भिक्षु शिवपुर ताला खोल्या —–
भिक्षु शिवपुर ताला खोल्या, अब क्यूं जग
जंगल में भटके
तुलसी ज्ञान गेडियो लेकर हरदम उजड जावता डटके
1.है संसार दुरंगी जंगी अंगी पग पगअटके सतसंगी बिन कहे कुण चंगी राह दिखावे चटके।॥हां जी कोई राह दिखाई चटके, भिक्षु —
2.सिंह सरीखा सतगुरु बण जग ठग बाजी में पटके भोला बर बंदर सुमत्यां रे लारे लारे लटके ॥भिक्षु शिवपुर —
(3) धर्म धर्म कर मर रहया मानव आपस में कट कटके
पुण्य पाप में गेहूँ काकंरा अलग अलग कुण फटके ॥हाजी कोई अलग अलग कुण —
भिक्षु शिवपुर—
(4) कर उपकार अपार पधारया शिवपुर काय पलटके, जय जय भिखण नाम सहाने होत समय संकटके, ॥ हाजी कोई
भिक्षु शिवपुर
5शुध सुरधान च्यानणो सुन्दर कियो अन्दर घट घटके, राजपंथ अरिहंत आण में झांक लियो भवि भटके ॥ हाजी कोई
भिक्षु शिव
6.देख दशा दुनियों कि भिक्षु होय खडौ बेखटके, मुक्ति नगर दरवाजे उभो निज हिम्मतपर डटके
भिक्षु शिवपुर—-
आज उसी गादी कौटी को श्री तुलसी लिलवट के