जैन काल गणना में एक काल-चक्र बीस करोड़ा-करोड़ सागरोपम का होता है। काल-चक्र के उत्सर्पिणी तथाअवसर्पिणी नाम से दो विभाग हैं, प्रत्येक विभाग दस-दस करोड़ा करोड़ सागपरोपम का है। उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के छः-छः विभाग होते हैं। उन्हें आगम की भाषा में ‘आरा’ कहते-हैं। उत्सर्पिणी काल के आरा (विभाग) सर्प को पूंछ से मुख की ओर क्रमशः बिस्तृत(बड़े) होते चले जाते हैं। अवसर्पिणी काल के आरा सर्प के मुख से पूछ की ओर क्रमशः संकुचित होते जाते हैं।
वर्तमान काल अवसर्पिणी है। इसका पहला आरा
चार-करोड़ा करोड़ सागरोपम का तथा दूसरा आरा तीन करोड़ा-करोड़ सागरोपम का बीत चुका था। तीसरा दो करोड़ा-करोड़ सागरोपम का आरा भी लगभग बीत चुका था, तब यौगलिक काल के अन्त में भगवान् वृषभ का जन्म हुआ था ।
वैदिक ग्रन्थों में आता है- मनु पुत्र आध्नीघ्र हुए। उनके पुत्र नाभि राजा थे। नाभि के पुत्र रामावतार से बहुत पहले सत्ययुग के अन्त में अवतरित हुए थे। जैन आगम व वैदिक ग्रंथों के आधार पर यह स्पष्ट है कि भगवान् ऋषभ मानव-संस्कृति के आदिकाल में हुए थे।
वंश उत्पति
भगवान् ऋषभ के समय में कोई वंश (जाति) नहीं था । उस समय बहुत ही शान्त और धैर्य वान मनुष्य होते थे
युगल जन्म लेते थे,उसी जोड़े की, युगल बच्चो को जन्म देने के बाद मृत्यु हो जाती थी,सारी आवश्यकताएं प्रकृति से पूरी होती थी बाद में कुलकर व्यवस्था चली कुलकर सात हुए १.विमलवाहन२.चक्षुषमान३यशस्वी४अभिचन्द्र५ प्रसेनजीत ६मरुदेव७नाभि,
बदलते समय के साथ मनुष्यो के स्वभाव में परिवर्तन होने लगा, प्रकृति प्रदत्त आहार कम पड़ने लगा, लोग आपस में लड़ने झगड़ने लगे, दण्ड व्यवस्थाएं शुरू हुई,
१.हाकार-हा तूने यह क्या किया
२मकार-मत कऱो
३धिक्कार- धिक्कार है
क्रमशः काल के थपेड़ों ने हाकार दंड व्यवस्था को भी निष्प्रभ बना दिया ।
फिर ‘मकार’ दण्ड व्यवस्था चली। कुछ समय बाद वह भी सत्वहीन हो गई। तब ‘धिक्कार’ दंड व्यवस्था चालू की गई। इन तीन दण्ड व्यवस्थाओं से गलत प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने का प्रयत्न कुलकर करते रहे थे, किन्तु ज्यों ज्यों खाद्य का अभाव बढ़ा त्यों-त्यों अराजकता बढ़ी, छीना-झपटी बढ़ी, सभी आतंकित रहने लगे। कल क्या खायेंगे, यह चिन्ता सबको सताने लगी। इस समय सातवें’ और अन्तिम कुलकर श्री नाभि थे । वे भी बेचैन थे,
जब तीनों ही दंड व्यवस्थाएं शिथिल हो चुकी तो लोग यौगलिक युग (अरण्य संस्कृति) से उकता चुके थे। अभावों के कारण लोगों का स्वभाव बिगड़ता जा रहा था। नित नई उलझनें बढ़ती जा रही थीं। समाधान नजर नहीं आ रहा था । उन्हें नियंत्रण में रखने का नाभि के पास कोई कारगर उपाय नहीं था ।
ऋषभ का जन्म
उस समय भगवान ऋषभ की आत्मा सर्वार्थ सिद्ध देव लोक से नाभि कुलकर को जीवनसंगिनी मरूदेवा की पवित्र कुक्षि में अवतरित हुयी। उसी रात्रि में मरुदेवा ने चौदह स्वप्न देखे ।
माता मरुदेवा चौदह स्वप्नों को देखकर हर्षविभोर गई, मरुदेवा ने अपने पति नाभि कुलकर को बताया-नाभि कुलकर ने पूछा-प्रिय ! वे कौन से स्वप्न थे जिनसे तुम विभोर हुयी हो, क्रमशः बताओ तो ?
मरुदेवा ने एक-एक कर स्वप्नों में देखे दृश्य गिनाए १. वृषभ २. हाथी ३. सिंह ४. लक्ष्मी ५. पुष्पमाला ६. चन्द्र ७. सूर्य ८. महेन्द्र ध्वज ६. कुंभ १०. पद्म-सरोवर ११. क्षीर समुद्र १२. देव-विमान १३. रत्न-राशि १४ निर्धूम अग्नि
स्वप्नों को सुनकर नाभि कुलकर चकित हो उठे हरषा तिरेक से झूमते हुए बोले स्वप्न क्या हैं प्राणिमात्र के उज्ज्वल भविष्य की सूचना है। लगता है जल्दी ही हमारी चिन्ता समाप्त होगी । जनपद की समस्यायें सुलझेगी
(. दिगम्बर ग्रन्थों में तीर्थंकर की माता के १६ स्वप्न देखने का उल्लेख है। पूर्वोक्त चौदह के अतिरिक्त मत्स्य युगल तथा सिंहासन ये दो स्वप्न और बताये गये हैं 🙂
गर्भ काल पूरा होने पर चैत्र कृष्णा अष्टमी की मध्य रात्रि में मरुदेवा के एक पुत्र तथा एक पुत्री का युगल रूप में प्रसव हुआ । भगवान् के जन्म पर समूचा विश्व क्षण भर के लिए पुलकित हो उठा, अज्ञात शांति का अनुभव करने लगा। नरक-गत जीवों को भी क्षण भर के लिये शान्ति मिली। चौसठ इन्द्र एकत्रित हुए, सहस्रों देवता भगवान के जन्मोत्सव पर धरा-घाम पर आ पहुंचे । इतनी बड़ी संख्या में देवों को देखकर आस पास के यौगलिक इकट्ठे हो गये । उत्सव विधि से अप-रिचित होते हुए भी देखा-देखी सभी ने मिलकर जन्मोत्सव मनाया। इस अवसर्पिणी काल में सबसे पहले जन्मोत्सव मनाने की विधि वहीं से प्रारम्भ हुई थी ।
नामकरण
भगवान् ऋषभ के नामकरण उत्सव पर बड़ी संख्या में यौगलिक इकट्ठे हुए । उस युग की पहली घटना थी कि किसी के नामकरण पर इतने लोग इकट्ठे हुए हो । नाभि
कुलकर ने कहा यह जब गर्भ में आया तब इसकी माता को एक साथ चौदह स्वप्न दिखाई दिए थे। उसमे पहला स्वप्न वृषभ का था , बच्चे के उरु प्रदेश में भी वृषभ का चिन्ह था अतः बालक का नाम वृषभ कुमार रखा जाये। उपस्थित सभी युगलों को यह नाम उचित लगा, सभी ने बालक को इस नाम से पुकारा और पुत्री का नाम
