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अरिष्टनेमि प्रभु स्तवन
प्रभु नेम स्वामी! तूं जगनाथ अंतरयामी। रिठनेम स्वामी! तूं जगनाथ अंतरयामी ॥
1. तूं तोरण स्यूं फिर्यो जिन-स्वाम, अद्भुत बात करी तें अमाम। प्रभु नेम स्वामी! तूं जगनाथ अंतरयामी ॥
2. राजिमती छांडी जिनराय, शिव-सुन्दर स्यूं प्रीत लगाय। प्रभु नेम स्वामी! तूं जगनाथ अंतरयामी॥
3. केवल पाया ध्यान वर ध्याय, इन्द्र शची निरखै हरषाय। प्रभु नेम स्वामी ! तूं जगनाथ अंतरयामी ॥
4. नेरिया पिण पामैं मन मोद, तुझ कल्याण सुर करत विनोद। प्रभु नेम स्वामी! तूं जगनाथ अंतरयामी॥
5. राग-रहित शिव सुख स्यूं प्रीत, कर्म हणै बलि द्वेष रहीत। प्रभु नेम स्वामी! तूं जगनाथ अंतरयामी॥
6. इचरजकारी थांरो चरित्त, हूं प्रणमूं कर जोड़ी नित्त। प्रभु नेम स्वामी! तूं जगनाथ अंतरयामी ॥
7. उगणीसै बिद चौथ कुमार, नेम जप्यां पायो सुखसार। प्रभु नेम स्वामी! तूं जगनाथ अंतरयामी॥
(लय : व्रजवासी लाला कान)