लाग्यो लक्ष्मणजी के बाण
(तर्ज: धरती धोरां री….)
लाग्यो लक्ष्मणजी के बाण, थांने जाणो जरूरी काम, कहवै हनुमान स्यूं राम, सुणले बजरंगी ।।
पहली खोई बन में नारी, अब तो जातो दीखे भाई. म्हां पर या कोई विपदा आई, सुणले बजरंगी ।। 1 ।।
द्रोणांगिरि पर बेल बतावे, बा संजीवन नाम कहावे, ल्यायां लक्ष्मणजी बच ज्यावे, सुणले बजरंगी ।। 2 ।।
म्हां स्यूं पूछेली जद माई, कठे छोड्यो लक्ष्मण भाई, जास्यूं कियां अवधपुर मांही, सुणले बजरंगी ।। 3 ।।
माता खड़ी खड़ी सिसकेली, मुख से बोली ना निकलेली, धरती नीचें स्यूं खीसकेली, सुणले बजरंगी ।। 4 ।।
हनुमत चरणां शीष नवायो, सीधो पर्वत ऊपर आयो, पर बो संजीवन नहीं पायो, सुणले बजरंगी ।। 5 ।।
पर्वत ऊपर देखी माया, मन में रोष धणां ही आया आखिर पर्वत सहित उठाया, सुणले बजरंगी ।। 6 ।।
पर्वत लियां पवनसुत आवे, सारी अवधपुरी धबरावे, दुश्मन जाण के तीर चलावे, सुणले बजरंगी ।। 7 ।।
लाग्यो भरतराज को तीर, बोल्या सहाय करो रघुवीर, धरती ऊपर पड़ग्यो वीर, सुणले बजरंगी ।। 8 ।।
बजरंग बोले सारा हाल, सुणकर भरत हुया बेहाल, अब तो जा जल्दी स्यूं चाल, सुणले बजरंगी ।। १ ।।