श्री महावीर स्तवन झूले, पलने झूले
(तर्ज बच्चे मन के सच्चे ….. दो कलियाँ)
झूले, पलने झूले, सारे जग के तारण हारे।
इन्द्र इन्द्राणी हर्ष मनाये, आकर द्वार तुम्हारे ।। झूले
चेत सुदी तेरस का दिन, हर्षित मात-पिता सब जन।
चारों दिशी मंगल छाया, सबने सुर सरगम पाया ।।
देव दुंदुभि बजने लगी, छुम छुम रंभा करने लगी।
सिद्धारथ-त्रिशला के कुल में, जनमे वीर हमारे ।।। ।।
झूले पलने झूले …
कुण्डलपुर की डगर-डगर, शाम सुबह और आठ प्रहर।
वर्द्धमान का सुमीरन कर, थकते हैं ना नारी नर।।
दुःख दरिद्र मिटाने को, सुख अमृत बरसाने को।
पञ्च महाव्रत को समझाने, स्वामी आप पधारे।। 2 ।।
झूले पलने झूले …
चौदह नियम की गरिमा है, इस पलने की महिमा है।