र प्राप्त किया तथा तेरहवें गुण-स्थान में तीन घाती कर्मों को क्षय कर सर्वज्ञता प्राप्त की।
देवों ने उत्सव किया। समवशरण की रचना की गई। देव दुंदुभि सुनकर लोग बड़ी संख्या में प्रवचन में उपस्थित हुए। भगवान् ने प्रथम देशना में तीर्थ की स्थापना की। आगार व अणगार धर्म को विशेष विवेचना दी। बड़ी संख्या में लोगों ने अपनी-अपनी शक्ति के अनुसार महाव्रत या अणुव्रत ग्रहण किए।
प्रभु का परिवार
गणधर-एक सौ (चरम मुनि आदि)
केवलज्ञानी-तेरह हजार
मनःपर्यव ज्ञानी-दस हजार चार सौ पचास
अवधिज्ञानी-ग्यारह हजार
चतुर्दश पूर्वी-दो हजार चार सौ
वेक्रिय लब्धिधर-अठारह हजार चार सौ
चर्चावादी-दस हजार छ सौ पचास
साधु-तीन लाख बीस हजार
साध्वी-पांच लाख तीस हजार,(काश्यपी आदि।)
श्रावक-दो लाख इक्यासी हजार
श्राविका-पांच लाख सोलह हजार
निर्वाण
भगवान् ने एक लाख पूर्व तक चारित्र का पालन किया। केवलज्ञान से अपने आयुष्य का अन्त जानकर एक मास का अनशन सम्मेदशिखर पर जाकर किया। चैत्र शुक्ला नवमी के दिन समस्त कर्मों को क्षय करके आप सिद्ध बन गये।
पांच कल्यानक तिथियां-
१. च्यवन-श्रावण शुक्ला २
२. जन्म-वैशाख शुक्ला ८
३. दीक्षा वैशाख शुक्ला ६
४. ज्ञान प्राप्ति-चैत्र शुक्ला ११
५. निर्वाण चैत्र शुक्ला ६
६कैवल्य वृक्ष -beauti berry tree
७ प्रतीक -curlew
