Paryushan Parv Hariday Me Ullas Bhar Raha

पर्व पर्युषण हृदय उल्लास भर रहा। जागरण का जागरण का, अनवरत आह्वान कर रहा।
२. जन्म मृत्यु अनन्त अब तक हो गए चेतन । और होते ही रहेंगे, ज्ञान कर चेतन ! मोह का मोह का, है उदय जिससे चक्र चल रहा ॥
२. कर्म फल भुगतान करते अन्त कुछ आया। उच्च कुल में पुण्य के बल जन्म है पाया। आत्महित को आत्महित को, साध क्यों बेफिक्र बन रहा ॥
३. समय बीता जा रहा है क्यों बना गाफिल । चेतना सोई हुई अति दूर है मंजिल । रमण कर रमण कर, निज भाव में यह पर्व कह रहा ॥
४. आत्म दर्शन का सभी को मिल रहा संदेश। वीर वाणी से मिलेगी प्रेरणा सुविशेष । शक्ति को शक्ति को, पहचान भीतर स्रोत बह रहा ॥
तर्ज : कोरा कागज

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