दिया सुनंदा (दिगम्बर आम्नाय में नामकरण के बारे में भिन्न मत है।)
महाबंध पुराण के अनुसार इग्यारवें दिन इन्द्र ने स्वयं आकर नामकरण विधि लोगों को बताई। इन्द्र को आया देखकर काफी युगल इकट्ठे हो गए। इन्द्र ने लोगों से कहा-यह बालक आगे चलकर धर्म रूपी अमृत की वर्षा करेगा, अतः बालक का नाम ऋषभ कुमार रखता हूं। इन्द्र की बात का समर्थन करते हुए सभी युगलों ने बालक को ऋषभ कुमार कह कर पुकारा।
वैदिक ग्रंथ भागवतकार ने लिखा है- बालक का सुन्दर व सुदीर्घ शरीर, तेजस्वी ललाट, अतुल पराक्रमी देखकर नाभि राजा ने उसका नाम ऋषभ रखा ।
भगवान् का सबसे पहले नाम ‘वृषभ देव’ हुआ, संभवतः उच्चारण सरलता से वही ‘ऋषभ’ हो गया। वैसे कल्पसूत्र को टीका में पांच गुण निष्पन्न उनके नाम बतलाए हैं-१. वृषभ, २. प्रथम राजा, ३. प्रथम भिक्षाचर, ४. प्रथम जिन ५. प्रथम तीर्थकर । इनके अतिरिक्त आदिनाथ, आदिम बाबा नाम भी ग्रन्थों में आए हैं।
काल निर्णय
भगवान् ऋषभ का जन्म किस काल में हुआ, इस बारे में
में इतिहास कार मौन है
ऋषभ कुमार एक वर्ष के हुए तब एकदा अपने पिता की गोद में बाल क्रीड़ा कर रहे थे। इतने में इन्द्र एक थाल में विभिन्न खाद्म वस्तुएं सजाकर बालक ऋषभ के समक्ष उपस्थित हुए। ऋषभ कुमार ने प्रथम का गन्ना ऊठाकर चूसने का यत्न किया।
इन्द्र ने घोषणा की बालक ऋषभ कुमार को इक्षु प्रिय है, अतः आगे इस वंश का नाम इक्ष्वाकु वंश होगा। इक्ष्वाकु वंश की स्थापना के साथ ही वंश परम्परा स्थापित हुई।
विवाह
ऋषभ ने जब तारुण्य में प्रवेश किया तो उनका विवाह दो लड़कियों के साथ कर दिया गया। एक लड़की उनके साथ जन्मी हुई थी सुनंदा, दूसरी जो अनाथ थी सुमंगला
* लोग शादी से अपरिचित थे। उससे पहले युगलजनों में कभी शादी नहीं होती थी। साथ में जन्मे भाई बहिन ही आगे चलकर स्वभाव से पति-पत्नी बन जाते थे। शादी नाम की कोई रस्म नहीं होती थी। दूसरो के प्रति विकार उत्पन्न भी नहीं होता था। दूसरों के साथ विकार होना सर्वाधिक जघन्य कार्य माना जाता था।
उस समय साथ में जन्मे हुए परस्पर एक दूसरे पर अधिकार समझते थे। यह पहला प्रसंग था कि जब किसी ने अपने साथ जन्म लेने वाली लड़की को पत्नी बनाया और इस रूप में दी की। धीरे धीरे लोगों के दिमाग में शादी की उपयोगिता समझ में आने लगी।
सन्तान
यौगलिक काल में सीमित सन्तान का नियम अटल था। हर युगल के जीवन में एक ही बार संतानोत्पत्ति होती थी, और वह भी, युगल के रूप में। पहले पहल ऋषभ के घर
में यह क्रम टूटा। पत्नी सुनंदा के तो एक ही युगल का जन्म हुआ। बाहुबलि और सुन्दरी सुमंगला के पचास युगल जन्मे जिनमें प्रथम युगल में भरत और ब्राह्मी का जन्म हुवा। शेष उनपचास युगलो में पुत्र ही पुत्र पैदा हुए। इस प्रकार अट्ठानवे पुत्र तो ये हुये और भरत-बाहुबलि दोनों दो बहिनों के साथ जन्मे। कुल मिलाकर ऋषभ के सौ पुत्र और दो पुत्रियां थी। सबसे बड़ा पुत्र भरत था। इसके बाद तो अन्य युगल दम्पतियों के भी अनेक पुत्र-पुत्रियां होने लगी । तभी आगे चलकर इन सबकी शादियां अनेकों कन्याओं से होने का उल्लेख है। जनसंख्या भी बहुत तेजी से बढ़ने लगी थी।
राज्याभिषेक
एक दिन कुछ युगल ऋषभ कुमार के पास बैठे बातें कर रहे थे। अभाव के बारे में जिक्र चल पड़ा। सभी दुःखी थे
आतंकित थे। ऋषभ देव से पूछ बैठे- इसका कभी समाधान भी होगा या यों ही लड़-झगड़कर सबको मरना पड़ेगा? जीना दूभर हो रहा है।
ऋषभ ने मुस्कराकर कहा समय के साथ व्यवस्था बदलनी पड़ती है, अपनी आदतों में परिवर्तन करना पड़ता है। ऐसा करने पर समस्या स्वतः समाप्त हो जाती है। अब कुल-कर व्यवस्था से काम नहीं चलेगा। अब तो एक विधिवत राजा होना चाहिए, उसके अनुशासन से ही समस्या सुलझ सकती है। राजा की सूझ-बूझ से ही अभाव समाप्त हो सकता है।
उपस्थित युगल जनों ने कहा हम तो जानते नहीं, राजा क्या होता है? तब ऋषभ ने राजा का दायित्व बताया। युगलों ने कहा-ऐसी क्षमता तो सिर्फ आप में है, औरों में नहीं। आप ही बन जाइये राजा। ऋषभ ने कहा-तुम कुलकर नाभि से निवेदन करो, वे शायद राजा बन जाएं।
युगल मिलकर कुलकर नाभि के पास आए। उनसे राजा बनने की प्रार्थता की। कुलकर नाभि पहले से ही ऊबे हुए थे, और निराश थे। अपनी व्यवस्था से स्वयं असंतुष्ट थे । निःश्वास छोड़ते हुये बोले- मेरे वश का रोग नहीं है। जमाना बहुत खराब आ चुका है।जाओ, तुम ऋषभ के पास ही जाओ। वही राजा बनेगा और समस्याओं को सुलझायेगा। अब कल से तुम्हारी समस्या और शिकायतें ऋषभ के पास किया करो, वही तुम्हें समाधान देगा। मुझे
अब छुटकारा दो।
अब युगल अपनी कल्पना से ऋषभ के राज्याभिषेक की तैयारियां करने लगे। ऋषभ के शरीर को अलंकृत किया। ऋषभ को उच्च आसन पर बिठाकर पैरों में जलाभिषेक करने लगे। इन्द्र से अपने अवधि दर्शन से यह दृश्य तो गद्गगद् हो उठा। तुरन्त मृत्यु-लोक में आया। लोगों के विनय की प्रशंसा करते हुये उस स्थान का नाम उसने वनीता रखा। आगे चलकर वहीं पर विनीता नाम की नगरी बसी।
