दुर्लभ मानव जीवन
(लय : ऐ मेरे दिले नादान……..)
दुर्लभ मानव जीवन तेरे हाथ मे आया है,
इस क्षण भंगुर जग में, मन क्यों ललचाया है।
दुर्लभ……. ॥ ध्रुव ॥
यह तन तो मिट्टी का, एक बना खिलौना है,
इस नश्वर तन को तो, इतना क्या धोना है,
जिसने छोडी ममता उसने सुख पाया है।
दुर्लभ……. ॥ १ ॥
इक दिन तो तज कर के जाना धन परिजन को,
आखिर में जलायेंगे सुन्दर तेरे तन को,
इस काल बलि आगे, कोई नहीं बच पाया है।
दुर्लभ……. ॥ २॥
तू सोच जरा तूझको, आगे कहां जाना है,
क्या तजना है तूझकों, क्या संग ले जाना है,
माया के कीचड़ में क्यों पैर बढाया है।
दुर्लभ……. ॥ ३ ॥
अब छोड़ तेरा मेरा, प्रभुवर का ध्यान लगा,
मन मन्दिर में निर्मल, भावों की ज्योति जगा,
‘सुव्रत’ भौतिक सुख तो भाई बादल छाया है।
दुर्लभ..
॥ ४ ॥