Jain Mantra

Jain Mantra

Ghantakarn Mantra. &Chinta Mani Parshvnath Stotram

घंटाकर्ण मंत्र १. ॐ घंटाकणों महावीरः सर्वव्याधि-विनाशकः । विस्फोटकभयं प्राप्ते, रक्ष रक्ष महाबलः ॥ २. यत्र तवं तिष्ठसे देव! लिखितोऽक्षर-पंक्तिभिः । रोगास्तत्र प्रणश्यन्ति, वातपित्तकफोद्भवाः ॥ ३. तत्र राजभयं नास्ति, यान्ति कर्णेजपाः क्षयम् । शाकिनी-भूतवेताला, राक्षसाः प्रभवन्ति नो ॥ ४. नाकाले मरणं तस्य, न च सर्पेण दश्यते । अग्निचौरभयं नास्ति, नास्ति तस्याप्यरिभवम् ॥ ॐ ह्रीं श्रीं […]

Jain Mantra

UpsargHar Stotra (Laghu)

उपसर्गहर स्तोत्र (लघु) (आचार्य भद्रबाहु स्वामी द्वारा विरचित) १. उवसग्गहरं पासं, पासं वंदामि कम्मघणमुक्कं । विसहर-विसनिन्नासं, मंगल कल्लाण आवासं ॥  शासन पर होने वाले उपसर्गों को दूर करने वाला पाश्वं देवता जिनके चरणों में सेवक है, कर्म-रूप सघन बादलों से जो मुक्त है, महाविषधर भुजंग का विष जिनके नाम से दूर होता है, मंगल और

Jain Mantra

Kalyan Mandir Stotra (संस्कृत हिन्दी कविता रुप अर्थके साथ/

कल्याण-मन्दिर की साधनाः आचार्य सिद्धसेन दिवाकर रचित यह काव्य बहुत ही चमत्कारिक है। इसका स्मरण पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके सूर्यास्त होने के समय से लेकर रात्रि के दस बजे तक करें। लम्बे समय तक निरन्तर जाप करने वालों को उपवास सहित भगवान पार्श्वनाथ के जन्म दिवस पौष कृष्णा १० से प्रारंभ करना

Jain Mantra

Shree Vajra Panjar Stotra

श्री वज्रपंजर स्तोत्र १. परमेष्ठि-नमस्कार, सारं नवपदात्मकम् । आत्मरक्षाकरं वज्रपंजराभं स्मराम्यहम् ॥ २ ॐ नमो अरिहंताणं, शिरस्कं शिरसि स्थितम् । ॐ नमो सव्वसिद्धाणं, मुखे मुखपटं वरम् ॥ . ३ॐ नमो आयरियाणं, अंगरक्षाऽतिशायिनी ।  ॐ नमो उवज्झायाणं, आयुधं हस्तयोर्दृढम् ॥ ४.ॐ नमो लोए सव्वसाहूणं, मोचके पादयोः शुभे ।  एसो पंच णमुक्कारो, शिला वज्रमयी तले ॥ ।५.

Jain Mantra

Shree Brihad Shanti Stotra

श्री बृहत् शान्ति स्तोत्र (संक्षिप्त) ॐ पुण्याहं पुण्याहं प्रीयन्तां प्रीयन्तां  भगवन्तोऽर्हन्तः सर्वज्ञाः  सर्वदर्शिनः त्रिलोकनाथाः,  त्रिलोक-महिताः त्रिलोकपूज्याः त्रिलोकेश्वराः त्रिलोकोद् द्योतकरा। ॐ ऋषभ-अजित-संभव-अभिनन्दन सुमति-पद्मप्रभ-सुपार्श्व-चन्द्रप्रभ-सुविधि-शीन-श्रेयांस-वासुपूज्य-विमल-अनन्त-धर्म-शांतिकुन्धु-अर-मल्लि-मुनिसुव्रत-नमि-नेमि-पाश्र्व वरधमानान्ता जिनाः शान्ताः शान्तिकरा भवन्तु स्हावा। ॐ मुनयो मुनिप्रवरा रिपुविजय दुर्भिक्ष -कान्तारेषु दुर्गमार्गेषु रक्षन्तु वो नित्यं स्वाहा ॐ ह्रीं श्रीं धृति-मति-कीर्ति-कान्ति-बुद्धि-लक्ष्मी-मेघा-विद्यासाधन-प्रवेशन-निवेशनेषु सुगृहीत-नामानो जयन्तु ते जिनेन्द्राः। ॐ रोहिणी-प्रज्ञप्ति-वज्रशृंखल-वज्रांकुशी-अप्रतिचक्रा-पुरुषदत्ता-काली महाकाली-गौरी-  गांधारी – सर्वास्त्रमहाज्वाला मानवी वैरोट्या-अच्छुप्ता