कृषि कर्म
ऋषभ के समक्ष सबसे पहला काम था खाद्य संकट हटाने का। शेष समस्याएं उसी से जुड़ी हुई थीं। वे जानते भर पेट भोजन मिलने पर ये सभी अनुशासित बन जाएंगे ।ऋषभ ने सबसे कहा-समय बदल गया है,। समय के साथ वृक्षों फल देना बंद कर दिया है। क्या हम फलों के अभाव ये रहेंगे? नहीं, कभी नहीं। हमें भरपेट भोजन मिलेगा, अच्छा भोजन मिलेगा। शर्तं एक ही है कि अब हमें श्रम होगा, खेतों में अनाज बोना होगा, हर चीज उत्पन्न होगी। अतःश्रम करो, सुख से जीओ।
ऋषभ के इस आह्वान से हजारों-हजारों नौजवान खड़े श्रम करने के लिए संकल्पबद्ध हो गये।
ऋषभ ने कृषि के साथ-साथ अन्य सभी आवश्यकताओं की पूर्ति के अन्य उपाय भी सिखाये। प्रत्येक कार्य की विधि उनको स्वयं ही सिखानी पड़ी थी।
छींकी लगाओ
लोग इतने भद्र थे कि उनका बौद्धिक विकास नहीं के बराबर था। जितना बताया जाता था वे उतना ही समझते थे। खेती पकने के बाद उसे काटकर अनाज निकालने की विधि स्वयं ऋषभ ने बतलाई थी। लोग अनाज निकालने लगे। अनाज पर बैलों को घुमा-घुमा कर अनाज और भूसे को अलग-अलग कर रहने लगे, बैलों को भूख लगने पर वे उसी अनाज को खाने लगे। लोग घबराए, सोचने लगे कि ये अनाज खा जाएंगे तो हम क्या खाएंगे? शाम को ऋषभ के पास आए। वे ऋषभ को बाबा के नाम से पुकारते थे। कहने लगे बाबा! अनाज तो बैल खा जाएंगे, फिर हमारे लिए क्या बचेगा ? बाबा ने घास की रस्सियों की छींकी बनाकर कहा- ऐसी छींकी लगादो, फिर नहीं खाएंगे। दूसरे दिन सभी लोगों ने छींकी लगा दी। बैलों के मुंह पर छींकी से बन्द हो गए। दिन-भर कुछ भी नहीं खा सके। किसान खुश थे। आज एक दाना भी अनाज नहीं गया। शाम को उन बैलों के आगे चारा आदि रख दिया, फिर भी उन्होंने नहीं खाया। अब क्या होगा? सब बाबा के पास पहुंचे, अपनी चिंता प्रगट करते हुए बोले- बाबा बैल तो मर जाएंगे, उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया है। बाबा ने पूछा- अरे !
छींकी तो तुमने खोल दी होगी? सबने कहा- खोलने का यह आपने कब कहा था ? बाबा ने कहा- जाओ, जल्दी खोलो, लोगों ने छींकी खोली, तब कहीं बैल खाने-पीने लगे ।
अग्नि की उत्पत्ति
एक दिन कुछ लोग उद्घांत होकर भागे भागे ऋषभ के पास आए। अपने हाथ दिखाते हुए बोले- ये फफोले गए, अब क्या करें ? बाबा ने पूछा- यह कैसे हुआ ? कहा- बाबा! जंगल में लाल-लाल रत्न पैदा हुआ है। ये बड़ा आकर्षक है। प्रारंभ में काला-काला निकलता है, लाल हो जाता है, ऊंचा उठता है। उसमें से लाल-लाल भी निकलते हैं। हमने सोचा-इसे बाबा के पास ले जायेगें वे ही बतायेंगे- इसका नाम क्या है और क्या उपयोग हैं हमने हाथ डाला तो बड़ी पीड़ा हुई, देखा तो ये फफोले हो गए बाबा ! यह क्या चीज है ? हमें तो अब डर लगने लगा है मुस्कराते हुए बाबा ने कहा-अरे ! तुम्हारे भाग्य से पैदा हो गई है। इससे डरने की जरूरत नहीं, इसे समझने जरूरत है। आने वाले युग में यह मानवीय सभ्यता तथा समृद्धि की आधार मानी जाएगी। इसका समुचित उपयोग बहुत लाभप्रद है।
भोजन पकाना
कई लोगों ने बाबा से एक दिन शिकायत की बाबा! पेट भरते हैं किन्तु पहले वाली बात नहीं। पहले खाने के बाद पेट पर कभी भार नहीं होता था। आजकल पेट भारी-भारी रहता है. कभी-कभी पेट दर्द भी करता है। भूख सताती है, अतः खाना तो पड़ता है, किन्तु यह समस्या है। बाबा ने बताया अग्नि में पकाओ
दूसरे दिन लोगों ने अग्नि में अनाज डाल दिया।अनाज अग्नि मे जलकर राख हो गया निराश होकर सभी बाबा के पास गये और शिकायत के स्वर में बोले बाबा अनाज तो अग्नि खा गई, हम क्या खाएंगे? हमने सोचा- पक कर तैयार दीख जाएगा, अग्नि शांत होने पर देखा तो कुछ भी नहीं बचा। अब अन्न पकाएं तो कैसे पकाएं ? अब बाबा ने इस समस्या को सुलझाने के लिए मिट्टी के पात्र बनाए,। स्वयं कुम्हार बने, छोटे-बड़े सब तरह की आवश्यकताओं के बरतन बनाकर सबको बतलाया उनका उपयोग किसतरह करना है, खाना कैसे पकाया जाता है, पूरी की पूरी अग्निपाक विद्या लोगों को सिखलाई। लोग तब से खाना पका कर खाने लगे। उससे पहले कच्चा भोजन ही खाया जाता था ।
असि-कर्म शिक्षा
ऋषभ ने एक वर्ग ऐसा भी तैयार किया जो लोगों की सुरक्षा का दायित्व संभालने में दक्ष हो। उसे तलवार, भाला, बरछी आदि शस्त्र चलाने सिखलाए, साथ में कब, किस पर इन शस्त्रों का प्रयोग करना चाहिए। इस बारे में भी पूरे निर्देश दिए। वे लोग सुरक्षा के लिए सदा तत्पर रहते थे । उन्हें खेती करने की जरूरत नहीं थी। क्योंकि दूसरे लोग उनकी आवश्यकता की पृर्ति सहर्ष कर देते थे। इस वर्ग को सभी “क्षत्रिय’ कह कर पुकारते थे।
मसि-कर्म शिक्षा
