नैय्या मेरी फंसी पड़ी है
(तर्ज : चांदी की दिवार)
नैय्या मेरी फंसी पड़ी है, वर्षो से मझधार में, क्यो नहीं होती यहां सुनायी, माँ तेरे दरबार में ।।
सेवा की है भक्ति की है, तेरी ज्योति जलायी है, ना जाने कितने वर्षों तक, तेरी आरती गायी है, तेरे मंन्दिर में पंहुचा हूँ, मैय्या तुझे पुकारने ।। 1 ।।
मुझ को तो मालुम नहीं था, इतनी देर लगाती हो, छोटा सा इक काम करने में, इतनी तुम तड़फाती है, ना जाने तुम कब आओगी, जीवन मेरा संवारने ।। 2 ।।
मुझ को आशीर्वाद दो मैय्या, थोड़ा सा मेरा साथ दो, टूटी फूटी मेरी विनती, उस पर थोड़ा ध्यान दो, मन की बातें तुम्हें सुनाने, आया हूँ दरबार में ।। 3 ।।