(लय- खिण – खिण ए बीत्या)
तपस्या री महिमा भारी, तपस्या है मंगलकारी,
तपस्या जीवन रो सिणगार है।
हो भाया! तपस्या स्यूं होवे नैया पार है ॥ स्थायी ।।
तप है गंगा तप है जमना, तप है तीरथ धाम जी
, तप रा जठे नगारा बाजे, सरे अचिंत्या काम जी, आत्मिक शांति रो पथ है, शिवपुर जावण रो रथ है। चढज्यावै बो हो जावे पार है ।। 1 ।।
तन मन रा सब रोग मिटावे, उतळे आत्मा राम जी,
तप रे मारग जो भी चाले, देव करे गुणग्राम जी,
टूटे तप स्यूं अघबंधन, आत्मा बण जावे कुंदन।
खुल जावे शिवनगरी रा द्वार है ॥2॥
उदर भरयोडो होवे जद तो, तप में पूरो मन लागे,
के उपवास आठ के पूरा, मासखमण पचखूं सागे,
पर जब आ भूख सतावे, सारो ही रोब गमावे।
छा जावे आंख्यां में अधार है ॥3॥
पर जो शूरवीर होवे वो, इण रे सामी मंड जावे,
शूरवीर रे घर ‘ आ, भजन मंडली गुण गावे,
हिम्मत की कीमत भारी, हिम्मत री महिमा न्यारी।
तप स्यूं चमन हुयो गुलजार है ॥4॥
(