(तर्ज : ज्योत से ज्योत)
भिक्षु को दिल में बसाते चलो,
श्रद्धा का दीपक जलाते चलो।
दिल की दीवारों पै उनको बिठा,
जीवन के संकट मिटाते चलो ॥
7. दीपां मां के लाल दुलारे,
बल्तु सुत उजियारे ।
कंटालिय में जन्म लिया था,
खिल गए भाग्य हमारे।
राहों की उलझन मिटाते चलो ॥
२. कैसा तूने ढूंढ निकाला,
अमृत का यह प्याला।
पीकर हर मानव ही देखो
, बन गया है मतवाला।
संयम का पंथ सजाते चलो ॥
३. बलिदानों की राह तुम्हारी,
रातें थी वे भारी।
त्याग तपोबल देख तुम्हारा,
द्वेषी दुनिया हारी।
हमको भी मार्ग बताते चलो ॥
४. अधरों पर है नाम तुम्हारा,
श्रद्धा अटल हमारी। पाकर तेरी शीतल छाया,
विकसित गण फुलवारी
॥ शासन की सुषमा बढ़ाते चलो ॥