।। श्री शंकर वन्दना ।।
(तर्ज-मणिहारी का भेष बनाया…)
डमरू वाले की लीला है न्यारी,
इसे कहते है भोला भण्डारी ।। टेर ।।
करके योगी को भेष, रहता हरदम महेश,
ये तो नन्दी की करता है सवारी ।।१।।
ऊँचे पर्वत शिखर, भोले बाबा का घर,
संग रहती हिमाचल दुलारी ।।२ ।।
लागी कैसी लगन, राम धुन में मगन,
श्री राम का पक्का पुजारी ।। ३ ।।
जो भी भजता इसे, ये ना तजता उसे
, खोल देता दया की पिटारी ।।४।।