ऋषभ कृषि कला, शिल्प कला की विभिन्न प्रक्रियाओं को सिखाकर अब विनिमय का माध्यम बनाने की सोचने लगे । उत्पादन की शिक्षा वे दे चुके थे, अब उत्पादित वस्तुएं एक दूसरे के पास कैसे पहुंचे इसी चिंतन में उन्होंने मसि-कर्म की शिक्षा का आविष्कार किया। मसि-कर्म अर्थात् लिखा-पढ़ी से वस्तु का विनिमय करना। प्रारंभ में मुद्रा नहीं थी, वस्तु से वस्तु का विनिमय होता था। उनका हिसाब रखना जरूरी था। कौन-सी वस्तु का विनिमय किस मात्रा में होना है, यह निर्धारित करना उनका काम था। लोग बेचारे भोले-भाले थे। इतना हिसाब रखना उनके लिए कठिन था। इस वर्ग ने इस कठिनाई को हल किया। लोगों ने सहर्ष इस कार्य के लिए पारिश्रमिक की व्यवस्था की । उत्पादक से उपभोक्ता तक पहुंचाने में कुछ प्रतिशत मुनाफा लेने की छूट दी । इस विनिमय प्रक्रिया को ‘व्यापार’ तथा इसे करने वाले वर्ग को ‘व्यापारी’ (वैश्य) कहकर पुकारने लगे ।
इसी प्रकार बहत्तर कलाओं की शिक्षा भगवान् ऋषभ ने दी। ये बहत्तर कलाएं इस प्रकार हैं:- (१) लेख (२) गणित (३) चित्र (४) नाट्य (५) गीत (६) वाद्य (७) स्वर-ज्ञान (८) पुष्कर-ज्ञान (६) समताल-ज्ञान (१०) द्यूत (११) जनवाद (१२) नगर-रक्षा (१३) अष्टापद (१४) पंकमृत्तिका (१५) अन्नविधि (१६) पानविधि (१७) वस्त्रविधि (१८) शयन-विधि (१६) आर्या (२०) प्रहेलिका (२१) मागधिका (२२) गाथा (२३) श्लोक (२४) गंधयुक्ति (२५) मधु सिक्थ (२६) आभरण विधि (२७) युवती प्रतिक्रम (२८) स्त्री-लक्षण (२६) पुरुष-लक्षण (३०) अश्व-लक्षण (३१) गज-लक्षण
(३२) वृषभ-लक्षण (३३) कर्कट-लक्षण (३४) मेंढ़ा-लक्षण (३५) चक्र-लक्षण (३६) छत्र-लक्षण (३७) दंड-लक्षण (३८) असि-लक्षण (३६) मणि-लक्षण (४०) कांगिनी-लक्षण (४१) चर्म-लक्षण (४२) सभा संचार (४३) व्यूह (४४) स्कन्धावार-मान (४५) नगरमान (४६) वस्तु परिमाण (४७) स्कन्ध निवेश (४८) वस्तु निवेश (४६) नगर निवेश (५०) इषु शास्त्र (५१) अश्व-शिक्षा (५२) गज-शिक्षा (५३) धनुर्वेद (५४) हिरण्यपाक (५५) स्वर्णपाक (५६) मणिपाक (५७) धातु पाक (५८) बाहु-युद्ध (५६) लता युद्ध (६०) मुष्टि-युद्ध (६१) युद्ध (६२) नियुद्ध (६३) युद्धातियुद्ध (६४) सूत्र खेड़न विधि (६५) खेल (६६) नालिका खेल (६७) चर्म खेल (६८) पत्रच्छेद (६१) कटच्छेद (७०) सजीव (७१) निर्जीव (७२) शकुनरुत ।
सेवा व्यवस्था
कृषि, असि, मसि कर्म की समुचित शिक्षा लोगों ने बाबा से सीखी, एक ऐसा वातावरण बना कि कोई व्यक्ति निष्क्रिय रहना नहीं चाहता था। उस वातावरण ने लोगों को अनुभव करवा दिया कि निकम्मा रहना समाज पर भार है। मानवीय संस्कृति में निष्क्रियता को स्थान नहीं है। श्रम से कोई छोटा नहीं होता, श्रम करना ही सामूहिक जीवन की सार्थकता है। जो लोग खेती आदि किसी कार्य में दक्ष नहीं बनै वे लोग सेवा और सफाई के कार्य में लग गए। इसमें ज्यादा दिमाग लगाना नहीं पड़ता था । काम किया, पारि-श्रमिक पाया । कोई झंझट नहीं। अधिक जिम्मेदारी भी नहीं थी, किन्तु कोई कैसा ही कार्य करने वाला हो, समाज में सब समान थे। ऊंच नीच की भावना तनिक भी नहीं थी।
ग्राम व्यवस्था
ऋषभ ने सामूहिक जीवन का सूत्रपात करते हुए सबसे पहले ग्राम व्यवस्था की रूपरेखा लोगों को समझाई। अब तक वृक्षों के नीचे रहा करते थे, ऋतुए अनुकूल रहा करती थी, न ज्यादा सर्दी थी न ज्यादा गर्मी थी। बरसात भी ज्यादा नहीं होती थी। अब ऋतुएं कभी अनुकूल तो कभी प्रतिकृत हुआ करेंगी। सर्दी-गर्मी की मात्रा भी बढ़ेगी। शारी रिक सहन-शक्ति क्रमशः घटती जाएगी अतः घर बनाकर रहना अधिक सुरक्षित होगा।
घर की उपयोगिता समझाने के साथ ही ऋषभ ने सामूहिक जीवन की उपयोगिता समझाई। समूह के साथ रहने वाला एक दूसरे का सहयोगी बन सकता है। हर विपत्ति का. सामना मिलकर ही सरलता से किया जा सकता है। गृहस्थ की सारी आवश्यकताएं अलग-अलग लोगों द्वारा पूरी होती थी। एक दूसरे के निकट रहने पर ही एक दूसरे के उत्पादन पूरः-पूर। लाभ मिल सकता है। बात लोगों के समझ में आ गई, बड़ी संख्या में युगल जंगलों को छोड़कर ग्रामों में बस गये। सर्व प्रथम जो बस्ती बनी उसका नाम विनीता रखा गया। ऋषभ ने अपना निवास स्थान वहीं बनाया। भारत की प्रथम राजधानी होने का गौरव भी उसे ही प्राप्त हुआ। उसे ही जागे चल कर अयोध्या के नाम से पुकारा जाने लग
दण्ड-विधि
तात्कालिक अभाव की परिस्थिति को समाप्त करने के बाद ऋषभ ने यौगलिकों में बढ़ती हुई अपराध-वृत्ति पर ध्यान दिया। चालू दण्ड-विधि असफल हो चुकी थी।
नयी डण्ड विधि इस प्रकार थी-
(१) परिभाषण, अपराधी को कठोर शब्दों से प्रताड़ित करना।
(२) मंडली-वध ,अपराधी की सीमा विशेष में रोके रखना ।
(३) चारक-बंध अपराधी को विशेष स्थान में रोके रखना कैद करना।
(४) छविच्छेद-,अपराधी के अंग विशेष का छेदन
करना।
उपरोक्त चारों दण्ड बड़े प्रभावक रहे। इनसे विश्वखंलित मनोवृत्ति सर्वथा नियंत्रित हो गई थी। लोग नई सामा जिक पद्धति में ढल चुके थे, सभी संतुष्ट थे। खाद्य वस्तुओं का अभाव मिट जाने के बाद सभी अनुशासित जीवन बिताने के आदी बन गये थे। ऋषभ के प्रति लोगों में गहरा विश्वास था। सारी व्यवस्था स्वतः संचालित होने लगी थी। नवीन परिस्थितियों में सभी प्रसन्न थे।
