(लय-आपण भागां री)
तपस्या री महिमा देखो अपरंपार
करम निरजरा साथ में हुवै, आधि-व्याधि उपचार। लौ लागे अध्यात्म मेरी झट, सिद्धि हुवै साकार। तपस्या री महिमा……॥ स्थायी ॥
बाजीगर ज्यूं मिनख नै अँ, करम नचावै नाच, एकमेक सा हो रया से, पत्थर-हीरा-काच।
तपस्या री महिमा…….||1||
मन मुट्ठी में जो करै, बो ही मानव मतिमान, च्यार चांद तप स्यूं लगै, जागै अंतर भगवान।
तपस्या री महिमा….||
तप रो तेजस प्रगटज्या तो, होवै काम कमाल,
श्रावक ज्यू सेवा सझे नित, देव-भूत-बेताल, तपस्या री महिमा.. 113 11
अनहद आतम बळ बढै, विपदा रो चलै न जोर, दहन द्वारका रो रुक्यो, चाल्यो जद तक तप दोर।
तपस्या री महिमा……।।4 ||
तप रै सागै ध्यान जप स्यूं, ‘मधुकर’ बढ़े प्रभाव, तन्मय बण अजमाय ल्यो झट, पार उतरसी नाव ।
तपस्या री महिमा……. 15 ||