(तर्ज : होठों को छू लो तुम)
आओ हम आज करें, तपस्या का अभिनन्दन । तप ज्वाला में तपकर काया बनती कुन्दन ॥ ध्रुव ॥
अठाई तप करना, आसान नहीं कोई।
तप धारा में बहना, आसान नहीं कोई। तन मन की मजबूती, से शोभे तप आसन ॥१ ॥
मुक्ति की राहों मेंतपबहुत जरुरी है,
अध्यात्म साधना तो ,तप बिना अधूरी है
तप से कटजाते जनमों के अघबन्धन ॥ २ ॥
धार्मिक जागरणा से, पावस का रूप खिले ।
मिथ्या संस्कारों के, सुदृढ़ प्राचीर हिले।
संतों के उपदेशों, पर हो चिंतन मंथन ॥ ३ ॥