Parmeshti Stavan

परमेष्ठी स्तवन

(लय- नीले घोड़े रा असवार)

मंगल महामंत्र नवकार, ऋद्धि सिद्धि का भंडार ।
भक्ति रस से गावो रे, सिद्धि पथ अपनावो रे ।
परमेष्ठी पंचक में पहला, अरिहंतों का नाम ।
तीर्थंकर पद किया सुशोभित, सफल हुए सब काम ।
चारों तीर्थ बने गुलजार, पाकर तुम जैसा आधार ||1||
परमात्मा पद पर हैं प्रतिष्ठित, अजर अमर अविनाश ।
सिद्ध सिद्धपदवासी बनकर, फैलाते उजास ।
हर क्षण जलती चिन्मय ज्योत, भवसागर से तरणी पोत ।।2।।
गणधारक आचार कुशल हैं, आर्यप्रवर सुविशेष ।
छत्तीस गुणों के संधारक, जग में प्रख्यात गणेश ।
सम्यक् दर्शनज्ञानप्रदाता, चारित्रचूड़ामणि के दाता ।।३।।
उपाध्याय आगम अध्येता, श्रुतधर तारणहार ।
जिनशासन के ज्ञानसूर्य, भक्तों के पालनहार ।
जिनप्रवचन पाथेय प्रदाता, आगम सूत्रों के हो ज्ञाता ।।4।।
संयम सरवर में निशदिन, मुनिवर रहते गलतान ।
सावज्जं जोगं पच्चक्खामि, जावजीव इकतान ।
गागर में सागर सम धीर, व्रतपालन में हैं महावीर ।।5।।
महामंत्र नवकार जपो नित, शरण सदा सुखकारी ।
भाग्योदय से प्राप्त हुआ, यह मंत्र परम उपकारी ।
सघन कर्म भी बने विलीन, जाप जपो होकर लयलीन ।।6।।
आधि व्याधि उपाधि का यह, बहुत बड़ा उपचार ।
साधक रहता नित समाधि में, पाकर सक्षम आधार ।
होता ‘मंगल’ आठों याम, सुधरे इससे सारे काम ।।7।।
(तर्ज – नीले घोड़े रा असवार ….)

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top