चैत्य पुरुष
लय : चैत्य पुरुष जग जाए।
देव! तुम्हारा पुण्य नाम मेरे मन में रम जाए।
ॐॐॐ .. उद्गाता। अर्ह अहँ अर्ह अहँ अर्ह अईं त्राता।
ॐ ही श्री जय, ॐ ही श्री जय, विजय ध्वजा लहराए ॥ चेत्य.. ॥१ ॥
ॐ जय भिक्षु भिक्षु जय ॐ ॐ ही श्रीं ह्रीं श्रीं ह्रीं श्रीं।
विघ्न शमन ॐ व्याधि शमन ऊँ, क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं क्लीं ॥ नाम मंत्र तव व्रण-संरोहण, सतत अमृत बरसाए ॥ चेत्य… ॥२ ॥
मिटे विषमता मन की, तन की, अनुभव की, चिन्तन की,
पल-पल, पग-पग, मिले सफलता, तन्मयता चेतन की।
नाम मंत्र तव भयहर विषहर, साम्य सिन्धु गहराए ॥ चैत्य.. ॥३॥
आत्मा भिन्न, शरीर भिन्न है, तुमने मंत्र पढ़ाया,
आत्मा अचल अरुज शिव शाश्वत, नश्वर है यह काया। आत्मा आत्मा के द्वारा ही. आत्मा में लय पाए ॥ चेत्य. ॥४॥
तुम निरुपद्रव, हम निरुपद्रव, तुम हम सब हैं आत्मा,
तव जागृत आत्मा से हम सब, बन जाएं परमात्मा।
ऊँ हां हीं हैं. हौं हं ह: अन्तर मल घुल जाए ॥ चैत्य. ॥५ ॥