त्रिशला नन्दन वीर प्रभु की गौरव गाथा गाएंगे। गुण गरिमामय गीतों से यह रसना सरस बनाएंगे ॥
१. चैत्री शुक्ला त्रयोदशी को पावन जन्म तुम्हारा है। उमड़ पड़ी खुशियां महलों में जब से तुम्हें निहारा है। वर्धमान अभिधान पिता ने दिया स्नेह से प्यारा है शैशव की अनगिन स्वर्णिम घटनाएं स्मृति में लाएंगे ॥
२. माता और पिता के रहते दीक्षा लेना मुझे नहीं। गर्भकाल में प्रभो! तुम्हारा, था मन का संकल्प सही। अट्ठाईस वर्ष बीते, भ्राता ने जाने दिया नहीं, तीस वर्ष के चले साधना पथ पर महिमा गाएंगे ॥
३. आए थे उपसर्ग भयंकर, महावीर ना घबराए। अक्षय दीप शिखा क्या झंझावातों से वुझने पाए। भीषण तूफानों से मन्दर पर्वत क्या कब हिल जाए। सागर सम गम्भीर! वीर! तेरी बलिहारी जाएंगे ॥
४. घंटों प्रहरों ध्यान मौन, प्रभु करते दीर्घ तपस्यायें । किये अभिग्रह अद्भुत सुनने से रोमांचित बन जाएं। चन्दनबाला के उड़दों का दान अमर यों कहलाए। टूट गए बन्धन कर्मों के हम सब शीष झुकाएंगे ॥
(तर्ज : चांदी की दीवार)