(लय-नगरी-नगरी द्वारें द्बारे)
प्यारी लागे तपसन जी री सोहनी सुरतिया, प्यारी लगे तपसनजी री मोहनी मुरतिया।।
1. वीर वृत्ति साकार आपरी नैना आगे नाचणी,
रग-रग थांरी म्हें तो देखी तप संयम में राचणी।
सुपनै में भी सुनी ना कानां कायरता री बतिया ।।
प्यारी लगे तपसनजी सोहनी सुरतिया।
2. तपस्या में वर्षीतप रो तो बण्यो नयो इतिहास है, जननी थांरी पुण्यशाली, लाख-लाख शाबाश है।
सारी दुनिया में है प्यारी, थांरी रे मुरतियां ।। प्यारी लागे तपसन जी री सोहनी सुरतियां।
3. थारां गुण तपस्या रा म्हें तो जन्म जन्म नहीं भूलस्या, वर्षीतप ने याद कर – कर भक्ति सरोवर झुलस्या।
सारों परिकर मिलकर गावां थारी रे किरतीया।।
प्यारी लागे तपसन जी री सोहनी सुरतियां
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