घुंघरू छम छमा छम छण छण ण ण ण ण णण बाजैरे बाजे रे। तपस्या री अनुपम महिमा जन जन में राजै रे । स्थायी॥
निज रै तन स्यूं जंग जबर ओ, जीतै कोइक शूर।
तप तलवार बजै हाडां पर, कायर भागे दूर ॥1॥
तपसी रे तो खेल तपस्या, तन रो निकलै तेल।
वज्र जिसो मजबूत बण्यां ही, कटै कर्म री बेल ॥2॥
अमी, भीम, राम, शिव, कोदर, बड़ा तपस्वी नाम।
अन्तर भावां स्यूं जो समरै, सरै अचिंत्या काम ॥3॥
घोर तपस्वी सुख सुखदाता, वृद्धि-सिद्धि दातार।
अगम साहसी उगम जगावै, सब रा शुभ संस्कार ॥4 ।।
रंभा, जेतां, झूमां, मुक्खां, छोगां, वदना मात।
चांदा, प्यारां, भूरां अणचां, पन्ना तपसण ख्यात ॥5॥
तुलसी चरण शरण में तीखो, तरुण तपस्वी संत ।
पारस नै पारस बणनो है, समतामय गुणवंत ॥6 ।।
योगक्षेम बरस मे मिलगी, आ संता री ओळ। ‘बुद्ध’ भरी है मासखमण पर, पारस ! थांरी खोळ ॥7॥
(लय-घुंघरू छम छमा छम)