Tapasya ra Gun gao
तपस्या का गुण गालो रे वन्दे !
(तर्ज : कस्में वादे प्यार वफा सब…..)
रचयिता : अभय बरड़िया
तपस्या का गुण गालो रे बन्दे, तप से होता बेड़ा पार आत्मा की उज्ज्वलता बढ़ती, मिट जाता कर्मों का ताप
क्रोध मान माया और लोभ के चक्कर में पड़ मत जाना राह पकड़ले समता रस की, सीधा भव से तर जाना। सरल हृदय……२ और न कपटाई, मुक्ति पथ तु पायेगा।। तपस्या का गुण गालो रे….. ।।१।।
धन्नो ,शाली भद्र मुनि की तप महिमा सब गाते हैं पन्ना ,भूरा सतिवर को भी भूल नहीं हम पाते हैं तपस्या का….-२ श्रृंगार तो देखो, सुख मुनिवर हर्षाते हैं।।
तपस्या का गुण गालो रे….. ।।२।।
नौ नवरंगी, सौ पचरंगी, का नव इतिहास रचाया है, अणिमाश्रीजी, मंगलप्रज्ञा ने तप का भाग्य जगाया है, सहवर्तिनी….-२ साध्वीवर ने सबका भाव बढ़ाया है।। तपस्या का गुण गालो रे…..।।३।।
भिक्षु शासन मिला जयवन्ता, तपसी शान बढ़ाते हैं, अपनी आत्मा उज्ज्वल करते, गण गरिमा को बढ़ाते हैं, एक से बढ़कर……-२ एक तपस्वी “अभय” मोद मनाते हैं।। तपस्या का गुण गालो रे….. ।।४।