Payo Pad Jinraj No (Anant Prabhu)

यह जैन तीर्थंकरों और संतों की वंदना का भजन है — भक्ति और स्वाध्याय के लिए। A Jain devotional song honoring the Tirthankaras and saints.

14

अनन्त प्रभु स्तवन
पायो पद जिनराज नौं सुध ध्यान निर्मल ध्याय भलां जी कांई ॥
1. अनंत नाम-जिन चवदमां रे, द्रव्य चौथे गुणठाण। भावे जिन हुवै तेरमे रे, इतलै द्रव्य जिन जाण ॥
2. जिन चक्री सुर जुगलिया रे, वासुदेव बलदेव । पंचम गुण पावै नहीं रे, ए रीत अनादि स्वमेव ॥
3. संजम लीधौ तिण समें रे, आया सप्तम गुणठाण। अंतरमुहूर्त तिहां रही रे, छठे बहुस्थिति जाण ॥
4. आठमा थी दोय श्रेणि छै रे, उपशम क्षपक पिछाण। उपशम जाय इग्यारमे रे, मोह दबावतो जाण ॥
5. श्रेणि उपशम जिन नां लहै रे, खपक श्रेणि घर खंत। चारित्र मोह खपावतां रे, चढ़िया ध्यान अत्यंत ॥
6. नवमे आदि संजल चिहुं रे, अन्त समे इक लोभ। दसमे सूक्षम मात्र ते रे, सागार उपयोग सोभ॥
7. एकादशम उलंघ नै रे, बारमे मोह खपाय। त्रिकर्म इक सम तोड़तां रे, तेरम केवल पाय ॥
8. तीर्थ थाप जोग संघ नै रे, चवदमां थी शिव पाय। उगणीसे पूनम भाद्रवी रे, अनन्त रट्या हरषाय ॥
लय : पायो जुगराज पद मुनि

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top