क्षमा दिवस (मैत्री मंत्र)
(तर्ज : कोटि कोटि कंठों से गाएं……)
बड़े प्रेम से मिलजुल सीखें, मैत्री-मंत्र महान रे । औरों से ले क्षमा स्वयं, औरो को करे प्रदान रे ।।
व्यक्ति – व्यक्ति में जाति-जाति में, वैमनस्य जो बढ़ता, प्रातं-प्रांत में राष्ट्र-राष्ट्र में, अन्तर जाता पड़ता । यह भारी, विश्व-शान्ति को खतरा, हो इसका अवसान रे ।।9।।
औरों की भूलों को भूले, अपनी भूल सुधारे, कभी न करता मैं गलती, इस अहं बृत्ति को मारें । खुद झुकें, झुकाएं दुनिया को, यह सरल मनोविज्ञान रे ।।२।।
अपनी भूल जान लेने पर भी, जो अकड़े रहते, लातें खाने पर भी पूंछ, गधे की पकड़े रहते । इस अकड़-पकड़ को छोड़, बढ़ाएं मानवता का मान रे ।।३।।
छोटी सी भी बात डाल देती, है बड़ी दरारें, गलतफहमियों से खिंच जाती, आंगन में दीवारें । इसका हो, समुचित समाधान, ज्यों मिट जाए व्यवधान रे ।।४।।
कटुता मिटे परस्पर, वैसा वातावरण बनाएं,
बढ़े सुजनता “तुलसी” ऐसे मैत्री दिवस मनाएं ।
हो निश्चल, निरभिमान मानव मन, यह अणुव्रत अभियान रे ।।५।।