यह सरस गीत संग्रह का एक भजन है — पारंपरिक भक्ति की धरोहर। A devotional song from the Saras Geet collection.
समता रा सागर संत सुखी संसार मे
निज आत्म उजागर संत सुखी संसार मे
है सतोष शान्ति रो साधन वीतराग री वाणी
म़मता मार पछार च्यार रिपू खोली सुखरी खाणी
काचर बीज कर्म रो कर्ता, ओ मन सदा सतावै
संत सांकड़े भीड़ टीड री मौत मुट्ठी में आवै रे
सात-२ पीढया रो सांसो घर गृहस्थ रे देखो
कल री चिन्ता करै न मुनिजन ओ सुखदुख रो लेखोरे
जमी विना जोखिम री शय्या करतल करे सिरहानों
बनिता विरति प्रसंग रंग में पोढे मुनि महारानो रे
मन में समता तन म समता समता रस मे झूले
शान्त सुधारस पी पीकर दूनिया री दुविधा भूलेरे
निन्दा और प्रशंसा मे सम समता जीवन मरणै,
मान और अपमान मान सम निशदिन समता सरणे रे
रम्यो रवै समता में तुलसी स्वर्गादिप सुख माणे
साधु वेश धर विषय विलासी नरक यातना ताणे रे