म्हां स्यूं मूंढे बोल
(तर्ज : पन्नजी मुंढे बोल )
म्हां स्यूं मूंढे बोल, बोल बोल आदिश्वर बाला कांई थांरी मरजी रे, म्हां स्यूं मूंढे बोल….
मोरां देवी बाट जोवता इतने बधाई आई रे आज ऋषभ उतस्या बाग में सुण हरषाई रे।। १।।
न्हाय धोय ने गज असवारी, कर मोरां देवी माता रे जाय बाग में नन्दन निरख्या, पाई साता रे।। २।।
राज छोड़ने निकल्यो ऋषभ, आ लीला अद्भुति रे चंवर छत्र ने ओ सिंहासन, मोहन मूरत रे।। ३।।
दिन भर बैठी वाट जोवती, कद म्हारो ऋषभ आसी रे कहती भरत ने ‘आदि’ की खबरों ल्यावो रे।। ४।।
किसे देश में गयो बालेसर, तुझ बिन वनिता सुनी रे बात कहो दिल खोल लालजी क्यूं बण्या मुनि रे।। ५।।
रह्या मजे में, है सुख साता, खूब किया दिल चाया रे अब तो बोल आदेश्वर म्हां स्यूं कलपे कायारे।। ६ ।।
खैर हुई सो हो गई वाल्हा, बात भली नहीं कीन्हीं रे गयां पछै कागद नहीं दीन्यो, म्हारी खबर न लीन्हीरे ।। ७ ।।
ओळम्मों के देऊं कंठा लग, पाछो क्यूं नहीं बोले रे दुःख जननी का देख आदेश्वर हीवड़ो तोलेरे ।। ८ ।।
अनित्य भावना भाई माताजी निज आत्मा ने तारी रे केवल पाया मुक्ति सिधाया ज्यानै वंदना म्हारी रे।। ६।।
मुक्ति रा दरवाजा खोल्या, मोरा देवी माता रे काल असंख्यात रया उघाड़ा, जम्बू जड़ गया जाता रे।। १०।।
साल बहोतर तीर्थ ओशिया गणवर प्रभु गुण गाया रे मुनि मोहन प्रथम जिनन्द की प्रणमूं पायां रे ।। ११ ।।
तपस्या में साझ मिलै
(तर्ज : म्हैं तो बाबुल रै बागां री चिड़कली)