Jain Mantra

Mangal Bhawna,Aanand Bhawna

आनन्द भावना मंगल भावना १. श्री-संपत्रोऽहं स्याम्  मैंआभा सम्पन्न बनू २. ही संपन्नोऽहं. स्याम ‌ मै लज्जा सम्पन्न बनु ३. धी संपन्नोऽहं स्याम्  मैं बुद्धि सम्पन्न बनु ४. ध्रूति-संपन्नोऽहं स्याम  मै धैर्य सम्पन्न बनु  ५ शक्ति संपन्नोऽहं स्याम्  मै शक्ति संपन्न बनु ६. शांति-संपन्नोऽहं  स्याम्।  मैशांति-सम्पन्न बनु ७. नन्दि-संपन्नोऽहं  स्याम।    मैआनन्द-सम्पन्न बनु ८तेज संपन्नोऽहं

Jain Mantra

Poushadh Lene Parne Ki Vidhi

पौषध परिभाषा  धर्म को पुष्ट करने वाले व्रत-विशेष का नाम पौषध है। एक दिन एक रात के लिए चारों प्रकार के (अशन, पानी, मेवा तथा तांबूल) आहार का त्याग करना अथवा पानी के सिवाय तीन आहार का त्याग करना उपवास है। उपवास करके पौषध के नियम का पालन करना पौषधोपवास व्रत कहलाता है। पौषध पाठ

Jain Mantra

Samayik Aur Sanvar Path With Aalochana

सामायिक साधना  सामायिक पाठ करेमि भंते। सामाइयं सावज्जं जोगं पच्चक्खामि जाव नियमं (मुहुत्तं एगं) पज्जुवासामि दुविहं तिविहेणं न करेमि न कारवेमि मणसा वयसा कायसा तस्स भंते ! पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि। सामायिक आलोचना पाठ नौंवें सामायिक व्रत में जो कोई अतिचार (दोष) लगा हो तो मैं उसकी आलोचना करता हूं।  १. मन की सावद्म

Jain Mantra

Paisnthiya Chhand

श्री पैंसठिया छन्द १. श्री नेमीश्वर सम्भव स्वाम,  सुविधि, धर्म, शान्ति अभिराम ।  अनन्त, सुव्रत, नमिनाथ सुजाण,  श्री जिनवर मुझ करो कल्याण ।। २. अजितनाथ, चन्दा प्रभु धीर,  आदीश्वर सुपार्श्व गम्भीर ।  विमलनाथ विमल जग-भाण,  श्री जिनवर मुझ करो कल्याण ।। ३. मल्लिनाथ जिन मंगल रूप,  पंचबीस धनुष् सुन्दर स्वरूप ।  श्री अरनाथ नमूं वर्धमान, 

Jain Mantra

Loggass Path (Arth Sahit)

लोगस्स पाठ यह चौबीस तीर्थंकरों की स्तुति है। शासन-सेवक, सभी देव और देवियां इससे प्रसन्न रहते हैं। इसकी पूरी माला फेरने से विशेष लाभ होता है। १. लोगस्स उज्जोयगरे, धम्म तित्थ यरे जिणे।  अरहंते कित्तइस्सं, चउवीसंपी केवली ॥  लोक में उद्योत करने वाले धर्म तीर्थ के कर्ता  जिन अहंतों का मैं कीर्तन करूंगा (वे चौबीस

Scroll to Top