कार्य की अपेक्षा से अलग-अलग वर्ग बन चुके थे। उनका अलग-अलग कार्य था। भारतीय वर्णो में उपलब्ध चार वर्णो में से तीन वर्णों को उत्पत्ति वृषभ के समय में हो चुकी थी। सुरक्षा का दायित्व संभालने वाला वर्ग क्षत्रिय कहलाता था।
कृषि तथा मसि कर्म करने चारो लोग वैश्य कहलाते थे । उत्पादन तथा विनिमय की समुचित व्यवस्था उनके जिम्मे थी। लोगों के दैनिक जीवन की आवश्यकता की पूति इन्हीं को वर्गों से होती थी। इन दोनों वर्गों को ‘वैश्य’ शब्द से पुकारा जाता था।
कृषि और मसि कर्म के अतिरिक्त अन्य कार्य करने वाले लोग शूद्र कहलाते थे। इसके जिम्मे सेवा तथा सफाई का कार्य था। इन तीन वर्षों की स्थापना ऋषभ के समय हो चुकी थी।
ब्राह्वण वर्ग की उत्पत्ति सम्राट् भरत के शासन काल में हुई। सम्राट भरत ने धर्म के सतत् जागरण के लिए कुछ बुद्धि जीवी व्यत्तियों को चुना जो स्वयं ब्रह्मचारी बने तथा वक्तृत्व कला में निपुण थे। समय-समय पर राज्य सभा में तथा अन्य स्थानों में प्रवचन देना, लोगों को धार्मिक प्रेरणा देना उनका काम था। सम्राट् भरत ने उन्हें आजी विका की चिंता से मुक्त बना दिया था। उन्हें महलों से भोजन मिल जाया करता था। गांवों में लोग उन्हें अपने घरों पर भोजन करवा देते थे या भोजन सामग्री दे देते थे। ब्रह्मचर्य का पालन करने सेवा ब्रह्म (आत्मा) की चर्चा में लीन रहने के कारण
उन्हें ब्राह्मण कहा जाता था। इनकी संख्या सीमित थी और भरत द्वारा निर्धारित थी।
तीन रेखाएं (जनेऊ)
चालू व्यवस्था का कोई अनुचित लाभ न उठा ले, इस लिए भरत समुचित परीक्षण के बाद ब्राह्वाणों की छाती पर अपने कांगणी रत्न से तीन रेखाएं खींच देते थे। से रेखाएं उनकी पहचान थी। लोग इसे देखकर ही निमंत्रण आदि दिया करते थे। भरत के बाद जब आदित्यजश राजा बना तो हर ब्राह्मण को पहचानने के लिए विशेष प्रकार से बना स्वर्ण-सूत्र देना प्रारम्भ किया। आगे चलकर यही धागे को “जनेऊ बन गई थी। आरम्भ में ये लोग ब्रह्मचारी थे। साधु और गृहस्थ के बीच की भूमिका निभाते थे। बाद में शादी करने लगे।
इस प्रकार चारों वर्ग (वर्ण) की उत्पत्ति ऋषभ और सम्राट् भरत के समय में हो गई थी। किन्तु, हीनता और तुच्छता की भावना उस समय बिल्कुल नहीं थी। सभी अपने-अपने कार्य से संतुष्ट थे। वर्ण के नाम पर हीनोच्चभाव या स्पृश्यास्पृश्य आदि भाव नहीं थे। ये सब नाद के विकार है, जो मानव समाज पर थोपी गई कुत्सित अहंकार की भावनाएं हैं
विवाह
ऋषभ ने काम-भावना पर नियंत्रण रखने की दृष्टि से शादी की व्यवस्था प्रचलित की। शादी से पहले का जीवन सर्वथा निर्विकार बनाये रखना अनिवार्य घोषित किया। इसके अत्तिरिक्त बहिन के साथ शादी भी वर्जित कर दी गयी। भाई-बहिन का पवित्र सम्वन्ध जो हम आज देख रहे हैं यह भगवान् ऋषभ की ही देन है। पत्नी के अतिरिक अन्य सभी के साथ निर्विकार सम्बन्ध रखने के आदी हो गये।
अभिनिष्क्रमण
ऋषभ ने अपने जीवन के चौरासी हिस्सों में से तिरासी हिस्से सामाजिक और राजनैतिक मूल्यों की स्थापना में बिताए। तथा परस्पर सहयोग का महत्व लोगों ने आपसे ही समझा। तात्कालिक व्यावहारिक जीवन की कठिनाईयों का समाधान करने के बाद अब धर्म-नीति का प्रवर्तन करने की दिशा में ऋषभ में अपना निर्णय घोषित किया।
उन्होंने पूरे भूमंडल को सौ हिस्सों में विभक्त करके अपने सौ पुत्रों को उनकी सार-संभाल का भार सौंपा। सब प्रकार से पूर्णतः निवृत्त होकर वे वर्षीदान देने लेगे। वर्षीदान से देश-विदेश में लोगों को पता लग गया कि बाबा अब घर छोड़ कर जाने वाले हैं। भोले-भाले लोग इस बात से बड़े बेचैन हुये कि बाबा हमको छोड़कर जा रहे हैं, अब क्या करेंगे? हम लोगों की उलझनों को कौन सुलझायेगा ? यद्यपि भरत आदि सौ भाईयों को हमारी देखभाल का काम सौंपा है, किन्तु बाबा जैसी क्षमता उनमें कहां? अच्छा हो, हम लोग बाबा का अनुगमन करने वाले बन जाये, फिर कोई संकट नहीं है। हर समस्या का समाधान बाबा स्वयं करेंगे।
इसी धुन में निष्क्रमण की तिथि आषाढ़ कृष्णा अष्टमी के दिन एक दो नहीं पूरे, चार हजार व्यक्ति ऋषभ के पास
एकत्रित हो गए। ठीक समय पर ऋषभ ने अभिनिष्क्रमण किया। अभिनिष्क्रमण देखने के लिए दूर-दूर के लोग पहुंच गये थे। साधना के प्रति सभी को अज्ञात विस्मय हो रहा था। चौसठ इन्द्रो के साथ हजारों देवगण भी उत्सव में सम्मिलित हुये। शहर के बाहर एक उपवन में पहुंच कर भगवान ऋषभ ने जपने वस्त्राभूषण उतारकर इन्द्र को सौंप दिए।
अब ऋषभ ने केश-लुंचन प्रारम्भ किया। पहले आगे के केश उखाड़ें, फिर दायें-बांयें भाग का लुंचन किया व उसके बाद पीछे के केशों का लुंचन किया। अन्त में मध्य भाग में रहे केशों का लुंचन प्रारम्भ किया, तब इन्द्र ने प्रार्थना की-प्रभो ? इन्हें रहने. दीजिये, बहुत सुन्दर लगते हैं। इन्द्र की प्रार्थना पर भगवान् ऋषभ ने केशो को वैसे ही छोड़ दिया। भगवान् ऋषभ को अनु-करण अन्य लोगों ने भी करना प्रारम्भ कर दिया। संभवतः चोटी की परम्परा वहीं से चल पड़ी। कुछ आचार्य ऋषभ का पंच-मुष्टि लुंचन भी मानते हैं।
