Samta Ra Sagar Sant Sukhi Sansar Me

समता रा सागर संत सुखी संसार मे
 निज आत्म  उजागर संत सुखी संसार मे
है सतोष शान्ति रो साधन वीतराग री वाणी
 म़मता मार पछार च्यार रिपू खोली सुखरी खाणी
काचर बीज कर्म रो कर्ता, ओ मन सदा सतावै
 संत सांकड़े भीड़ टीड री मौत मुट्ठी में आवै रे
सात-२ पीढया रो सांसो घर गृहस्थ रे देखो 
कल री चिन्ता करै न मुनिजन ओ सुखदुख रो लेखोरे
 जमी विना जोखिम री शय्या करतल करे सिरहानों 
बनिता विरति प्रसंग रंग में पोढे मुनि महारानो रे
 मन में समता तन म समता समता रस मे झूले 
शान्त सुधारस पी पीकर दूनिया री दुविधा भूलेरे 
निन्दा और प्रशंसा मे सम समता जीवन मरणै,
मान और अपमान मान सम निशदिन समता सरणे रे
रम्यो रवै समता में तुलसी स्वर्गादिप  सुख माणे
साधु वेश धर विषय विलासी नरक यातना ताणे रे

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