मेलो तपस्या रो
(तर्ज : धरती धोरां री)
मेळो तपस्या रो, मेळो तपस्या रो, मेळलो तपस्यो रो ।। ध्रुव ।।
ओ तो दरियो ज्यूं लहरावै-२, देखण लोग हजारां आवै, सागै साध्यां ने भी ल्यावै ।।१ ।।
इण स्यूं मिलै प्रेरणा भारी-२, मिलजुल आवै सब नर-नारी, कैसी खिली धर्म फुलवारी ।।२।।
बिना बुलायां सगळा आवै-२, मन में फूल्या नहीं समावै, सब रा हिया हिलोरा खावै ।। ३ ।।
भुख प्यास नै बिलकुल भूलै-२, ऐ तो समता रस में झूलै, तपस्या देख-देख कर फलै ।।४।।
थांसू मिलै प्रेरणा भारी-२, पसरी महिमा मुलकां सारी, कैसी खिली धर्म फुलवारी।।५।।
धन्य-धन्य है बायां-भायां-२, ज्यांरी कोमल-कोमल काया, तन नै मन नै जबर तपाया ।। ६ ।।
म्हैं तो बारम्बार बधावां-२, तपसणरी बळिहारी जावां, तपसी रा म्हे कोड पुरावां ।। ७ ।।