(लय- उड़ उड़ रे म्हारा काला रे कांगला)
उड उड रे -३मन देवलोक में ,भिक्षु रा दरशण कर आवा-२
१.गाँव कंटालिये म अवतरियो ,ज्ञान सुधास्यू घटने भरियो सुधरी स्यू निज पथ न वरियो, उण पथ म्हे चलता जांवा भिक्षु रा दरशण कर आवा-२
② आगम ने आधार बणायो शुद्ध साध रो रुप जणायो
तेरा पंथ रो रोप्यो पायो मंजिल परबढ़ताजावा
भिक्षु रा दरशण कर आवा-२
३.दृढ़ श्रद्धा से जो भी ध्यावे रोग शोकं नेडा नहीं आवे
कष्ट पीडा सब दूर भगावे जाप जपा तो मन सुख पावे
भिक्षु रा दरशण कर आवा-२
④ अंतकाल सिरियारी आया, अवधि ज्ञान गुरु ने पाया पदमासन में छुटी काया, गुरु की गौरव गाथा गावा
चरण कमल में शीश झुकावा
भिक्षु रा दरशण कर आवा-२