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अभिनन्दन प्रभु स्तवन
अभिनंदण वांदू नित्य मनरली।(लय : सती कलूजी हो थाया संजम नै त्यार)
1. तीर्थकर हो चोथा जग छांड गृहवास करी मति निरमली। विषय-विटंबण हो तजिया विष फल जाण ॥
2. दुःकर करणी हो कीधी आप दयाल, ध्यान सुधारस सम दम मन गली। संग त्याग्यो हो जाणी माया-जाल ॥
नके।
3. वीर रसे करी हो कीधी तपस्या विशाल, अनित्य अशरण-भावन अशुभ निरदली। जग झूठो हो जाण्यो आप कृपाल ॥
4. आतम मिंत्री हो सुखदाता सम परिणाम, एहिज अमित्र अशुभ भावे कलकली। एहवी भावन हो भाई जिन गुण-धाम ॥
5. लीन संवेगे हो ध्यायो शुकल ध्यान, क्षायक-श्रेणि चढी हुवा केवली। प्रभु पाम्या हो निरावरण सुज्ञान ॥
6. उपशम-रस नीं हो बागरी प्रभु बाण, तन मन प्रेम पाया जन सांभली। तुम वच धारी हो पाम्या परम कल्याण ॥
7. जिन अभिनंदण हो गाया तन मन प्यार,
संवत उगणीसै भाद्रवै अघ दली। सुदि इग्यारस हो हुवो हर्ष अपार॥
लय : सती कलूजी हो थाया संजम नै त्यार
चौबीसी