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संभव प्रभु स्तवन
संभव साहिब समरियै।(लय : हूँ बलिहारी हो जादवां)
1. संभव साहिब समरिये, घ्यायो है जिन निर्मल ध्यान के। एक पुद्गल दृष्टि थाप नै, कीधो है मन मेरू समान के॥
2. तन-चंचलता मेट नै, हुआ है जग थी उदासीन के।
धर्म शुकल थिर-चित्त धरै, उपशम-रस में होय रह्या लीन के।।॥
3. सुख इन्द्रादिक नां सहु, जाण्या है प्रभु अनित्य असार के। भोग भयंकर कटुक-फल, देख्या है दुर्गति दातार के।॥
4. सुधा संवेग-रसे भर्या, पेख्या है पुद्गल मोह पास कै। अरुचि अनादर आण नैं, आतम ध्यानें करता विलास कै ।।
5. संग छांड मन वशं करी, इन्द्रिय-दमन करी दुर्दन्त कै। विविध तपे करी स्वामजी, घाति-करम नौं कीधो अंत कै॥
6. हूँ तुझ शरणे आवियो, कर्म-विदारण तूं प्रभु! वीर के। तें तन मन वच बस किया, दुःकर करणि करण महाधीर के॥
7. संवत उगणीसै भाद्रवै, सुदि इग्यारस आण विनोद के। संभव साहिब समरिया, पाम्यो है मन अधिक प्रमोद कै॥
लय : हूँ बलिहारी हो जादवां