यह जैन तीर्थंकरों और संतों की वंदना का भजन है — भक्ति और स्वाध्याय के लिए। A Jain devotional song honoring the Tirthankaras and saints.
स्वामीजी । झणण, झणण, झण, झण झणाट सी रूं रुं लागे रे,
सिरियारी समाधि पर कोई सगती जागे रे ।। स्थायी ।।
सुई पाग में टांगतो, बोल्यो दरजी हुसियार।
अबतो देरी बाबाजी री, म्हारो काम सो त्यार ।।1।।
स्यामीजी
पद्मासन पर विराज लीन्हो, काउसग मुद्रा ध्यान।
आपां रै अब कैरी देरी ? कहतां छोड्या प्राण।।2।।
स्यामीजी
साठे भादव सुद तेरस नै, मंगल चोथो पोर।
धर्म-गिरी पर चिता रचाई, रंग गुलाल बिखेर ।।३।।
स्यामीजी
मिली एकसो पिचपन वर्षों, पछे समाधि सचेत ।
संपतजी गधिये नै बाबो ! दियो ज्योति संकेत । । 4 ।।
स्यामीजी
देह – भसम स्युं उठे तरंगा, ‘सागर’ अपणै आप।
रंगरली पाली चोमासै, बाबे रो परताप ||5||
स्यामीजी