Chobisi Char Rago Me(Bhanchya)

चौबीसी चार रागों में

राग-लहरो
भिक्ष भजल्योजी।
भिक्षु भजल्यो भलै भाव सूजी महाराज सा
तरण तारण गुरुदेव राज भिक्षुभजल्यो जी ।
अगणा संभवनाथ बानस्याओ निणजी। चौथा अभिनन्दन देवराज
भिक्षु भजल्यो जी।।२।।
पांचवा सुमतिनाथ बानस्याओ जिणजी। छठा पदमप्रभु देवराज
भिक्षु भजल्यो जी।।३।।
भिक्षु तो भजल्यो भले भाव स्सू जी महाराजसा 
तरण तारण गुरुदेव राज, भिक्षु भजल्योजी ।।४।।
राग-मरवो
मै तनै मालण बरजियो, इण दिश मरवो मत बाय। इण दिश आसी साथ सुहावणा। श्रावक जोये बारी बाट।
मुखडै बिराजै बारे मुमत्ति। हाथ अमौलक लोट।।५।। सातवां सुपारसनाथ बानस्या, आठवां चंद्रप्रभु देव। 
नौवां सुविधिनाथ बानस्या, दसवा शीतलनाथ देव। 
मैं तनै मालण बरजियो। इण दिश मरवो मति बाय।।६।।
ग्यारहवां श्रेयांसनाथ बानस्या, बारहवां वासुपूज्य देव।
 मैं तनै मालण बरजियो। इण दिशा मरवो मति बाय।
इण दिशा आसी साध सुहावणा। श्रावक जौवै बारी बाट ।।७।।
राग-सुवा
उड रे, सुवा पिचरंगा।
तेरहवां बिमलनाथ बानस्या, कोई चौदहवां अंतिनाथ देव।
सुवा पिचरंगा ।।८।।
पंद्रहवां धर्म-नाथ बानस्या, कोई सोलहवां शांतिनाथ देव।
सुवा पिचरंगा।।९।।
सत्रवाकुंथुनाथ बानस्या कोई अठारवा अरनाथ देव।
सुवा पिचरंगा ।।८।।
उडरे सुवा पिचरंगा तूं जाने लाडनूं शहर।
सुवा पिचरंगा। महाराजा नै जाकर सुआ यूं कहिजै
थांरी तपसण जोवै बाट। सुवा पिचरंगा।।
राग चुनड़ी
म्हारी शील सुरंगी चुनड़ी तपस्या में सोवै ओ राज
उन्नीसवां मल्लिनाथ बानस्या, जिणजी बीसवां मुनि सुव्रत देवजी।
म्हारी शील सुरंगी चुनड़ी, तपस्या में सोवै ओ राज ।।११।। इक्कीसवां नेमिनाथ बानस्या, जिणजी बाईसवां अरिष्टनेमिनाथजी।
म्हारी शील सुरंगी चुनड़ी, तपस्या में सोवै ओ राज।।१२।।
तेईसवां पाश्र्वनाथ बानस्या, जिणगी चोवीसवां महावीर देवजी
म्हारी शील सुरंगी चुनड़ी, तपस्या में सोवै ओ राज। तपस्या में सोवै चुनड़ी सोलह-सतियों में नोसरहारजी।
म्हारी ज्ञानी गुरां रो दुप्पटो, महाराज सा नै सोवै ओ राज ।।१३।। अनन्त चौवीसी नै बानस्या, जिणजी नीचो ही शीष नमायजी।
म्हारी शील सुरंगी चुनड़ी, तपस्या में सोवै ओ राज।।१४।। ग्यारह गणधर बानस्यां जिणजी बीस बिरहमान देवजी।
म्हारी शील सुरंगी चुनड़ी, तपस्या में सोवै ओ राज ।।१५।। पूज्य महाश्रमण जी ने बानस्या, जिणजी पांचो ही अंग नमाय जी।
मुखडें बिराजै मुमत्ति महाराजसा, दया रो डोरो कान जी। म्हारी शील सुरंगी चुनड़ी, तपस्या में सोवै ओ राज ।।१६ ।।
म्हारी शील सुरंगी चुनड़ी, तपस्या में सोवै ओ राज।।१७।।
ऊंचे सिंहासन आपरो बैठणो महाराजसा, नीचे पुरखदा रो ठाटजी।
म्हारी शील सुरंगी चुनड़ी, तपस्या में सोबै ओ राज।।१८ ।। हरियो सो पुठो आपरै हाथ में महाराजसा, बाँचोनी सुतर व्याख्यानजी।
म्हारी शील सुरंगी चुनड़ी, तपस्या में सोवै ओ राज।।१९।। भाया तो वाणी आपरी झेलसी महाराजसा, बायां सुणै रे व्याख्यानजी।
म्हारी शील सुरंगी चुनड़ी, तपस्या में सोवै ओ राज। तपस्या में सोवे चुनड़ी, सोलह सतियां में नौसर हार जी।
म्हारी शील सुरंगी चुनड़ी, तपस्या में सोवै ओ राज।।२

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