“Rom Rom Se Nikle Maiya Nam Tumhara

(तर्ज : जनम जनम का)

रोम रोम से निकले मैय्या, नाम तुम्हारा – 2, ऐसा दो वरदान कि जन्मुं, बन के भक्त तुम्हारा।।
रोम रोम से.
बिन मांझी के नैय्या, चलती दम पे तेरे, बिन बोले तू मैय्या, हरती दुःखड़े मेरे, बीच भंवर में अटके नैय्या, तो देना इसे किनारा ।।
स्वार्थ के संसार ने, कितना मुझे सताया, शरण तुम्हारी जो पड़ा, तुमने गले लगाया, उतर गयी प्यासे जीवन में, बन के जल की धारा ।।
माँ तेरे चरणों में, हरदम रहे ठिकाना, भूल अगर हो जाये, दिल से उसे भुलाना, तेरी किरपा बनी रहेगी, ये विश्वास हमारा ।।

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