ऋषभ की दीक्षा के साथ ही चार हजार व्यक्ति दीक्षित हो गये थे, किन्तु ऋषभ की छद्मस्थ अवस्था के मौन से सब निराश हो गए थे। कुछ समय तक प्रतीक्षा भी की, किन्तु ऋषभ के सर्वथा न बोलने से उन साधुओं ने सोचा-जीवन भर ऐसे ही निराहार और मौन रहना पड़ेगा, वे घबरा उठे साधुत्व छोड़कर जंगल की ओर चल पड़े, कोई कंदाहारी बन गया, कोई मुलाहारी, कोई फलाहारी बनकर वनविहारी होगए ।
प्रथम दान
दीक्षा के साथ ही ऋषभ के पूर्वाजित अन्तराय कर्म का
विपाकोदय हो गया। लोग भिक्षाकी विधि से अपरिचित थे पर श्रद्धा रखते हुए भी आहारपानी के लिये कि नहीं कहा। किसी ने हाथी ,किसी ने घोड़ा, किसी के रथ के लिए आग्रह किया। प्रभु को नंगे पैर देख कर किसी ने रत्न जड़ित जूते लाकर पहनाने का आग्रह किया। किसी ने नंगे सिर देख कर मुकुट धारण करने का आग्रह क्रिया। पर खाद्य-पदार्थों के लिए किसी ने नहीं कहा।
शुद्ध आहार के अभाव में ऋषभ को बिना खाये-पिये बारह साल बीत गये। भिक्षा के समय के भिक्षा की गवेषणा करते, शेष समय में ध्यानस्थ बने रहते। विचरते-विचरते. वे हस्तिनापुर पधारे वैशाख शुक्ला तृतीया का दिन था। प्रभु भिक्षा के लिए घर-घर गवेषणा कर रहे थे। ऋषभ के प्रपोत्र श्रेयांस कुमार को पिछली रात्रि में एक स्वप्न दिखायी दिया कि शयामल बने हुए मेरु गिरि को मेरे द्वारा दूध से सींचने पर बह पुनः क्रांतिमान बन गया है। प्रातः काल अपने महल के गवाक्ष में बैठा हुआ श्रेयांसकुमार रात्रि में आये अपने स्वपन पर विचार कर रहा था। अकस्मात राजपथ पर घूमते हुए अपने दादा भगवान ऋषभ उन्हें नजर आये। जातिस्मरण ज्ञान के कारण श्रेंयासकुमार ने जाना की प्रभू प्रासुक(शुद्ध) (निर्दोष) आहार की गवेपणा कर रहे हैं और लोग उनकी भिक्षि-विधि से अनजान हैं’ वे उनसे अगाह्य वस्तुओं को ग्रहण करने का आग्रह रहे हैं।
तत्काल श्रेयांसकुमार नीचे उत्तर।। ऋषभ के चरणों में उन्होंने विधिवत् वन्दना कर आहार के लिए प्रार्थना की।
भगवान् ने राजमहल में प्रवेश किया। श्रेयांस कुमार तत्काल भीतर गये और देखा, क्या चीज शुद्ध है? उन्हें सिर्फ इक्षुरस ही शुद्ध मिला। इक्षु-रस के मौसम का अन्तिम दिन होने के कारण किसान लोग इक्षु-रस को घड़े भेंट में लाये थे,
श्रेयांस कुमार ने निवेदन किया, “भंते। इक्षु के १०८ घड़े प्रासूक है. आप ग्रहण करे।” ऋषभ ने वहां स्थिर होकर दोनों हथेलियों की सटाकर मुख से लगा लिया। राज कुमार श्रेयांस ने उल्लास भावना से इसका दान दिया। इस प्रकार इक्षु-रस से भगवान् का पारणा हुजा । देवों में पंच द्रव्य प्रकट किये। ‘अहोदानं की ध्वनि से आकाश गूंज उठा । दान की महिमा व विधि से लोग परिचित हुए। प्रथम भिक्षुक ऋषभ, और प्रथम दाता श्रेयांसकुमार कहलायें। ऋषभ के एक संवत्तसर की तपस्या के बाद दान-धर्म की स्थापना हुई। इसके बाद ही लोग धीरे-धीरे दान-धर्म के आदी बने। इक्षु-दस के दान से वैशाख शुक्ला तृतीया का दिन ‘अक्षय’ हो गया। इसे आखातीज या अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाने लगा। ऋषभ के वर्षीतप के पारणे का इतिहास इसके साथ जुड़ जाने से यह वर्ष का स्तंभ-दिन माना जाने लगा। आगे चलकर और घटनाएं भी इसके साथ जुड़ती गई। आज भी अक्षय-तृतीया का दिन अनेक घटनाओं, परम्पराओं का संगम-स्थल बना हुआ है।
विद्याधरों की उत्पत्ति
ऋषभ के सौ पुत्रों के अतिरिक्त दो कुंवर और ऐसे थे, जिनकी उन्होंने पुत्र
की तरह ही वात्सल्य दिया। वे महलों में
ही रहते थे। पता नहीं उनके माता-पिता जीवित थे या उनके जन्मते ही मर गये थे। वे ऋषभ के यहां ही बड़े हुए थे। उनके नाम के नमि और विनमि। दोनों भाई भगवान् द्वारा सुझाये गये प्रत्येक अभियान को जनता तक पहुंचाने में बड़े सिद्धहस्त थे। संयोगवश दोनों ही किसी कार्य को लेकर सुदूर प्रदेशों में गये हुए थे। पीछे से ऋषभ ने अभिनिष्क्रमण कर प्रवज्या ग्रहण कर ली थी।
जब वे दोनों वापिस आये तो पता चला कि बाबा सब कुछ छोड़कर जा चुके है। भरत आदि से उन्होंने पूछा- हमारे लिए बाबा ने क्या कहा है? कौन-सा प्रदेश दिया है? भरत नै कहा बाबा ने तो कुछ नहीं दिया, अब मै देता है, ताकि तुम्हारी व्यवस्था ठीक से चल सके। दोनों ने तमककर कहा-तुम देने वाले कौन हो? लेंगे तो बाबा से ही लेंगे, तुम्हारे से नहीं। भरत ने कहा-बाबा ने तो बोलना ही बन्द कर दिया है. देंगे क्या? दोनों ने कहा- देखो, हम जाते हैं, कभी न कभी तो मौन खोलेंगे हो, कुछ न कुछ तो लेकर ही लौटेंगे।
दोनों भाई बाबा के पास आये और मीठे उपालम्भों के साथ कुछ न कुछ देने की मांग की। प्रभु मौन थे। वे भी साथ में रहने लगे और सुबह-शाम मध्याह्न में जोर-जोर से बोलकर अपनी मांग को दुहराने लगे ।
