Aaukhe Ri Ghadiya Thari Ghatati Hi Jave Re

(तर्ज : तेजा रे..)..
रचयिता : मुनि राकेश कुमार
आऊखे री घड़ियां थांरी घटती ही ज्यावै हो, 
करले कमाई धर्म ध्यान री 
समय जो बीत ज्यावै पाछो नहीं आवै हो, ज्योति जगाले अंतर ज्ञान री।
सांस रे धागां स्यूं बण्यो जिन्दगी रो हार हो,
 टूटण में लागै नहीं देर हो 
मन मोहक तसवीर थांरै तन री हो, बणसी आखिर माटी रो ढ़ेर हो ।। १ ।।
आर्त्त रौद्र ध्यान रो मिटाले अंधारो हो, चाँद उगाले समता भाव रो । 
करयोड़ा करमां रो फल भोगणो ही पड़सी हो, करलै उजालो मंगल भाव रो ।। 
२ ।।एकलो ही आयो है तूं एकलो ही जासी हो, साथ न जासी एक तार हो । 
मोह री मदिरा नै पी बण्यो है क्यूं बावलो, पापां रो बांधे सिर क्यूं भार हो ।। 
३ ।।आतमा री चादर नै ऊजली बणाले हो, संयम री साबण लेकर हाथ में। 
घूंओ राग-द्वेष रो उड़े है च्यारुं ओर हो, रहजै सावधान दिन रात में ।। ४ ।।
धर्म रे मारग में बढ़तो ही रहजे हो, मन में तू रखजे निर्मल भावना 
।”मुनि राकेश” बेड्यां टूट्यां कर्मां री हो, होसी सफल थांरी कामना ।। ५ ।

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