सीमंधर भगवान
जी मैं चरणां शीश नमाऊ जी मैं दर्शण किण विध पाऊं। जी म्हारी वीनतड़ी अवधारो, जी मोहे तारो पार उतारो। जी संसार लगै छै खारो, जो वैराग्य लगै छै प्यारो। जी म्हारा आवागमन निवारो, जी सीमंधर भगवान ।।
१. सीमंधर प्रभु नै प्रणमुं, चरणां शीश नमाय, आप तणां गुण मुख स्यूं गायों म्हारा भव-भव रा दुख जाय, स्वाम म्हारा भव-भव रा दुख जाय, जी मैं चरणां….॥
२. चौतीस अतिशय अती शोभता, वाणी गुण पैंतीस, एक सहस्त्र अठ लखण विराजै, जीत्या राग न रीष।॥ स्वाम म्हारा…
३. काया ऊँची धनुष पांच सौ, सूतर में विस्तार, स्फटिक सिंहासन आप विराज्या, थाप्या तीरथ च्यार ।। स्वाम म्हारा…
४. झिगमिग ज्योत झीगामिग दीपै, कंचन वरणी काय, चौसठ इन्द्र करै थांरी सेवा, सुर नर लागै पाय ।। स्वाम म्हारा…
५. हीवड़े में तो हूँस घणी छै दर्शण करूं तिहां आय, आडा पर्वत बहती नदियां, आयो किणविध जाय ॥ स्वाम म्हारा…
६. देव मित्र इसड़ो नहिं म्हारै, विमान में वैसाय । शक्ति नहीं मैं किणविध आऊँ, लब्धि न फोड़ी जाय।। स्वाम म्हारा…
७. इह भव में तो आय नहिं सकूं करूं जु कोड़ उपाय, सूतर मांही वचन आप रा, चालूं तिण रे न्याय ॥ स्वाम म्हारा…
८. शील रथे ऊपर बेसी नै धर्म ध्वजा फहराय, समकित ज्योत करी अगवाणी, करण जोग दोय लार । स्वाम म्हारा…
९. ज्ञान कटारी कस कर बाँधू, तप रूपी तलवार, राग द्वेष दोय पतला पाडूं, करयू खेवो पार ॥ स्वाम म्हारा…
१०. सूत्र वचन परमाण करी नै च्यार कषाय निवार, अरिहंत, सिद्ध तणा गुण गाऊँ, गण उतरूं भव पार ।। स्वाम म्हारा…
जी में चरणां शीश…….