कई दिनों के बाद सुरपति इन्द्र भगवान के दर्शनार्थ आये। इन दोनों भाइयों की हठपूर्वक मांग उन्होंने सुनी। सोचने लगे प्रभु निवृत्त हो चुके हैं, वे दोनों कुछ पाने की आशा से पीछे-पीछे फिर रहे हैं। इन्द्र ने समझाते हुए कहा-भाई। बाबा संयमी बन चुके हैं, अब कुछ नहीं देंगे। इस पर दोनों गिड़गिड़ाए हम तो बे-घरबार ही रह गये। इन्द्र ने
कहा-तो, तुम्हें ऐसा राज्य देता है, जो बिना दिया हुआ है। वैताढय गिरि पर्वत पर जाओ। दोनों भाई वहां दक्षिण और उत्तर दोनों ओर नगर बसाओ। दोनों ने निवेदन किया इतनी ऊंचाई पर चढ़ पाना असम्भव है। चढ़ भी जायेंगे तो नगर कैसे बसेगा ? जनता क्यों आयेगी वहां ? इन्द्र ने कहा- चिन्ता क्यों करते हो? लो, मैं तुम्हें अड़तालीस हजार विद्याएं देता है, जिनसे तुम पक्षी की भांति आकाश में उड़ सकते हो, मछली की भांति पानी में तैर सकते हो। इसके अतिरिक्त दिन में रात और रात में दिन बना सकते हो। नागरिक जीवन की सारी भौतिक उपलब्धियां इन विद्याओं से तुम प्राप्त कर लोगे ।
दोनों भाई उन विद्याओं को सिद्ध कर वैताढ्य पर्वत पर गये, उन्होंने दक्षिण की ओर साठ नगर और उत्तर की ओर पचास नगर बसाये । विद्या-बल और इन्द्र के सहयोग से सामान्य जीवन की सभी सुविधाएं वहां उपलब्ध कर दी गई। अत्यधिक सुविधाएं देखकर अनेक लोग वहां बसने को आतुर हो उठे। कुछ ही समय में काफी लोग वहां आ बसे और सुविधा के साथ रहने लगे। उनकी संतान हो आगे चलकर विद्याधर कहलाई ।
सर्वज्ञता
एक हजार बर्ष तक ऋषि ऋषभ ने छद्यस्थ अवस्था में साधना की। अनुकूल-प्रतिकूल परीषहों को सहन करते हुए वे दूर-दूर तक आर्य जनपदों में विचरते रहे। विचरते-विचरते वे पुरिमतालपुर पधारे। वहां उद्यान में वट-वृक्ष के नीचे तेले (तीन दिन का तप) की तपस्या में फाल्गुन कृष्णा एकादशी के प्रातःकाल में प्रभु सर्वेश बन गये। इस अवसर्पिणी में भगवान् ऋषभ ही प्रथम सर्वेश बने थे। भगवान् के केवल-ज्ञान-प्राप्ति महोत्सव पर चौसठ इन्द्र एकत्रित हुए। देवताओं ने देव-दुंदुभि की। लोगों को ज्ञात हुआ कि अब भगवान् मौन त्याग जीवन की आन्तरिक समस्याओं का समाधान देंगे। लोग बहुत प्रसन्न हुए। सर्वत्र एक ही बात होने लगी-अब बाबा बोलेंगे, लोगों की दुविधाओं को मिटायेंगे । वे पिछले एक हजार वर्षो से मौन थे, अब पुनः बोलने वाले हैं। उद्घोषणा सुनकर लोग दूर-दूर से चलकर भगवान् के चरणों में उपस्थित हो गए। देवों ने समवशरण की रचना की। लोगों से पहली बार भगवान् से अध्यात्म के बारे में सुना। वे धार्मिक उपासना की विधि से परिचित हुए। अनेक व्यक्तियों ने अपने आपको धर्म की उपासना में समर्पित किया।
भरत का धर्म-विवेक
उस समय सम्राट भरत को एक साथ तीन बधाईयां प्राप्त हुई थी। आयुधशाला मे अनायास ही चक्र-रत्न पैदा होने का उन्हें संवाद मिला था। दूसरी बधाई पुत्र-रल के उत्पन्न होने की थी तथा तीसरी बधाई भगवान् ऋषभ को कैवल्य-ज्ञान प्राप्ति की मिली थी। ये तीनों बधाईयां साथ में प्राप्त हुई थी। सम्राट सोचने लगे मैं पहले किसका महोत्सव करू’ । क्षण-भर में वे इस निर्णय पर पहुंचे कि पिताजी ने जिस लक्ष्य को लेकर अभिनिष्क्रमण किया था, मौन व्रत स्वीकार किया था, वह उन्हें प्राप्त हो चुका है, अतः. मुझे पहले पिताजी की सफलता की अभ्यर्थना करनी चहिए। इसी में मेरा विनय है। भरत ने तत्काल घोषणा की पहले कैवल्य-महोत्सव होगा चक्र-रत्न और पुत्र-रत्न के महोत्सव बाद में होंगे।
इस घोषणा के साथ ही सम्राट भरत राजकीय सवारी में भगवान् के कैवल्य-महोत्सव में सम्मिलित होने के लिए चल पड़े। उनकी राजकीय सवारी में भरत की दादी मरुदेवा माता भी थी। पुरिमतालपुर अयोध्या का ही समीपवती नगर था।
मरूदेवा सिद्धा
ऋषभ अब बोलेंगे, लोगों से मिलेंगे, शिक्षा देंगे, ऐसा जब से मरुदेवा नै सुना, तभी से वे पुलकित हो रही थी। ऋषभ से मिलूंगी, सुख-दुःख की बात पुछुंगी, इसी उमंग में उतावली होकर हाथी की सवारी से चल पड़ी। उपवन के निकट पहुंचते ही उन्हें भगवान् ऋषभदेव दृष्टिगत हुए। समवशरण में देव तथा मनुष्यों की बड़ी भीड़ से घिरे हुए ऋषभः को देखकर मरुदेवा विस्मितता से सोचने लगी ओह । ऋषभ के पास तो भीड़ लग रही है। मैं तो सोच रही थी कि ऋषभ अकेला है, उसे भोजन-पानी कैसे मिलता होगा ? उसकी देख-भाल कौन करता होगा? मै व्यर्थ ही चिंतातुर थी, यहां तो आनन्द ही आनन्द है। ऋषभ दुःखी नहीं, अत्यन्त सुखी है। देखो, ऋषभ सब कुछ छोड़कर सुखी हो गया है। लगता है, सुख इन सब को छोड़ने में है। इसी ऊहापोह (विस्मययुक्त चितन) में उनका चितन त्याग की तरफ हो गया। धर्म-ध्यान में बढ़ती हुई मरुदेवा माता ने भावों में चारित्र लिया और तुरन्त क्षपक-श्रेणी पर जा पहुंची। हाथी पर बैठी बैठी ही वे तेरहवें गुणस्थान को प्राप्त कर सर्वज्ञा बन गयी। आयुष्य अत्यधिक कम होने से हाथों से नीचे उतरने का अवकाश भी उन्हें नहीं मिला। वहीं पर योग निरोध होकर शैलेषी बन गई, और चौदहवें गुणस्थान में शेष रहे अघाती कर्मों को भी क्षय करके उन्होंने सिद्धत्व प्राप्त कर लिया।
