Mahamantra Navkar Sumiran

महामंत्र नवकार, सुमिरण नित्य करोजी, नित्य करो। जैनागम का सार, प्रातः ध्यान धरोजी, ध्यान धरो।
१. श्रावक का आचार, पहला बतलाया जी, बतलाया। शुभ मन जपते जाप, मुक्ति-पद पाया जी, पद पाया।
२. है स्वार्थ भरा संसार, कोई नहीं अपना जी, नहीं अपना। सुख-दुःख में आधार, नव पद है शरणाजी, है शरणा॥
३. ले शरण सुदर्शन सेठ, जाता दर्शन को जी, दर्शन को। शूल बनी झट फूल, विस्मय जन-जन को जी, जन-जन को ॥
४. बढ़ा द्रौपदी चीर, नवपद जपने से जी, जपने से।
 बच गया अमर कुमार, देखो मरने से जी, मरने से ॥
५. नाग बना गलहार, श्रीमती हरसायी जी, हरसाई। अनल हुई झट शान्त, सीता जय पाई जी, जय पाई॥
६. रोग शोक व्यवधान, सारे कट जाते जी, कट जाते। कष्टों के तूफान, पल में हट जाते जी, हट जाते॥
७. ‘राजुल’ के उद्गार, माला नित जपनाजी, नित जपना। क्या मिट्टी से प्यार, आखिर जग सुपना जी, जग सुपना ॥

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