धोरे उपर जीम खुपरडी नजर पसारी खेत म,
मूंग मोठ मतीर घणेरा स्वर्ग उतर गयो रेत म।
पवन झकोले झुके बाजरो,सिटैयाघड़ियांरहिया,
मूंग मगरिये तिल तगरिये मोठडलाबंगला रहिया,
बेलड़ियां फोगां पर छाई नालज पसरा रेत में।
तिरछे नैणा हंस कर बोली बाजु बंद घड़वाउली,
तेवटिय रो थारो कहयोडो पिवरीय उठ जावुली,
तातो न खायो रातों नओढयो,केपडयो थारे हेत म।
भोली ए नखराली गौरी भोली थारी जातडी, धोरे उपर मांड झोपड़ी मिठी करस्या बातडी,
हिल मिल आपा ब्याव रचास्या छोरे रो इस चैत म।
लहर लहर लहरावे सेवण पांव पड़े धारान म,
खोडलिय म घास घणेरो के कमी किसान रे
मेहनत मिट्टी सोनो बणज्या कल्पवृक्ष ई रेत में।