भरत भगवान् के निकट पहुंचकर वंदना करने लगे। भगवान् ने सभी फरमाया मरूदेवा सिद्धा भरत ने तत्काल मुडकर देखा तो परम श्रद्धेया दादीजी का शरीर भद्रा सन के सहारे लुढ़का हुआ पड़ा है। भरत को बहुत आश्चर्य हुआ। भगवान् ने कहा इस अवसर्पिणी में सर्वप्रथम मोक्ष जानेवाली मरूदेवा माता ही है।
तीर्थ स्थापना
भगवान के प्रथम प्रवचन में ही साधु-साध्वी, श्रावक श्राविकाएं बन गई थी। विश्व तीर्थ की स्थापना के बाद भगवान तीर्थंकर कहलाए। क्रमशः काफी लोग यथाशक्ति साधना में सक्रिय बने। भगवान् के पांच महाव्रत रूप अणगार धर्म के भी काफी साधक बन गए थे। भगवान् ऋषभ के साधुओं का शरीर शक्तिशाली था। किन्तु बौद्धिक विकास न्यूनतम था। कोई भी बात समझाने में पूरा परिश्रम करना पड़ता था किन्तु, समझने के बाद पालन करने में बड़े सुदृढ़ थे, उस समय आचरण क्षमता पूरी थी। तभी उस समय के युग को ऋजु (सरल) जड़ कहा जाताहै
तीर्थकरों के बारह गुण
सर्वज्ञता के साथ जब तीर्थङ्कर नाम कर्म नामक पुण्य प्रकृति का उदय होता है, तब सर्वज्ञ तीर्थङ्कर कहलाते हैं।
(१. दिगम्बर ग्रंथो में प्रथम सिद्ध अनन्तवीर्य को माना गया है। वे प्रभु की प्रथम देशना में दीक्षित हुए थे।)
सर्वज्ञ एक समय में, एक क्षेत्र में अनेक हो सकते है, किन्तु तीर्थकर एक ही होते हैं। समग्र विश्व में एक सौ सत्तर क्षेत्र माने गए हैं। अतः एक साथ ज्यादा से ज्यादा एक सौ सत्तर तीर्थकंर हो सकते हैं, किन्तु सर्वज्ञों की संख्या तो उत्कृष्ठतः नौ करोड़ मानी गई है। तीर्थंकरों बारह विशेष गुणों में चार क्षायक-भाव है, और आठ उदयजन्य हैं। बारह गुणों के नाम इस प्रकार हैं-१. अनन्त ज्ञान, २ अनंत दर्शन, ३. अनंत चारित्र, ४. अनंत बल, ५. अशोक वृक्ष, ६ पुष्प-वृष्टि, ७. दिव्य-ध्वनि ८. देव-दुंदुभि स्फटिक सिंहा-सन, १०. आभा-मण्डल ११. छत्र १२. चामर
इसी प्रकार चौंतीस अतिशय (विशेषताएं), पैंतीस वचनातिशय (वाणी की विशेषताएं तीर्थकरों में सहज प्राप्त होती हैं। )दूसरे सर्वज्ञों में इनका होना आवश्यक नहीं है। ये विशेषताएं उनमें मिलती भी नहीं है। किसी में दो, किसी में चार विशेषताएं मिल जाएं तो लोगों में उसका भी आश्चर्य-जनक प्रभाव रहता है। तीर्थंकर तो पूर्ण अतिशयों के धारक होते है।
प्रभु का परिवार
भगवान् ने जब दोक्षा ली तब चार हजार शिष्य उनके साथ थे, किन्तु प्रभु की छद्मस्थ अवस्था की मौन साधना की अजानकारी से सब छिन्न-भिन्न हो गए थे। केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद उनका धार्मिक परिवार पुनः बढ़ने लगा। उनके परिवार में चौरासी हजार श्रमणों का होना अद्भुत धर्म क्रांति का ही परिणाम था। उनकी व्यवस्था के लिए भगवान् ने चौरासी गण बनाए उनके मुखिया को गणधर- कहा जाने लगा भगवान के प्रथम गणधर- ऋषभ सेन थे
इसके अतिरिक्त तीन लाख साध्वियां भी थी, जो पवित्रिणी साध्वी ब्राह्मी की देखरेख में साधना-रत थी। तीन लाख पांच हजार श्रावक तथा पांच लाख चोपन हजार श्राविका भगवान के संघ की सदस्या थी।
साधना की उपलब्धि के आधार पर उस समय के श्रमणो के सात विभाग किए जा सकते हैं। उन सबकी संख्या क्रमशः इस प्रकार थी
(१) केवल ज्ञानी -बीस हजार
(३) अवधि ज्ञानी-नो हजार
२) मनःपर्य वज्ञानी-ज्ञानी -बारह हजार छह सौ पचास ।
(४) वैक्रिय लब्धिधारी -बीस हजार छह सौ ।
(५) चतुर्दश पूर्वी चार हजार सात सौ पच्चासः। (६) चर्चावादी- – बारह हजार छह सौ पचास ।
(७) सामान्य साधु-चौरासी हजार।
सर्वज्ञता के बाद भगवान का जनपद विहार काफी लंबा हुआ था। कहां अयोध्या? कहां बहली? कहां यूनान और कहा स्वर्ण भूमि ? अनार्य मानी जाने वाली भूमि का भी काफी हिस्सा के चरणों से स्पृष्ट हुआ था। लाखों सरल आत्मज्ञ व्यक्ति भगवान् की शरण में आकर कल्याण के पथ पर अग्रसर बने थे।
भगवान अपने जीवन का अवसान निकट समझकर हजारों साधुओं के साथ अष्टापद पर्वत पर बढ़े। अवसर्पिणीके तीसरे आरे के तीन वर्ष साढ़े आठ मास जब शेष रहे, तब छह दिनों के अनशन (निराहार) तप में अयोगी अवस्था पाकर, शेष अघाती कर्मों का क्षय करके के परिनिर्वाण को प्राप्त हुए। भगवान् ऋषभ ने पर्य- कासन में सिद्धत्व को प्राप्त किया था। भगवान् के निर्वार्ण का दिन माघ कृष्णा त्रयोदशी का था। भगवान् का समय आयुष्य ८४ साल पूर्व का था।
वैदिक साहित्य में भी आदिदेव के शिवलिंग के रूप में उद्भूत होने का दिन माघ कृष्णा चतुदर्शी का माना है। आदिदेव और आदिनाथ में तथा शिवलिंग तथा शिव (मुक्ति) में शाब्दिक साम्य है, यह सहज ही समझा जा सकता है। त्रयोदशी और चतुदर्शी के सामीप्य से भी इतिहासकारों का अभिमत प्रायः यही है कि आदिदेव शिव और आदिनाथ भग-वान ऋषभ सम्भवतः एक ही थे। कालान्तर में उपासना वैविध्य के कारण उन्हें पृथक-पृथक माना जाने लगा है।
भगवान् की पंच कल्याणक तिथियां:-
१. च्यवन-आषाढ़ कृष्णा ४
२. जन्म चैत्र कृष्णा ८
२.३ दोक्षा चैत्र कृष्णा ८
४. ज्ञान प्राप्ति-फाल्गुन कृष्णा ११
५. निर्वाण माघ कृष्णा १३
६कैवल्य वृक्ष -बरगद का पेड़ Banyan tree
७प्रतीक-वृषभ Bull
